hindi bhashi sangh (37)

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श्री गुरु गौरांग जयतः

श्रीमद भगवद्गीता यथारूप

अध्याय अठारह उपसंहार—संन्यास की सिद्धि

https://youtu.be/VQSon4RQDcM

1. अर्जुन ने कहा—हे महाबाहु ! मैं त्याग का उद्देश्य को जानने का इच्छुक हूँ और हे केशिनिषूदन, हे हृषिकेश ! मैं त्यागमय जीवन (संन्यास आश्रम) का भी उद्देश्य जानना चाहता हूँ।

2. भगवान ने कहा—भौतिक इच्छा पर आधारित कर्मों के परित्याग को विद्वान लोग संन्यास कहते हैं और समस्त कर्मों के फल-त्याग को बुद्धिमान लोग त्याग कहते हैं।

3. कुछ विद्वान घोषित करते हैं कि समस्त प्रकार के सकाम कर्मों को दोषप

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श्री गुरु गौरांग जयतः

श्रीमद भगवद्गीता यथारूप

अध्याय सत्रह श्रद्धा के विभाग

https://www.youtube.com/watch?v=JgcaQbH-afM

1. अर्जुन ने कहा—हे कृष्ण ! जो लोग शास्त्र के नियमों का पालन न करके अपनी कल्पना के अनुसार पूजा करते हैं, उनकी स्थिति कौनसी है ? वे सतोगुणी हैं, रजोगुणी हैं या तमोगुणी ?

2. भगवान ने कहा—देहधारी जीव द्वारा अर्जित गुणों के अनुसार उसकी श्रद्धा तीन प्रकार की हो सकती है—सतोगुणी, रजोगुणी अथवा तमोगुणी। अब इसके विषय में मुझसे सुनो।

3. हे भरतपुत्र ! विभिन्न गुणों के अंतर्गत अपने अपने अस्तित्

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श्री गुरु गौरांग जयतः

श्रीमद भगवद्गीता यथारूप

अध्याय सोलह दैवी तथा आसुरी स्वभाव

https://www.youtube.com/watch?v=rRbu5iyv2dc

1-3. भगवान ने कहा—हे भरतपुत्र ! निर्भयता, आत्मशुद्धि, आध्यात्मिक ज्ञान का अनुशीलन, दान, आत्म-संयम, यज्ञपरायणता, वेदाध्ययन, तपस्या, सरलता, अहिंसा, सत्यता, क्रोधविहीनता, त्याग, शांति, छिद्रान्वेषण में अरुचि, समस्त जीवों पर करुणा, लोभविहीनता, भद्रता, लज्जा, संकल्प, तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, ईर्ष्या तथा सम्मान की अभिलाषा से मुक्ति—ये सारे दिव्य गुण हैं, जो दैवी प्रकृति से सम्पन

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श्री गुरु गौरांग जयतः

श्रीमद भगवद्गीता यथारूप

अध्याय पन्द्रह पुरुषोत्तम योग

https://www.youtube.com/watch?v=e33nvksOLbo&t=34s

1. भगवान ने कहा—कहा जाता है कि एक शाश्र्वत अश्र्वत्थ वृक्ष है, जिसकी जड़े तो ऊपर की ओर हैं और शाखाएँ नीचे की ओर तथा पत्तियां वैदिक स्रोत हैं। जो इस वृक्ष को जानता है, वह वेदों का ज्ञाता है।

2. इस वृक्ष की शाखाएँ ऊपर तथा नीचे फैली हुई हैं और प्रकृति के तीन गुणों द्वारा पोषित हैं। इसकी टहनियाँ इंद्रियविषय हैं। इस वृक्ष की जड़ें नीचे की ओर भी जाती है, जो मानवसमाज के सकाम कर्मों

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श्री गुरु गौरांग जयतः

श्रीमद भगवद्गीता यथारूप

अध्याय चौदह प्रकृति के तीन गुण

https://www.youtube.com/watch?v=SesYsrC2tKc

1. भगवान ने कहा—अब मैं तुमसे समस्त ज्ञानों में सर्वश्रेष्ठ इस परम ज्ञान को पुनः कहूँगा, जिसे जान लेने पर समस्त मुनियों ने परम सिद्धि प्राप्त की है।

2. इस ज्ञान में स्थिर होकर मनुष्य मेरी जैसी दिव्य प्रकृति (स्वभाव) को प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार स्थित हो जाने पर वह न तो सृष्टि के समय उत्पन्न होता है और न प्रलय के समय विचलित होता है।

3. हे भरतपुत्र ! ब्रह्म नामक समग्र भौतिक वस्

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श्री गुरु गौरांग जयतः

श्रीमद भगवद्गीता यथारूप

अध्याय तेरह प्रकृति, पुरुष तथा चेतना

https://www.youtube.com/watch?v=BVFzjfOmmWA&t=82s

1-2. अर्जुन ने कहा—हे कृष्ण ! मैं प्रकृति एवं पुरुष (भोक्ता), क्षेत्र एवं क्षेत्रज्ञ तथा ज्ञान एवं ज्ञेय के विषय में जानने का इच्छुक हूँ। श्रीभगवान ने कहा—हे कुन्तीपुत्र ! यह शरीर क्षेत्र कहलाता है और इस क्षेत्र को जानने वाला क्षेत्रज्ञ है।

3. हे भरतवंशी ! तुम्हें ज्ञात होना चाहिए कि मैं भी समस्त शरीरों में ज्ञाता भी हूँ और इस शरीर तथा इसके ज्ञाता को जान लेना ज्ञान क

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श्री गुरु गौरांग जयतः

श्रीमद भगवद्गीता यथारूप

अध्याय बारह भक्तियोग

https://www.youtube.com/watch?v=QkkNaIxZiD8&t=60s

1. अर्जुन ने पूछा—जो आपकी सेवा में सदैव तत्पर रहते हैं, या जो अव्यक्त निर्विशेष ब्रह्म की पूजा करते हैं, इन दोनों में से किसे अधिक पूर्ण (सिद्ध) माना जाय ?

2. श्रीभगवान ने कहा—जो लोग अपने मन को मेरे साकार रूप में एकाग्र करते हैं, और अत्यंत श्रद्धापूर्वक मेरी पूजा करने में सदैव लगे रहते हैं, वे मेरे द्वारा परम सिद्ध माने जाते हैं।

3-4. लेकिन जो लोग अपनी इंद्रियों को वश में करके तथा स

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श्री गुरु गौरांग जयतः

श्रीमद भगवद्गीता यथारूप

अध्याय ग्यारह विराट रूप

https://www.youtube.com/watch?v=ODXeVXIR5ks&t=5s

1. अर्जुन ने कहा—आपने जिन अत्यंत गुह्य आध्यात्मिक विषयों का मुझे उपदेश दिया है, उसे सुनकर अब मेरा मोह दूर हो गया है।

2. हे कमलनयन ! मैंने आपसे प्रत्येक जीव की उत्पत्ति तथा लय के विषय में विस्तार से सुना है और आपकी अक्षय महिमा का अनुभव किया है।

3. हे पुरुषोत्तम, हे परमेश्वर ! यद्यपि आपको मैं अपने समक्ष आपके द्वारा वर्णित आपके वास्तविक रूप में देख रहा हूँ, किन्तु मैं यह देखने का इच

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श्री गुरु गौरांग जयतः

श्रीमद भगवद्गीता यथारूप

अध्याय दस श्रीभगवान का ऐश्वर्य

https://www.youtube.com/watch?v=-4ypJcxXVWM&t=82s

1. श्रीभगवान ने कहा—हे महाबाहु अर्जुन ! और आगे सुनो। चूँकि तुम मेरे प्रिय सखा हो, अतः मैं तुम्हारे लाभ के लिए ऐसा ज्ञान प्रदान करूँगा, जो अभी तक मेरे द्वारा बताये गये ज्ञान से श्रेष्ठ होगा।

2. न तो देवतागण मेरी उत्पत्ति या ऐश्वर्य को जानते हैं और न महर्षिगण ही जानते हैं, क्योंकि मैं सभी प्रकार से देवताओं और महर्षियों का भी कारणस्वरूप (उदगम) हूँ।

3. जो मुझे अजन्मा, अनादि,

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श्री गुरु गौरांग जयतः

श्रीमद भगवद्गीता यथारूप

अध्याय नौ परम गुह्य ज्ञान

https://www.youtube.com/watch?v=saevYxO0Sf0&t=115s

1. श्रीभगवान ने कहा—हे अर्जुन ! चूँकि तुम मुझसे कभी ईर्ष्या नहीं करते, इसलिए मैं तुम्हें यह परम गुह्य ज्ञान तथा अनुभूति बतलाऊँगा, जिसे जानकर तुम संसार के सारे क्लेशों से मुक्त हो जाओगे।

2. यह ज्ञान सब विद्याओं का राजा है, जो समस्त रहस्यों में सर्वाधिक गोपनीय है। यह परम शुद्ध है और चूँकि यह आत्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति कराने वाला है, अतः यह धर्म का सिद्धान्त है। यह अविनाशी है और

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श्री गुरु गौरांग जयतः

श्रीमद भगवद्गीता यथारूप

अध्याय आठ भगवत्प्राप्ति

https://www.youtube.com/watch?v=MmkYdX0oxrU&t=19s

1. अर्जुन ने कहा—हे भगवान ! हे पुरुषोत्तम ! ब्रह्म क्या है ? आत्मा क्या है ? सकाम कर्म क्या है ? यह भौतिक जगत क्या है ? तथा देवता क्या है ? कृपा करके यह सब मुझे बताइये।

2. हे मधुसूदन !यज्ञ का स्वामी कौन है और वह शरीर में कैसे रहता है ?और मृत्यु के समय भक्ति में लगे रहने वाले आपको कैसे जान पाते हैं ?

3. भगवान ने कहा—अविनाशी और दिव्य जीव ब्रह्म कहलाता है और उसका नित्य स्वभाव अध्यात

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श्री गुरु गौरांग जयतः

श्रीमद भगवद्गीता यथारूप

अध्याय सात भगवदज्ञान

https://youtu.be/Ctx3N-wQSd4

1. श्रीभगवान ने कहा—हे पृथापुत्र ! अब सुनो कि तुम किस तरह मेरी भावना से पूर्ण होकर और मन को मुझमें आसक्त करके योगाभ्यास करते हुए मुझे पूर्णतया संशयरहित जान सकते हो।

2. अब मैं तुमसे पूर्णरूप से व्यावहारिक तथा दिव्यज्ञान कहूँगा। इसे जान लेने पर तुम्हें जानने के लिए और कुछ भी शेष नहीं रहेगा।

3. कई हजार मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्नशील होता है और इस तरह सिद्धि प्राप्त करने वालों में से विर

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श्री गुरु गौरांग जयतः

श्रीमद भगवद्गीता यथारूप

अध्याय छह ध्यानयोग

https://www.youtube.com/watch?v=YyVXlMAR0AU&t=131s

1. श्रीभगवान ने कहा-जो पुरुष अपने कर्मफल के प्रति अनासक्त है और जो अपने कर्तव्य का पालन करता है, वही संन्यासी और असली योगी है। वह नहीं, जो न तो अग्नि जलाता है और न कर्म करता है।

2. हे पांडुपुत्र ! जिसे संन्यास कहते हैं उसे ही तुम योग अर्थात परब्रह्म से युक्त होना जानो क्योंकि इंद्रियतृप्ति के लिए इच्छा को त्यागे बिना कोई कभी योगी नहीं हो सकता।

3. अष्टांगयोग के नवसाधक के लिए कर्म साध

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श्री गुरु गौरांग जयतः

अध्याय – पाँच कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म

https://www.youtube.com/watch?v=MBh-8z0kkyQ&t=168s

 

1. अर्जुन ने कहा-हे कृष्ण ! पहले आप मुझसे कर्म त्यागने के लिए कहते हैं और फिर भक्तिपूर्वक कर्म करने का आदेश देते हैं। क्या आप अब कृपा करके निश्चित रूप से मुझे बताएँगे कि इन दोनों में से कौन अधिक लाभप्रद है ?

2. श्रीभगवान ने उत्तर दिया-मुक्ति के लिए तो कर्म का परित्याग तथा भक्तिमय-कर्म (कर्मयोग) दोनों ही उत्तम हैं। किन्तु इन दोनों में से कर्म के परित्याग से भक्तियुक्त कर्म श्रेष्

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श्री गुरु गौरांग जयतः

श्रीमद भगवद्गीता यथारूप अध्याय चार - दिव्य ज्ञान

https://www.youtube.com/watch?v=4r5pr_vBVv8&t=60s

1. भगवान श्रीकृष्ण ने कहा-मैंने इस अमर योगविद्या का उपदेश सूर्यदेव विवस्वान को दिया और विवस्वान ने मनुष्यों के पिता मनु को उपदेश दिया और मनु ने इसका उपदेश इक्ष्वाकु को दिया।

2. इस प्रकार यह परम विज्ञान गुरु-परम्परा द्वारा प्राप्त किया गया और राजर्षियों ने इसी विधि से इसे समझा। किन्तु कालक्रम में यह परम्परा छिन्न हो गई, अतः यह विज्ञान यथारूप में लुप्त हो गया लगता है।

3. आज मेरे

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श्री गुरु गौरांग जयतः

श्रीमद भगवद्गीता यथारूप अध्याय तीन कर्मयोग

https://www.youtube.com/watch?v=pBgNwhh1xDQ&t=207s

 

1. अर्जुन ने कहा- हे जनार्दन, हे केशव ! यदि आप बुद्धि को सकाम कर्म से श्रेष्ठ समझते हैं तो फिर आप मुझे इस घोर युद्ध में क्यों लगाना चाहते हैं ?

2. आपके व्यामिश्रित (अनेकार्थक) उपदेशों से मेरी बुद्धि मोहित हो गई है। अतः कृपा करके निश्चयपूर्वक मुझे बतायें कि इनमें से मेरे लिए सर्वाधिक श्रेयस्कर क्या होगा?

3. श्रीभगवान ने कहा- हे निष्पाप अर्जुन ! मैं पहले ही बता चुका हूँ कि आत्म-साक्ष

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श्री गुरु गौरांग जयतः

श्रीमद भगवद्गीता यथारूप अध्याय दो गीता का सार

https://www.youtube.com/watch?v=zWKOwLIXiws&t=273s

1. संजय ने कहा- करुणा से व्याप्त, शोकयुक्त, अश्रुपूरित नेत्रों वाले अर्जुन को देख कर मधुसूदन कृष्ण ने ये शब्द कहे।

2. श्रीभगवान ने कहा- हे अर्जुन तुम्हारे मन में यह कल्मष आया कैसे ? यह उस मनुष्य के लिए तनिक भी अनुकूल नहीं है, जो जीवन के मूल्य को जानता हो। इससे उच्चलोक की नहीं अपितु अपयश की प्राप्ति होती है।

3. हे पृथापुत्र ! इस हीन नपुंसकता को प्राप्त मत होओ । यह तुम्हें शोभा नही

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श्री गुरु गौरांग जयतः

श्रीमद भगवद्गीता यथारूप

आमुख

1 भगवद्गीता यथारूप को प्रस्तुत करने का एकमात्र उद्देश्य बद्ध जिज्ञासुओं को उस उद्देश्य का मार्गदर्शन कराना है, जिसके लिए कृष्ण इस धरा पर ब्रह्मा के एक दिन में एक बार अर्थात प्रत्येक 8,60,00,00,000 वर्ष बाद अवतार लेते हैं।भगवद्गीता में इस उद्देश्य का उल्लेख हुआ है और हमें उसे उसी रूप में ग्रहण कर लेना चाहिए अन्यथा भगवद्गीता तथा उसके वक्ता भगवान कृष्ण को समझने का कोई अर्थ नहीं है।

2 सामान्यतया तथाकथित विद्वान, राजनीतिज्ञ, दार्शनिक तथा स्वामी कृष्ण

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श्री गुरु गौरांग जयतः

ॐ श्री गणेशाय नमः 

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

नारायणम नमस्कृत्यम नरं चैव नरोत्तमम

देवी सरस्वती व्यासं ततो जयम उदिरयेत

प्रह्लाद महाराज द्वारा

नृसिंह देव को प्रार्थनाओं से शांत करना

श्रीमद भागवतम सप्तम स्कन्ध अध्याय नौ

 

 

प्रह्लाद महाराज द्वारा स्तुति .pdf

 

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श्री गुरु गौरांग जयतः

ॐ श्री गणेशाय नमः 

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

नारायणम नमस्कृत्यम नरं चैव नरोत्तमम

देवी सरस्वती व्यासं ततो जयम उदिरयेत

चित्रकेतु द्वारा स्तुति

श्रीमद भागवतम षष्ठ स्कन्ध अध्याय सोलह

31 परमेश्र्वर का दर्शन पाते ही महाराज चित्रकेतु के समस्त भौतिक कल्मष धूल गये और वे पूर्णतः पवित्र हो जाने के कारण अपनी मूल कृष्णचेतना (भक्ति) में स्थित हो गये। वे पूर्णतः पवित्र हो जाने के कारण शांत एवं गंभीर हो गये, ईश्र्वर के प्रेमवश उनकी आँखों से अश्रु झरने लगे और अंत में उन्हें रोमांच हो आया। उन्हो

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