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hindi bhashi sangh (113)

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अध्याय आठ - भगवान नृसिंह द्वारा असुरराज का वध

1 नारद मुनि ने आगे कहा : सारे असुरपुत्रों ने प्रह्लाद महाराज के दिव्य उपदेशों की सराहना की और उन्हें अत्यंत गंभीरतापूर्वक ग्रहण किया। उन्होंने षंड तथा अमर्क नामक अपने गुरुओं द्वारा दिये गये भौतिकतावादी उपदेशों का तिरस्कार कर दिया।

2 जब शुक्राचार्य के पुत्र षंड तथा अमर्क ने देखा कि सारे विद्यार्थी असुर पुत्र प्रह्लाद महाराज की संगति से कृष्णभक्ति में आगे बढ़ रहे हैं, तो वे डर गये। अतएव वे असुरराज के पास गये और उनसे सारी स्थिति यथावत वर्णन कर दी।

3-4 जब

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अध्याय सात - प्रह्लाद ने गर्भ में क्या सीखा

1 नारद मुनि ने कहा : यद्यपि प्रह्लाद महाराज असुरों के परिवार में जन्मे थे, किन्तु वे समस्त भक्तों में सबसे महान थे। इस प्रकार अपने असुर सहपाठियों द्वारा पूछे जाने पर उन्होंने मेरे द्वारा कहे गये शब्दों का स्मरण किया और अपने मित्रों से इस प्रकार कहा।

2 प्रह्लाद महाराज ने कहा : जब हमारे पिता हिरण्यकशिपु कठिन तपस्या करने के लिए मंदराचल पर्वत चले गये तो उनकी अनुपस्थिति में इन्द्र इत्यादि देवताओं ने युद्ध में सारे असुरों को दमन करने का भारी प्रयास किया।

3 “

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अध्याय छह - प्रह्लाद द्वारा अपने असुर सहपाठियों को उपदेश

1 प्रह्लाद महाराज ने कहा : पर्याप्त रूप से बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह जीवन के प्रारम्भ से ही अर्थात बाल्यकाल से ही अन्य सारे कार्यों को छोड़कर भक्ति कार्यों के अभ्यास में इस मानव शरीर का उपयोग करे। यह मनुष्य-शरीर अत्यंत दुर्लभ है और अन्य शरीरों की भाँति नाशवान होते हुए भी अर्थपूर्ण है, क्योंकि मनुष्य जीवन में भक्ति सम्पन्न की जा सकती है। यदि निष्ठापूर्वक किंचित भी भक्ति की जाये तो पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो सकती है।

2 यह मनुष्य-जीवन भगवदधा

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अध्याय पाँच - हिरण्यकशिपु का साधु-सदृश पुत्र प्रह्लाद महाराज- 

1 महामुनि नारद ने कहा : हिरण्यकशिपु की अगुवाई में असुरों ने शुक्राचार्य को अनुष्ठान सम्पन्न कराने के लिए पुरोहित के रूप में चुना। शुक्राचार्य के दो पुत्र षंड तथा अमर्क हिरण्यकशिपु के महल के ही पास रहते थे।

2 प्रह्लाद महाराज पहले से ही भक्ति में निपुण थे, किन्तु जब उनके पिता ने उन्हें पढ़ाने के लिए शुक्राचार्य के दोनों पुत्रों के पास भेजा तो उन दोनों ने उन्हें तथा अन्य असुरपुत्रों को अपनी पाठशाला में भर्ती कर लिया।

3 प्रह्लाद अध्यापकों

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अध्याय चार - ब्रह्मांड में हिरण्यकशिपु का आतंक

1 नारद मुनि ने कहा : ब्रह्माजी हिरण्यकशिपु की दुष्कर तपस्या से अत्यंत प्रसन्न थे। अतएव जब उसने उनसे वरों की याचना की तो उन्होंने निस्संदेह वे दुर्लभ वर प्रदान कर दिये।

2 ब्रह्माजी ने कहा : हे हिरण्यकशिपु, तुमने जो वर माँगे हैं, वे अधिकांश मनुष्यों को बड़ी कठिनाई से प्राप्त हो पाते हैं। हे पुत्र, यद्यपि ये वर सामान्यतया उपलब्ध नहीं हो पाते, तथापि मैं तुम्हें प्रदान करूँगा।

3 तब अमोघ वर देने वाले ब्रह्माजी दैत्यों में श्रेष्ठ हिरण्यकशिपु द्वारा पूजित मह

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अध्याय तीन - हिरण्यकशिपु की अमर बनने की योजना  

1 नारद मुनि ने महाराज युधिष्ठिर से कहा : दैत्यराज हिरण्यकशिपु अजेय तथा वृद्धावस्था एवं शरीर की जर्जरता से मुक्त होना चाहता था। वह अणिमा तथा लघिमा जैसी समस्त योग-सिद्धियों को प्राप्त करना, मृत्युरहित होना और ब्रह्मलोक समेत अखिल विश्व का एकछत्र राजा बनना चाहता था।

2 हिरण्यकशिपु ने मंदर पर्वत की घाटी में अपने पाँव के अंगूठे के बल भूमि में खड़े होकर, अपनी भुजाएँ ऊपर किये तथा आकाश की ओर देखते हुए अपनी तपस्या प्रारम्भ की। यह स्थिति अतीव कठिन थी, किन्तु सि

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अध्याय उन्नीस - पुंसवन व्रत का अनुष्ठान 

1 महाराज परीक्षित ने कहा : हे प्रभो ! आप पुंसवन व्रत के संबंध में पहले ही बता चुके हैं। अब मैं इसके विषय में विस्तार से सुनना चाहता हूँ क्योंकि मैं समझता हूँ कि इस व्रत का पालन करके भगवान विष्णु को प्रसन्न किया जा सकता है।

2-3 शुकदेव गोस्वामी ने कहा : स्त्री को चाहिए कि अगहन मास (नवंबर-दिसंबर) के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को अपने पति की अनुमति से इस नैमित्यिक भक्ति को, तप के व्रत सहित प्रारम्भ करे क्योंकि इससे सभी मनोकामनाएँ पूरी हो सकती है। भगवान विष्णु की उप

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अध्याय छब्बीस --- नारकीय लोकों का वर्णन

1 राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा--- हे महाशय, जीवात्माओं को विभिन्न भौतिक गतियाँ क्यों प्राप्त होती हैं? कृपा करके मुझसे कहें।

2 महामुनि शुकदेव बोले--- हे राजन, इस जगत में सतोगुण, रजोगुण तथा तमोगुण में स्थित तीन प्रकार के कर्म होते हैं। चूँकि सभी मनुष्य इन तीन गुणों से प्रभावित होते हैं, अतः कर्मों के फल भी तीन प्रकार के होते हैं। जो सतोगुण के अनुसार कर्म करता है, वह धार्मिक एवं सुखी होता है, जो रजोगुण में कर्म करता है उसे कष्ट तथा सुख के मिश्रि

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अध्याय दस -- जड़ भरत तथा महाराज रहूगण की वार्ता

1 शुकदेव गोस्वामी आगे बोले-- हे राजन, इसके बाद सिंधु तथा सौवीर प्रदेशों का शासक रहुगण कपिलाश्रम जा रहा था। जब राजा के मुख्य कहार (पालकीवाहक) इक्षुमती के तट पर पहुँचे तो उन्हें एक और कहार की आवश्यकता हुई। अतः वे किसी ऐसे व्यक्ति की खोज करने लगे और दैववश उन्हें जड़ भरत मिल गया। उन्होंने सोचा कि यह तरुण और बलिष्ठ है और इसके अंग-प्रत्यंग सुदृढ़ हैं। यह बैलों तथा गधों के तुल्य बोझा ढोने के लिए अत्यंत उपयुक्त है। ऐसा सोचते हुए यद्यपि महात्मा जड़ भरत ऐसे कार

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अध्याय इकतीस -- प्रचेताओं को नारद का उपदेश 

श्रीमदभागवतम चतुर्थ स्कन्ध (भाग दो).pdf

1 महान संत मैत्रेय ने आगे कहा : तत्पश्र्चात प्रचेता हजारों वर्षों तक घर में रहे और आध्यात्मिक चेतना में पूर्ण ज्ञान विकसित किया। अंत में उन्हें भगवान के आशीर्वादों की याद आई और वे अपनी पत्नी को अपने सुयोग्य पुत्र के जिम्मे छोड़कर घर से निकल पड़े।

2 प्रचेतागण पश्चिम दिशा में समुद्रतट की ओर गये जहाँ जाजलि ऋषि निवास कर रहे थे। उन्होंने वह आध्यात्मिक ज्ञान पुष्ट कर लिया जिससे मनुष्य समस्त जीवों के प्रति समभाव रखने लगता ह

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कर्म-बंधन (3.32)

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अध्याय बत्तीस : कर्म-बंधन

1 भगवान ने कहा : गृहस्थ जीवन बिताने वाला व्यक्ति धार्मिक अनुष्ठान करते हुए भौतिक लाभ प्राप्त करता रहता है और इस तरह वह आर्थिक विकास तथा इंद्रियतृप्ति की अपनी इच्छापूर्ति करता है। वह पुनः पुनः इसी तरह कार्य करता है।

2 ऐसे व्यक्ति इंद्रियतृप्ति के प्रति अत्यधिक आसक्त होने के कारण भक्ति से विहीन होते हैं, अतः अनेक प्रकार के यज्ञ करते रहने तथा देवों एवं पितरों को प्रसन्न करने के लिए बड़े-बड़े व्रत करते रहने पर भी वे कृष्णभावनामृत अर्थात भक्ति में रुचि नहीं लेते।

3 ऐसे भौतिकवा

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अध्याय इकतीस - जीवों की गतियों के विषय में भगवान कपिल के उपदेश

1 भगवान ने कहा : परमेश्र्वर की अध्यक्षता में तथा अपने कर्मफल के अनुसार विशेष प्रकार का शरीर धारण करने के लिए जीव (आत्मा) को पुरुष के तेजकण के रूप में स्त्री के गर्भ में प्रवेश करना होता है।

2 पहली रात में शुक्राणु तथा रज मिलते हैं और पाँचवीं रात में यह मिश्रण बुलबले का रूप धारण कर लेता है। दसवीं रात्री को यह बढ़कर बेर जैसा हो जाता है और उसके बाद धीरे-धीरे यह मांस के पिण्ड या अंडे में परिवर्तित हो जाता है।

3 एक महीने के भीतर सिर बन जा

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अध्याय तीस भगवान कपिल द्वारा विपरीत कर्मों का वर्णन

1 भगवान ने कहा : जिस प्रकार बादलों का समूह वायु के शक्तिशाली प्रभाव से परिचित नहीं रहता उसी प्रकार भौतिक चेतना में संलग्न व्यक्ति काल की उस महान शक्ति से परिचित नहीं रहता, जिसके द्वारा उसे ले जाया जा रहा है।

2 तथाकथित सुख के लिए भौतिकतावादी द्वारा जो-जो वस्तुएँ अत्यंत कष्ट तथा परिश्रम से अर्जित की जाती है उन-उन को कालरूप परम पुरुष नष्ट कर देता है और इसके कारण बद्धजीव उनके लिए शोक करता है।

3 विभ्रमित भौतिकतावादी व्यक्ति यह नहीं जानता कि उसका अपन

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अध्याय उन्तीस-- भगवान कपिल द्वारा भक्ति की व्याख्या

1-2 देवहूति ने जिज्ञासा की : हे प्रभु, आप सांख्य दर्शन के अनुसार सम्पूर्ण प्रकृति तथा आत्मा के लक्षणों का अत्यंत वैज्ञानिक रीति से पहले ही वर्णन कर चुके हैं। अब मैं आपसे प्रार्थना करूँगी कि आप भक्ति के मार्ग की व्याख्या करें, जो समस्त दार्शनिक प्रणालियों की चरम परिणति है।

3 देवहूति ने आगे कहा : हे प्रभु, कृपया मेरे तथा जन-साधारण दोनों के लिए जन्म-मरण की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन करें, जिससे ऐसी विपदाओं को सुनकर हम इस भौतिक

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अध्याय अट्ठाईस --भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश 

1 भगवान ने कहा : हे माता, हे राजपुत्री, अब मैं आपको योग विधि बताऊँगा जिसका उद्देश्य मन को केन्द्रित करना है। इस विधि का अभ्यास करने से मनुष्य प्रसन्न रहकर परम सत्य के मार्ग की ओर अग्रसर होता है।

2 मनुष्य को चाहिए कि वह यथाशक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करे और उन कर्मों को करने से बचे, जो उसे नहीं करने हैं। उसे ईश्र्वर की कृपा से जो भी प्राप्त हो उसी से संतुष्ट रहना चाहिए और गुरु के चरणकमलों की पूजा करनी चाहिए।

3 मनुष्य को चाहिए कि परंपरागत धार्मिक प

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अध्याय सत्ताईस ----- प्रकृति का ज्ञान

1 भगवान कपिल ने आगे कहा : जिस प्रकार सूर्य जल पर पड़ने वाले प्रतिबिंब से भिन्न रहा आता है उसी तरह जीवात्मा शरीर में स्थित होकर भी प्रकृति के गुणों से अप्रभावित रहता है, क्योंकि वह अपरिवर्तित रहता है और किसी प्रकार का इंद्रियतुष्टि का कर्म नहीं करता।

2 जब आत्मा प्रकृति के जादू तथा अहंकार के वशीभूत होता है और शरीर को स्व (आत्मा) मान लेता है, तो वह भौतिक कार्यकलापों में लीन रहने लगता है और अहंकारवश सोचता है कि मैं ही प्रत्येक वस्तु का कर्ता हूँ।

3 अतः बद्धजीव भ

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अध्याय छब्बीस ------- प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त

1 भगवान कपिल ने आगे कहा : हे माता, अब मैं तुमसे परम सत्य की विभिन्न कोटियों का वर्णन करूँगा जिनके जान लेने से कोई भी पुरुष प्रकृति के गुणों के प्रभाव से मुक्त हो सकता है।

2 आत्म-साक्षात्कार की चरम सिद्धि ज्ञान है। मैं तुमको वह ज्ञान बतलाऊँगा जिससे भौतिक संसार के प्रति आसक्ति की ग्रंथियाँ कट जाती हैं।

3 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान परमात्मा है और उनका आदि नहीं है। वे प्रकृति के गुणों से परे और इस भौतिक जगत के अस्तित्व के परे हैं। वे सर्वत्र दिखाई पड़ने व

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अध्याय पच्चीस ----- भक्तियोग की महिमा

1 श्री शौनक ने कहा : यद्यपि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान अजन्मा हैं, किन्तु उन्होंने अपनी अंतरंगा शक्ति से कपिल मुनि के रूप में जन्म धारण किया। वे सम्पूर्ण मानव जाति के लाभार्थ दिव्य ज्ञान का विस्तार करने के लिए अवतरित हुए।

2 शौनक ने आगे कहा : स्वयं भगवान से अधिक जानने वाला कोई अन्य नहीं है। न तो कोई उनसे अधिक पूज्य है, न अधिक प्रौढ़ योगी। अतः वे वेदों के स्वामी हैं और उनके विषय में सुनते रहना इंद्रियों को सदैव वास्तविक आनंद प्रदान करने वाला है।

3 अतः कृपया उन भगव

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अध्याय चौबीस कर्दम मुनि का वैराग्य

1 भगवान विष्णु के वचनों का स्मरण करते हुए कर्दम मुनि ने वैराग्यपूर्ण बातें करने वाली, स्वायंभुव मनु की प्रशंसनीय पुत्री देवहूति से इस प्रकार कहा।

2 मुनि ने कहा : हे राजकुमारी, तुम अपने आपसे निराश न हो। तुम निस्संदेह प्रशंसनीय हो। अविनाशी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान शीघ्र ही पुत्र रूप में तुम्हारे गर्भ में प्रवेश करेंगे।

3 तुमने पवित्र व्रत धारण किये हैं। ईश्र्वर तुम्हारा कल्याण करे। अब तुम ईश्र्वर की पूजा अत्यंत श्रद्धा, संयम, नियम, तप तथा अपने धन के दान द्वारा करो।

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अध्याय तेईस -- देवहूति का शोक  

1 मैत्रेय ने कहा : अपने माता-पिता के चले जाने पर अपने पति की इच्छाओं को समझनेवाली पतिव्रता देवहूति अपने पति की प्रतिदिन प्रेमपूर्वक सेवा करने लगी जिस प्रकार भवानी अपने पति शंकरजी की करती हैं।

2 हे विदुर, देवहूति ने अत्यंत आत्मीयता और आदर के साथ, इंद्रियों को वश में रखते हुए, प्रेम तथा मधुर वचनों से अपने पति की सेवा की।

3 बुद्धिमानी तथा तत्परता के साथ कार्य करते हुए उसने समस्त काम, दंभ, द्वेष, लोभ, पाप तथा मद को त्यागकर अपने शक्तिशाली पति को प्रसन्न कर लिया।

4-5 पति

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