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अध्याय सत्ताईस ----- प्रकृति का ज्ञान 1 भगवान कपिल ने आगे कहा : जिस प्रकार सूर्य जल पर पड़ने वाले प्रतिबिंब से भिन्न रहा आता है उसी तरह जीवात्मा शरीर में स्थित होकर भी प्रकृति के गुणों से अप्रभावित रहता है, क्योंकि वह अपरिवर्तित रहता है और किसी…
9 hours ago
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अध्याय छब्बीस ------- प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त 1 भगवान कपिल ने आगे कहा : हे माता, अब मैं तुमसे परम सत्य की विभिन्न कोटियों का वर्णन करूँगा जिनके जान लेने से कोई भी पुरुष प्रकृति के गुणों के प्रभाव से मुक्त हो सकता है। 2 आत्म-साक्षात्कार की चरम…
yesterday
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अध्याय पच्चीस ----- भक्तियोग की महिमा 1 श्री शौनक ने कहा : यद्यपि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान अजन्मा हैं, किन्तु उन्होंने अपनी अंतरंगा शक्ति से कपिल मुनि के रूप में जन्म धारण किया। वे सम्पूर्ण मानव जाति के लाभार्थ दिव्य ज्ञान का विस्तार करने के लिए…
Saturday
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अध्याय चौबीस कर्दम मुनि का वैराग्य 1 भगवान विष्णु के वचनों का स्मरण करते हुए कर्दम मुनि ने वैराग्यपूर्ण बातें करने वाली, स्वायंभुव मनु की प्रशंसनीय पुत्री देवहूति से इस प्रकार कहा। 2 मुनि ने कहा : हे राजकुमारी, तुम अपने आपसे निराश न हो। तुम…
Friday
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अध्याय तेईस -- देवहूति का शोक  1 मैत्रेय ने कहा : अपने माता-पिता के चले जाने पर अपने पति की इच्छाओं को समझनेवाली पतिव्रता देवहूति अपने पति की प्रतिदिन प्रेमपूर्वक सेवा करने लगी जिस प्रकार भवानी अपने पति शंकरजी की करती हैं। 2 हे विदुर, देवहूति ने…
Thursday
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अध्याय बाईस ---- कर्दममुनि तथा देवहूति का परिणय 1 श्रीमैत्रेय ने कहा : सम्राट के अनेक गुणों तथा कार्यों की महानता का वर्णन करने के पश्र्चात मुनि शांत हो गये और राजा ने संकोचवश उन्हें इस प्रकार से संबोधित किया। 2 मनु ने कहा : वेदस्वरूप ब्रह्मा ने…
Wednesday
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  अध्याय इक्कीस ----- मनु-कर्दम संवाद 1 विदुर ने कहा : स्वायंभुव मनु की वंश परंपरा अत्यंत आदरणीय थी। हे पूज्य ऋषि, मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप इस वंश का वर्णन करें जिसकी संतति-वृद्धि मैथुनधर्म के द्वारा हुई। 2 स्वायंभुव मनु के दो…
Nov 24
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अध्याय बीस : मैत्रेय--विदुर संवाद 1 श्री शौनक ने पूछा-- हे सूत गोस्वामी, जब पृथ्वी अपनी कक्ष्या में पुनः स्थापित हो गई तो स्वायंभुव मनु ने बाद में जन्म ग्रहण करने वाले व्यक्तियों को मुक्ति-मार्ग प्रदर्शित करने के लिए क्या-क्या किया? 2 शौनक ऋषि ने…
Nov 23
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अध्याय उन्नीस -- असुर हिरण्याक्ष का वध 1 श्री मैत्रेय ने कहा : सृष्टा ब्रह्मा के निष्पाप, निष्कपट तथा अमृत के समान मधुर वचनों को सुनकर भगवान जी भरकर हँसे और उन्होंने प्रेमपूर्ण चितवन के साथ उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। 2 ब्रह्मा के नथुने से प्रकट…
Nov 22
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  अध्याय अठारह -- भगवान वराह तथा असुर हिरण्याक्ष के मध्य युद्ध 1 मैत्रेय ने आगे कहा : उस घमंडी तथा अभिमानी दैत्य ने वरुण के शब्दों की तनिक भी परवाह नहीं की। हे विदुर, उसे नारद से श्रीभगवान के बारे में पता लगा और वह अत्यंत वेग से समुद्र की गहराइयों…
Nov 21
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अध्याय सत्रह हिरण्याक्ष की दिग्विजय 1 श्रीमैत्रेय ने कहा : विष्णु से उत्पन्न ब्रह्मा ने जब अंधकार का कारण कह सुनाया, तो स्वर्गलोक के निवासी देवता समस्त भय से मुक्त हो गये। इस प्रकार वे सभी अपने-अपने लोकों को वापस चले गये। 2 साध्वी दिति अपने गर्भ में…
Nov 20
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 अध्याय सोलह -- वैकुंठ के दो द्वारपालों जय-विजय, को मुनियों द्वारा शाप 1 ब्रह्माजी ने कहा : इस तरह मुनियों को उनके मनोहर शब्दों के लिए बधाई देते हुए भगवदधाम में निवास करनेवाले पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान ने इस प्रकार कहा। 2 भगवान ने कहा : जय तथा विजय…
Nov 19
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अध्याय पन्द्रह -- ईश्र्वर के साम्राज्य का वर्णन 1 श्री मैत्रेय ने कहा : हे विदुर, महर्षि कश्यप की पत्नी दिति यह समझ गई कि उसके गर्भ में स्थित पुत्र देवताओं के विक्षोभ के कारण बनेंगे। अतः वह कश्यप मुनि के तेज को अपने गर्भ में एक सौ वर्षों तक निरंतर…
Nov 18
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अध्याय चौदह - संध्या समय दिति का गर्भ-धारण 1 शुकदेव गोस्वामी ने कहा : महर्षि मैत्रेय से वराह रूप में भगवान के अवतार के विषय में सुनकर दृढ़संकल्प विदुर ने हाथ जोड़कर उनसे भगवान के अगले दिव्य कार्यों के विषय में सुनाने की प्रार्थना की, क्योंकि वे…
Nov 17
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अध्याय तेरह -- भगवान वराह का प्राकट्य 1 श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन, मैत्रेय मुनि से इन समस्त पुण्यतम कथाओं को सुनने के बाद विदुर ने पूर्ण पुरषोत्तम भगवान की कथाओं के विषय में और अधिक पूछताछ की, क्योंकि इनका आदरपूर्वक सुनना उन्हें पसंद…
Nov 16
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अध्याय बारह -- कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि 1 श्री मैत्रेय ने कहा : हे विद्वान विदुर, अभी तक मैंने तुमसे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान के काल-रूप की महिमा की व्याख्या की है। अब तुम मुझसे समस्त वैदिक ज्ञान के आगार ब्रह्मा की सृष्टि के विषय में सुन सकते हो।…
Nov 15
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