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अध्याय चौदह ब्रह्मा द्वारा कृष्ण की स्तुति 

1 ब्रह्मा ने कहा : हे प्रभु, आप ही एकमात्र पूज्य भगवान हैं अतएव आपको प्रसन्न करने के लिए मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ और आपकी स्तुति करता हूँ। हे ग्वालनरेश पुत्र, आपका दिव्य शरीर नवीन बादलों के समान गहरा नीला है; आपके वस्त्र बिजली के समान देदीप्यमान हैं और आपके मुखमण्डल का सौन्दर्य गुञ्जा के बने कुण्डलों से तथा सिर पर लगे मोरपंख से बढ़ जाता है। अनेक वन-फूलों तथा पत्तियों की माला पहने तथा चराने की छड़ी (लकुटी), शृंग और वंशी से सज्जित आप अपने हाथ में भो

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अध्याय तेरह ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी

ब्लॉग संकलन दशम स्कन्ध (भाग एक) 1-13.pdf

1 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे भक्त शिरोमणि, परम भाग्यशाली परीक्षित, तुमने बहुत सुन्दर प्रश्न किया है क्योंकि भगवान की लीलाओं को निरन्तर सुनने पर भी तुम उनके कार्यों को नित्य नूतन रूप में अनुभव कर रहे हो।

2 जीवन-सार को स्वीकार करने वाले परम हंस भक्त अपने अन्तःकरण से कृष्ण के प्रति अनुरक्त होते हैं और कृष्ण ही उनके जीवन के लक्ष्य रहते हैं। प्रतिक्षण कृष्ण की ही चर्चा करना उनका स्वभाव होता है, मानो ये

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अध्याय ग्यारह - कृष्ण की बाल-लीलाएँ

1 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे महाराज परीक्षित, जब यमलार्जुन वृक्ष गिर पड़े तो आसपास के सारे ग्वाले भयानक शब्द सुनकर वज्रपात की आशंका से उस स्थान पर गये।

2 वहाँ उन सबों ने यमलार्जुन वृक्षों को जमीन पर गिरे हुए देखा किन्तु वे विमोहित थे क्योंकि वे आँखों के सामने वृक्षों को गिरे हुए तो देख रहे थे किन्तु उनके गिरने के कारण का पता नहीं लगा पा रहे थे।

3 कृष्ण रस्सी द्वारा ओखली से बँधे थे जिसे वे खींच रहे थे। किन्तु उन्होंने वृक्षों को किस तरह गिरा लिया? वास

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अध्याय दस यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार

1-3 राजा परीक्षित ने श्रील शुकदेव गोस्वामी से पूछा: हे महान एवं शक्तिशाली सन्त, नारदमुनि द्वारा नलकूवर तथा मणिग्रीव को शाप दिये जाने का क्या कारण था? उन्होंने ऐसा कौन-सा निंदनीय कार्य किया कि देवर्षि नारद तक उन पर क्रुद्ध हो उठे? कृपया मुझे कह सुनायें।

2-3 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा परीक्षित, चूँकि कुबेर के दोनों पुत्रों को भगवान शिवजी के पार्षद होने का गौरव प्राप्त था, फलतः वे अत्यधिक गर्वित हो उठे थे। उन्हें मन्दाकिनी नदी के तट पर कैलाश पर्वत स

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अध्याय नौ माता यशोदा द्वारा कृष्ण का बाँधा जाना

1-2 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : एक दिन जब माता यशोदा ने देखा कि सारी नौकरानियाँ अन्य घरेलू कामकाजों में व्यस्त हैं, तो वे स्वयं ही दही मथने लगीं। दही मथते समय उन्होंने कृष्ण की बाल-क्रीड़ाओं का स्मरण किया और स्वयं उन क्रीड़ाओं के विषय में गीत बनाते हुए उन्हें गुनगुनाकर आनन्द लेने लगीं।

3 केसरिया-पीली साड़ी पहने, अपनी स्थूल कमर में करधनी बाँधे माता यशोदा मथानी की रस्सी खींचने में काफी परिश्रम कर रही थीं, उनकी चुड़ियाँ तथा कान के कुण्डल हिल-डुल र

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अध्याय सात तृणावर्त का वध   

1-2 राजा परीक्षित ने कहा : हे प्रभु श्रील शुकदेव गोस्वामी, भगवान के अवतारों द्वारा प्रदर्शित विविध लीलाएँ निश्र्चित रूप से कानों को तथा मन को सुहावनी लगने वाली हैं। इन लीलाओं के श्रवणमात्र से मनुष्य के मन का मैल तत्क्षण धुल जाता है। सामान्यतया हम भगवान की लीलाओं को सुनने में आनाकानी करते हैं किन्तु कृष्ण की बाल-लीलाएँ इतनी आकर्षक हैं कि वे स्वतः ही मन तथा कानों को सुहावनी लगती हैं। इस तरह भौतिक वस्तुओं के विषय में सुनने की अनुरक्ति, जो भवबन्धन का मूल कारण है, समाप्त

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अध्याय चार राजा कंस के अत्याचार  

1 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा परीक्षित, घर के भीतरी तथा बाहरी दरवाजे पूर्ववत बन्द हो गए। तत्पश्र्चात घर के रहने वालों ने, विशेष रूप से द्वारपालों ने, नवजात शिशु का क्रन्दन सुना और अपने बिस्तरों से उठ खड़े हुए।

2 तत्पश्र्चात सारे द्वारपाल जल्दी से भोजवंश के शासक राजा कंस के पास गए और उसे देवकी से शिशु के जन्म लेने का समाचार बतलाया। अत्यन्त उत्सुकता से इस समाचार की प्रतीक्षा कर रहे कंस ने तुरन्त ही कार्यवाही की।

3 कंस तुरन्त ही बिस्तर से यह सोचते हुए उठ

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अध्याय तीन -- कृष्ण जन्म

1-5 तत्पश्र्चात भगवान के आविर्भाव की शुभ बेला में सारा ब्रह्माण्ड सतोगुण, सौंदर्य तथा शान्ति से युक्त हो गया। रोहिणी नक्षत्र तथा अश्र्विनी जैसे तारे निकल आए। सूर्य, चन्द्रमा तथा अन्य नक्षत्र एवं गृह अत्यन्त शान्त थे। सारी दिशाएँ अत्यन्त सुहावनी लगने लगीं और मनभावन नक्षत्र निरभ्र आकाश में टिमटिमाने लगे। नगरों, ग्रामों, खानों तथा चरागाहों से अलंकृत पृथ्वी सर्व-मंगलमय प्रतीत होने लगी। निर्मल जल से युक्त नदियाँ प्रवाहित होने लगीं और सरोवर तथा विशाल जलाशय कमलों तथा कुमुदिनियों

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कृपया मेरा विनम्र प्रणाम स्वीकार करें।  (Please accept my humble obeisances)

श्रील प्रभुपाद की जय हो ! (All Glories to Sril Prabhupada)

दिव्य ज्ञान की इस महान कृति के अध्ययन हेतु मनुष्य में जिस एकमात्र योग्यता की आवश्यकता है, वह है सावधानी के साथ एक-एक पग आगे बढ़ा जाए और किसी साधारण पुस्तक की भाँति, पढ़ने में कूद-फाँद न मचाई जाए, अपितु इसके अध्यायों को क्रमपूर्वक एक-एक करके पढ़ा जाए। सम्पूर्ण पाठ इस प्रकार व्यवस्थित किया गया है कि जब कोई प्रथम नौ स्कन्धों को समाप्त कर ले, तो उसे निश्र्चय ही भगवत-साक

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8647109464?profile=RESIZE_710xअध्याय तेईस - ययाति के पुत्रों की वंशावली 

1 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा : ययाति के चौथे पुत्र अनु के तीन पुत्र हुए जिनके नाम थे---सभानर, चक्षु तथा परेष्णु। हे राजन, सभानर के कालनर नाम का एक पुत्र हुआ और कालनर से सृञ्जय नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।

2 सृञ्जय का पुत्र जनमेजय हुआ, जनमेजय का पुत्र महाशाल, महाशाल का पुत्र महामना और महामना के दो पुत्र उशीनर तथा तितिक्षु हुए।

3-4 उशीनर के चार पुत्र थे---शिवि, वर, कृमि तथा दक्ष। शिवि के भी चार पुत्र हुए---वृषादर्भ, सुधीर, मद्र तथा आत्मतत्त्वित केकय। तितिक्षु

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अध्याय बाईस -- अजमीढ के वंशज

1 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन दिवोदास का पुत्र मित्रायु था और मित्रायु के चार पुत्र हुए जिनके नाम थे च्यवन, सुदास, सहदेव तथा सोमक। सोमक जन्तु का पिता था।

2 सोमक के एक सौ पुत्र थे जिनमें सबसे छोटा पृषत था। पृषत से राजा द्रुपद उत्पन्न हुआ जो सभी प्रकार से ऐश्वर्यवान था।

3 महाराज द्रुपद से द्रौपदी उत्पन्न हुई। महाराज द्रुपद के कई पुत्र भी थे जिनमें धृष्टद्युम्न प्रमुख था। उसके पुत्र का नाम धृष्टकेतु था। ये सारे पुरुष भर्म्याश्र्व के वंशज या पांचालवंशी कहलाते

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अध्याय बीस --- पुरु का वंश

1 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे महाराज भरत के वंशज महाराज परीक्षित, अब मैं पुरु के वंश का वर्णन करूँगा जिसमें तुम उत्पन्न हुए हो और जिसमें अनेक राजर्षि हुए हैं, जिनसे अनेक ब्राह्मण वंशों का प्रारम्भ हुआ है।

2 पुरु के ही इस वंश में राजा जनमेजय उत्पन्न हुआ। उसका पुत्र प्रचिन्वान था और उसका पुत्र था प्रवीर। तत्पश्र्चात प्रवीर का पुत्र मनुस्यु हुआ जिसका पुत्र चारुपद था।

3 चारुपद का पुत्र सुदयु था और सुदयु का पुत्र बहुगव था। बहुगव का पुत्र सन्याति था, जिससे अहन्याति नाम

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अध्याय अठारह -- राजा ययाति को यौवन की पुनः प्राप्ति

1 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा परीक्षित, जिस तरह देहधारी आत्मा के छह इन्द्रियाँ होती हैं उसी तरह राजा नहुष के छह पुत्र थे जिनके नाम थे यति, ययाति, सनयती, आयति, वियति तथा कृति।

2 जब कोई मनुष्य राजा या सरकार के प्रधान के पद को ग्रहण करता है तो वह आत्म-साक्षात्कार का अर्थ नहीं समझ पाता। यह जानकर, नहुष के सबसे बड़े पुत्र यति ने शासन सँभालना स्वीकार नहीं किया यद्यपि उसके पिता ने राज्य को उसे ही सौंपा था।

3 चूँकि ययाति के पिता नहुष ने इन्द्र क

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अध्याय सोलह -- भगवान परशुराम द्वारा विश्र्व के क्षत्रियों का विनाश

1 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे महाराज परीक्षित, हे कुरुवंशी, जब भगवान परशुराम को उनके पिता ने यह आदेश दिया तो उन्होंने तुरन्त ही यह कहते हुए उसे स्वीकार किया, “ऐसा ही होगा।” वे एक वर्ष तक तीर्थस्थलों की यात्रा करते रहे। तत्पश्र्चात वे अपने पिता के आश्रम में लौट आये।

2 एक बार जब जमदग्नि की पत्नी रेणुका गंगा नदी के तट पर पानी भरने गई तो उन्होंने गन्धर्वों के राजा को कमल-फूल की माला से अलंकृत तथा अप्सराओं के साथ गंगा में विहार

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