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अध्याय पंद्रह - सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश

श्लोक क्रमांक 41 से 80

41 ज्ञान में प्रबुद्ध अध्यात्मवादी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान के आदेश से बने शरीर की तुलना रथ से करते हैं, इंद्रियाँ घोड़ों के तुल्य हैं, इंद्रियों का स्वामी मन लगाम सदृश हैं, इंद्रियविषय गंतव्य हैं, बुद्धि सारथी है और सारे शरीर में व्याप्त चेतना इस भौतिक जगत के बंधन का कारण है।

42 शरीर के भीतर कार्यशील दस प्रकार की वायुओं की तुलना रथ के पहिए के अरों (तीलियों) से की गई है और इस पहिए के ऊपरी तथा निचले भाग धर्म तथा अधर्म कहलाते हैं। द

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अध्याय तेरह - सिद्ध पुरुष का आचरण

1 श्री नारदमुनि ने कहा : जो व्यक्ति आध्यात्मिक ज्ञान का अनुशीलन कर सकने में सक्षम हो उसे सारे भौतिक संबंधों का परित्याग कर देना चाहिए और शरीर को उस योग्य बनाये रखकर उसे प्रत्येक गाँव में केवल एक रात बिताते हुए इस स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करनी चाहिए। इस प्रकार संन्यासी को शरीर की आवश्यकताओं के लिए किसी पर निर्भर रहे बिना सारे संसार में विचरण करना चाहिए।

2 संन्यास धारण किये हुए व्यक्ति को अपना शरीर ढकने के लिए वस्त्र तक का भी उपयोग नहीं करना चाहिए। यदि उसे क

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अध्याय बारह पूर्ण समाज - चार आध्यात्मिक वर्ग

1 नारद मुनि ने कहा : विद्यार्थी को चाहिए कि वह अपनी इंद्रियों पर पूर्ण संयम रखने का अभ्यास करे। उसे विनीत होना चाहिए और गुरु के साथ दृढ़ मित्रता की प्रवृत्ति रखनी चाहिए। ब्रह्मचारी को चाहिए कि वो महान व्रत लेकर गुरुकुल में केवल अपने गुरु के लाभ के हेतु ही रहे।

2 दिन तथा रात्री के संधिकाल में अर्थात प्रातःकाल तथा संध्या समय उसे गुरु, अग्नि, सूर्यदेव तथा भगवान विष्णु के विचारों में लीन रहना चाहिए और गायत्री मंत्र को जपते हुए उनकी पूजा करनी चाहिए।

3 गुरु

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अध्याय दो असुरराज हिरण्यकशिपु

1 श्री नारद मुनि ने कहा : हे राजा युधिष्ठिर, जब भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण करके हिरण्याक्ष को मार डाला, तो हिरण्याक्ष का भाई हिरण्यकशिपु अत्यधिक क्रुद्ध हुआ और विलाप करने लगा।

2 क्रोध से भरकर तथा अपने होंठ काटते हुए हिरण्यकशिपु ने क्रोध से जलती हुई आँखों से आकाश को देखा तो वह सारा आकाश धूमिल हो गया। इस प्रकार वह बोलने लगा।

3 अपने भयानक दाँत, उग्र दृष्टि तथा रोषपूर्ण भौंहों के दिखाते हुए, देखने में भयानक उसने अपना त्रिशूल धारण किया और एकत्र हुए अपने असुर संगियों

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अध्याय एक - समदर्शी भगवान 

1 राजा परीक्षित ने पूछा : हे ब्राह्मण, भगवान विष्णु सबों के शुभचिंतक होने के कारण हर एक को समान रूप से अत्यधिक प्रिय हैं, तो फिर उन्होंने किस तरह एक साधारण मनुष्य की भाँति इन्द्र का पक्षपात किया और उसके शत्रुओं का वध किया? सबों के प्रति समभाव रखने वाला व्यक्ति कुछ लोगों की तरह किसी के प्रति पक्षपात करेगा और अन्यों के प्रति शत्रु-भाव रखेगा?

2 भगवान विष्णु साक्षात पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान तथा समस्त आनंद के आगार हैं, अतएव उन्हें देवताओं का पक्ष-ग्रहण करने से क्या लाभ मिलेगा

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