भगवद्गीता यथारूप 108 महत्त्वपूर्ण श्लोक
अध्याय तीन कर्मयोग
प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥ 27 ॥
प्रकृतेः– प्रकृति का;क्रियमाणानि– किये जाकर;गुणैः– गुणों के द्वारा;कर्माणि– कर्म;सर्वशः– सभी प्रकार के;अहङ्कार-विमूढ– अहंकार से मोहित;आत्मा–आत्मा;कर्ता– करने वाला;अहम्– मैं हूँ;इति– इस प्रकार;मन्यते– सोचता है।
भावार्थ : जीवात्मा अहंकार के प्रभाव से मोहग्रस्त होकर अपने आपको समस्त कर्मों का कर्ता मान बैठता है, जब कि वास्तव में वे प्रकृति के तीनों गुणों द्वा
