भगवद्गीता यथारूप 108 महत्त्वपूर्ण श्लोक
अध्याय चार दिव्य ज्ञान
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ।। 10 ।।
वीत– मुक्त;राग– आसक्ति;भय– भय;क्रोधाः– तथा क्रोध से;मत्-मया– पूर्णतया मुझमें;माम्– मुझमें;उपाश्रिताः– पूर्णतया स्थित;बहवः– अनेक;ज्ञान– ज्ञान की;तपसा– तपस्या से;पूताः– पवित्र हुआ;मत्-भावम्– मेरे प्रति दिव्य प्रेम को;आगताः– प्राप्त।
भावार्थ : आसक्ति, भय तथा क्रोध से मुक्त होकर, मुझमें पूर्णतया तन्मय होकर और मेरी शरण में आकर बहुत से व्यक्ति भूत काल में मेरे ज्



