भगवद्गीता यथारूप 108 महत्त्वपूर्ण श्लोक
अध्याय चार दिव्य ज्ञान
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।। 7 ।।
यदा यदा– जब भी और जहाँ भी;हि– निश्चय ही;धर्मस्य– धर्म की;ग्लानिः– हानि, पतन;भवति– होती है;भारत– हे भारतवंशी;अभ्युत्थानम्– प्रधानता;अधर्मस्य– अधर्म की;तदा– उस समय;आत्मानम्– अपने को;सृजामि– प्रकट करता हूँ;अहम्– मैं।
भावार्थ: हे भरतवंशी! जब भी और जहाँ भी धर्म का पतन होता है और अधर्म की प्रधानता होने लगती है, तब तब मैं अवतार लेता हूँ।
तात्पर्य : यहाँ पर सृ





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