भगवद्गीता यथारूप 108 महत्त्वपूर्ण श्लोक
अध्याय 2 : गीता का सार
देही नित्यमवध्योSयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ।। 30 ।।
देही- भौतिक शरीर का स्वामी;नित्यम्- शाश्वत;अवध्यः- मारा नहीं जा सकता;अयम्- यह आत्मा;देहे- शरीर में;सर्वस्य- हर एक के भारत - हे भारतवंशी;तस्मात्- अतः;सर्वाणि- समस्त;भूतानि- जीवों (जन्म लेने वालों) को ;न- कभी नहीं;त्वम्- तुम;शोचितुम्- शोक करने के लिए;अर्हसि- योग्य हो।
भावार्थ : हे भरतवंशी! शरीर में रहने वाले (देही) का कभी भी वध नहीं किया जा सकता। अतः

