भगवद्गीता यथारूप 108 महत्त्वपूर्ण श्लोक
अध्याय चार दिव्य ज्ञान
चातुवर्ण्यं मया सृष्टं गुण कर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ।। 13 ।।
चातुः-वर्ण्यम्– मानव समाज के चार विभाग;मया– मेरे द्वारा;सृष्टम्– उत्पन्न किये हुए;गुण– गुण;कर्म- तथा कर्म का;विभागशः– विभाजन के अनुसार;तस्य– उसका;कर्तारम्– जनक;अपि– यद्यपि;माम्– मुझको;विद्धि– जानो;अकर्तारम्– न करने के रूप में;अव्ययम्- अपरिवर्तनीय को।



