भगवद्गीता यथारूप 108 महत्त्वपूर्ण श्लोक
अध्याय आठ भगवत्प्राप्ति
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ 6 ॥
यम् यम्– जिस;वा अपि– किसी भी;स्मरन्– स्मरण करते हुए;भावम्– स्वभाव को;त्यजति– परित्याग करता है;अन्ते– अन्त में;कलेवरम्– शरीर को;तम् तम्– वैसा ही;एव– निश्चय ही;एति– प्राप्त करता है;कौन्तेय– हे कुन्तीपुत्र;सदा– सदैव;तत्– उस;भाव– भाव;भावितः– स्मरण करता हुआ।
भावार्थ : हे कुन्तीपुत्र! शरीर त्यागते समय मनुष्य जिस-जिस भाव का स्मरण करता है, वह उस उस भाव को निश्
