भगवद्गीता यथारूप 108 महत्त्वपूर्ण श्लोक
अध्याय सात भगवदज्ञान
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥ 7 ॥
मत्तः– मुझसे परे;पर-तरम्– श्रेष्ठ;न– नहीं;अन्यत् किञ्चित्– अन्य कुछ भी;अस्ति– है;धनञ्जय– हे धन के विजेता;मयि– मुझमें;सर्वम्– सब कुछ;इदम्– यह जो हम देखते हैं;प्रोतम्– गुँथा हुआ;सूत्रे– धागों में;मणि-गणाः– मोतियों के दाने;इव– सदृश।
भावार्थ : हे धनञ्जय! मुझसे श्रेष्ठ कोई सत्य नहीं है। जिस प्रकार मोती धागे में गुँथे रहते हैं, उसी प्रकार सब कुछ मुझ पर ही आश्रि

