भगवद्गीता यथारूप 108 महत्त्वपूर्ण श्लोक
अध्याय सात भगवदज्ञान
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
मूढोSयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ 25 ॥
न– न तो;अहम्– मैं;प्रकाशः– प्रकट;सर्वस्य– सबों के लिए;योग-माया– अन्तरंगा शक्ति से;समावृत– आच्छादित;मूढः– मुर्ख;अयम्– यह;न– नहीं;अभिजानाति– समझ सकता है;लोकः– लोग;माम्– मुझको;अजम्– अजन्मा को;अव्ययम्– अविनाशी को।
भावार्थ : मैं मूर्खों तथा अल्पज्ञों के लिए कभी भी प्रकट नहीं हूँ। उनके लिए तो मैं अपनी अन्तरंगा शक्ति द्वारा आच्छादित रहता हूँ, अतः वे यह नहीं जान पाते
