भगवद्गीता यथारूप 108 महत्त्वपूर्ण श्लोक
अध्याय चार दिव्य ज्ञान
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदु: ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ।। 2।।
एवम्– इस प्रकार;परम्परा– गुरु-परम्परा से;प्राप्तम्– प्राप्त;इमम्– इस विज्ञान को;राज-ऋषयह– साधू राजाओं ने;विदुः– जाना;सः– वह ज्ञान;कालेन– कालक्रम में;इह– इस संसार में;महता– महान;योगः– परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध का विज्ञान, योगविद्या;नष्टः– छिन्न-भिन्न हो गया;परन्तप– हे शत्रुओं को दमन करने वाले, अर्जुन।

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