हिन्दी भाषी संघ (60)

गंगा-अवतरण (5.17)

 

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अध्याय सत्रह ----- गंगा-अवतरण

1 श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन, सभी यज्ञों के भोक्ता भगवान विष्णु महाराज बलि की यज्ञशाला में वामनदेव का रूप धारण करके प्रकट हुए। तब उन्होंने अपने वाम पाद को ब्रह्मांड के छोर तक फैला दिया और अपने पैर के अँगूठे से उसके आवरण में एक छिद्र बना दिया। कारण-समुद्र के विशुद्ध जल ने, इस छिद्र के माध्यम से गंगा नदी के रूप में इस ब्रह्मांड में प्रवेश किया।  विष्णु के चरणकमलों को, जो केशर से लेपित थे, धोने से गंगा का जल अत्यंत मनोहर गुलाबी रंग का हो गया। गंगा के दिव्य ज

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अध्याय सोलह जम्बूद्वीप का वर्णन

1 राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से कहा : हे ब्राह्मण, आपने मुझे पहले ही बता दिया है कि भूमंडल की त्रिज्या वहाँ तक विस्तृत है जहाँ तक सूर्य का प्रकाश और ऊष्मा पहुँचती है तथा चंद्रमा और अन्य नक्षत्र दृष्टिगोचर होते हैं।

2 हे भगवन, महाराज प्रियव्रत के रथ के चक्रायमाण पहियों से सात गड्डे बने, जिससे सात समुद्रों की उत्पत्ति हुई। इन सात समुद्रों के ही कारण भूमंडल सात द्वीपों में विभक्त है। आपने इनकी माप, नाम तथा विशिष्टताओं का अत्यंत सामान्य वर्णन मात्र किया है। मुझे

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अध्याय पंद्रह - राजा प्रियव्रत के वंशजों का यश-वर्णन

1 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : महाराज भरत के पुत्र सुमति ने ऋषभदेव के मार्ग का अनुसरण किया, किन्तु कुछ पाखंडी लोग उन्हें साक्षात भगवान बुद्ध मानने लगे। वस्तुतः इन पाखंडी नास्तिक और दुश्र्चरित्र लोगों ने वैदिक नियमों का पालन काल्पनिक तथा अप्रसिद्ध ढंग से अपने कर्मों की पुष्टि के लिए किया। इस प्रकार इन पापात्माओं ने सुमति को भगवान बुद्धदेव के रूप में स्वीकार किया और इस मत का प्रवर्तन किया कि प्रत्येक व्यक्ति को सुमति के नियमों का पालन क

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8398968277?profile=RESIZE_400xअध्याय चौदह भौतिक संसार भोग का एक विकट वन

1 राजा परीक्षित ने जब श्रीशुकदेव गोस्वामी से भौतिक वन का अर्थ स्पष्ट करने के लिए कहा तो उन्होंने इस प्रकार उत्तर दिया---हे राजन, वणिक की रुचि सदैव धन उपार्जन के प्रति रहती है। कभी-कभी वह लकड़ी तथा मिट्टी जैसी कुछ अल्पमूल्य की वस्तुएँ प्राप्त करने और उन्हें ले जाकर नगर में अच्छे मूल्य में विक्रय करने की आकांक्षा से वन में प्रवेश करता है। इसी प्रकार बद्धजीव लोभवश कुछ भौतिक सुख-लाभ करने की इच्छा से इस भौतिक जगत में प्रवेश करता है। धीरे-धीरे वह वन के सघन भ

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अध्याय तेरह ----- राजा रहूगण तथा जड़ भरत के बीच और आगे वार्ता

1 ब्रह्म-साक्षात्कार प्राप्त जड़ भरत ने आगे कहा : हे राजा रहूगण, जीवात्मा इस संसार के दुर्लंघ्य पथ पर घूमता रहता है और बारंबार जन्म तथा मृत्यु स्वीकार करता है। प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज तथा तम) के प्रभाव से इस संसार के प्रति आकृष्ट होकर जीवात्मा प्रकृति के जादू से केवल तीन प्रकार के फल जो शुभ, अशुभ तथा शुभाशुभ होते हैं देख पाता है। इस प्रकार वह धर्म, आर्थिक विकास, इंद्रियतृप्ति तथा मुक्ति की अद्वैत भावना (परमात्मा में तादात्म्य)

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अध्याय ग्यारह जड़ भरत द्वारा राजा रहूगण को शिक्षा

1 ब्राह्मण जड़ भरत ने कहा : हे राजन, यद्यपि तुम थोड़ा भी अनुभवी नहीं हो तो भी तुम अत्यंत अनुभवी व्यक्ति के समान बोलने का प्रयत्न कर रहे हो। अतः तुम्हें अनुभवी व्यक्ति नहीं माना जा सकता। अनुभवी व्यक्ति कभी भी तुम्हारे समान स्वामी तथा सेवक अथवा भौतिक सुखों और दुखों के संबंध में इस प्रकार से नहीं बोलता। ये तो मात्र बाह्य कार्य हैं। कोई भी महान अनुभवी व्यक्ति परम सत्य को जानते हुए इस प्रकार बातें नहीं करता।

2 हे राजन, स्वामी तथा सेवक, राजा तथा प्रजा इत

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अध्याय नौ जड़ भरत का सर्वोत्कृष्ट चरित्र 

1-2 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे राजन, मृग शरीर त्याग कर भरत महाराज ने एक विशुद्ध ब्राह्मण के कुल में जन्म लिया। वह ब्राह्मण अंगिरा गोत्र से संबन्धित था और ब्राह्मण के समस्त गुणों से सम्पन्न था। वह अपने मन तथा इंद्रियों को वश में करनेवाला तथा वैदिक एवं अन्य पूरक साहित्यों का ज्ञाता था। वह दानी, संतुष्ट, सहनशील, विनम्र, पंडित तथा किसी से ईर्ष्या न करने वाला था। वह स्वरूपसिद्ध एवं ईश्र्वर की सेवा में तत्पर रहने वाला था। वह सदैव समाधि में रहता था। उस

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अध्याय आठ भरत महाराज के चरित्र का वर्णन

1 श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे राजन! एक दिन प्रातःकालीन नित्य-नैमित्तिक शौचादि कृत्यों से निवृत्त होकर महाराज भरत कुछ क्षणों के लिए गण्डकी नदी के तट पर बैठकर ओंकार से प्रारम्भ होनेवाले अपने मंत्र का जप करने लगे।

2 हे राजन, जब महाराज भरत उस नदी के तट पर बैठे हुए थे उसी समय एक प्यासी हिरणी पानी पीने आई।

3 जब वह हिरणी अगाध तृप्ति के साथ जल पी रही थी तो पास ही एक सिंह ने घोर गर्जना की। यह समस्त जीवों के लिए डरावनी थी और इसे उस मृगी ने भी सुना।

4 मृगी स्

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अध्याय सात राजा भरत के कार्यकलाप

1 शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को और आगे बताया-- हे राजन, भरत महाराज सर्वोच्च भक्त थे। अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए जिन्होंने उन्हें सिंहासन पर बैठाने का निर्णय पहले ही ले रखा था। वे तदनुसार पृथ्वी पर राज्य करने लगे। समस्त संसार पर राज्य करते हुए वे अपने पिता के आदेशों का पालन करने लगे और उन्होंने विश्र्वरूप की कन्या पंचजनी से विवाह कर लिया।

2 जिस प्रकार मिथ्या अहंकार से भूत-तन्मात्र (सूक्ष्म-इंद्रिय विषय) उत्पन्न होते हैं, वैसे ही महाराज भरत को अपनी

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अध्याय छह --भगवान ऋषभदेव के कार्यकलाप 

1 राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा--- हे भगवन, जो पूर्णरूपेण विमल हृदय हैं उन्हें भक्तियोग से ज्ञान प्राप्त होता है और सकाम कर्म के प्रति आसक्ति जलकर राख हो जाती है। ऐसे व्यक्तियों में योग शक्तियाँ स्वतः उत्पन्न होती हैं। इनसे किसी प्रकार का क्लेश नहीं पहुँचता, तो फिर ऋषभदेव ने उनकी उपेक्षा क्यों की?

2 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया--- हे राजन, तुमने बिल्कुल सत्य कहा है। किन्तु जिस प्रकार चालाक बहेलिया पशुओं को पकड़ने के बाद उन पर विश्र्वास नहीं

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8389368685?profile=RESIZE_710xअध्याय पाँच भगवान ऋषभदेव द्वारा अपने पुत्रों को उपदेश

1 भगवान ऋषभदेव ने अपने पुत्रों से कहा :हे पुत्रों इस संसार के समस्त देहधारियों में जिसे मनुष्य देह प्राप्त हुई है उसे इंद्रियतृप्ति के लिए ही दिन-रात कठिन श्रम नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा तो मल खाने वाले कूकर-सूकर भी कर लेते हैं। मनुष्य को चाहिए कि भक्ति का दिव्य पद प्राप्त करने के लिए वह अपने को तपस्या में लगाये। ऐसा करने से उसका हृदय शुद्ध हो जाता है और जब वह इस पद को प्राप्त कर लेता है, तो उसे शाश्र्वत जीवन का आनंद मिलता है, जो भौतिक आनं

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अध्याय चार भगवान ऋषभदेव के लक्षण

1 श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : जन्म से ही महाराज नाभि के पुत्र में भगवान के लक्षण प्रकट थे, यथा चरणतल के चिन्ह (ध्वज, वज्र इत्यादि)। यह पुत्र सबों के साथ समभाव रखनेवाला और अत्यंत शांत स्वभाव का था। यह अपनी इंद्रियों तथा मन को वश में कर सकता था और परम ऐश्वर्यवान होने के कारण उसे भौतिक सुख की लिप्सा नहीं थी। इन समस्त गुणों से सम्पन्न होने के कारण महाराज नाभि का पुत्र दिनोंदिन शक्तिशाली बनता गया। फलतः समस्त नागरिकों, विद्वान ब्राह्मणों देवताओं तथा मंत्रियों ने चाहा

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अध्याय तीन ----- राजा नाभि की पत्नी मेरुदेवी के गर्भ से ऋषभदेव का जन्म

1 शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : आग्नीध्र के पुत्र महाराज नाभि ने संतान की इच्छा की, इसलिए उन्होंने समस्त यज्ञों के भोक्ता एवं स्वामी भगवान विष्णु की अत्यंत मनोयोग से स्तुति एवं आराधना प्रारम्भ की। उस समय तक महाराज नाभि की पत्नी मेरुदेवी ने किसी संतान को जन्म नहीं दिया था, अतः वह भी अपने पति के साथ भगवान विष्णु की आराधना करने लगी।

2 यज्ञ में भगवान का अनुग्रह प्राप्त करने के सात दिव्य साधन है-- 1- बहुमूल्य सामग्रियों या खाद्य पद

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अध्याय दो -- महाराज आग्नीध्र का चरित्र

1 श्रीशुकदेव गोस्वामी आगे बोले--- अपने पिता महाराज प्रियव्रत के इस प्रकार आध्यात्मिक जीवन पथ अपनाने के लिए तपस्या में संलग्न हो जाने पर राजा आग्नीध्र ने उनकी आज्ञा का पूरी तरह पालन किया और धार्मिक नियमों के अनुसार उन्होंने जम्बूद्वीप के वासियों को अपने ही पुत्रों के समान सुरक्षा प्रदान की।

2 एक बार महाराज आग्नीध्र ने सुयोग्य पुत्र प्राप्त करने तथा पितृलोक का वासी बनने की कामना से भौतिक सृष्टि के स्वामी भगवान ब्रह्मा की आराधना की। वे मंदराचल की घाटी में गये

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अध्याय एक ---- महाराज प्रियव्रत का चरित्र

1 राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा-- हे मुनिवर, परम आत्मदर्शी भगवदभक्त राजा प्रियव्रत ने ऐसे गृहस्थ जीवन में रहना क्यों पसंद किया, जो कर्म-बंधन (सकाम कर्म) का मूल कारण तथा मानव जीवन के उद्देश्य को पराजित करने वाला है?

2 भक्तजन निश्र्चय ही मुक्त पुरुष होते हैं। अतः हे विप्रवर, वे संभवतः गृहकार्यों में दत्तचित्त नहीं रह सकते।

3 जिन सिद्ध महात्माओं ने भगवान के चरणकमलों की शरण ली है वे उन चरणकमलों की छाया से पूर्णतया तृप्त हैं। उनकी चेतना कभी भी कुट

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अध्याय तीस -- प्रचेताओं के कार्यकलाप

1 विदुर ने मैत्रेय से जानना चाहा : हे ब्राह्मण, आपने पहले मुझसे प्राचीनबर्हि के पुत्रों के विषय में बतलाया था कि उन्होंने शिव द्वारा रचे हुए गीत के जप से भगवान को प्रसन्न किया। तो उन्हें इस प्रकार क्या प्राप्त हुआ?

2 हे बार्हस्पत्य (बृहस्पति के शिष्य), राजा बर्हिषत के पुत्रों ने, जिन्हें प्रचेता कहते हैं, उन्होंने भगवान शिवजी से भेंट करने के बाद क्या प्राप्त किया, जो मोक्षदाता भगवान को अत्यंत प्रिय हैं? वे वैकुंठलोक तो गये ही, किन्तु इसके अतिरिक्त उन्होंने इस

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अध्याय उन्तीस -- नारद तथा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप

अध्याय उन्तीस -- नारद तथा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप.pdf

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अध्याय अट्ठाईस - अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति

1 नारद मुनि ने आगे कहा : हे राजा प्राचीनबर्हिषत, तत्पश्र्चात यवनराज साक्षात भय, प्रज्वार, काल-कन्या तथा अपने सौनिकों सहित सारे संसार में विचरने लगा।

2 एक बार भयानक सैनिकों ने पुरञ्जन-नगरी पर बड़े वेग से आक्रमण किया। यद्यपि यह नगरी भोग की सारी सामग्री से परिपूर्ण थी, किन्तु इसकी रखवाली एक बूढ़ा सर्प कर रहा था।

3 धीरे-धीरे कालकन्या ने घातक सैनिकों की सहायता से पुरञ्जन की नगरी के समस्त वासियों पर आक्रमण कर दिया और उन्हें सभी प्रकार से

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अध्याय सत्ताईस - राजा पुरञ्जन की नगरी पर चंडवेग का धावा और कालकन्या का चरित्र

1 महर्षि नारद ने आगे कहा : हे राजन, अनेक प्रकार से अपने पति को मोहित करके अपने वश में करती हुई राजा पुरञ्जन की पत्नी उसे सारा आनंद प्रदान करने लगी और उसके साथ विषयी जीवन व्यतीत करने लगी।

2 रानी ने स्नान किया और शुभ वस्त्रों तथा आभूषणों से अपने को सुसज्जित किया। भोजन करने तथा परम संतुष्ट होने के बाद वह राजा के पास आई। उस अत्यंत सुसज्जित तथा आकर्षक मुख वाली को देखकर राजा ने उसका तन्मयता से अभिनंदन किया।

3 रानी पुरञ्जनी न

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अध्याय छब्बीस -- राजा पुरञ्जन का आखेट के लिए जाना और रानी का क्रुद्ध होना

1-3 नारद मुनि ने आगे कहा : हे राजन, एक बार राजा पुरञ्जन ने अपना विशाल धनुष लिया और सोने का कवच धारण करके तरकस में असंख्य तीर भरकर वह अपने ग्यारह सेनापतियों के साथ अपने रथ पर बैठ गया, जिसे पाँच तेज घोड़े खींच रहे थे और पंचप्रस्थ नामक वन में गया। उसने अपने साथ उस रथ में दो विस्फोटक तीर ले लिये। यह रथ दो पहियों तथा एक घूमते हुए धुरे पर स्थित था। रथ पर तीन ध्वजाएँ, एक लगाम, एक सारथी, एक बैठने का स्थान, दो काठी (जुए), पाँच आयुध

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