हिन्दी भाषी संघ (230)

 

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श्रील प्रभुपाद की जय हो ! (All Glories to Sril Prabhupada)

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अध्याय तेरह – श्रीमद भागवत की महिमा

1 सूत गोस्वामी ने कहा: ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, रुद्र तथा मरुतगण दिव्य स्तुतियों का उच्चारण करके तथा वेदों को उनके अंगों, पद-क्रमों तथा उपनिषदों समेत बाँच कर जिनकी स्तुति करते हैं, सामवेद के गायक जिनका सदैव गायन करते हैं, सिद्ध योगी अपने को समाधि में स्थिर करके और अपने को उनके भीतर लीन करके जिनका दर्शन अपने मन में करते हैं तथा जि

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अध्याय बारह – श्रीमदभागवत की संक्षिप्त विषय-सूची

1 सूत गोस्वामी ने कहा: परम धर्म भक्ति को, परम स्रष्टा भगवान कृष्ण को तथा समस्त ब्राह्मणों को नमस्कार करके, अब मैं धर्म के शाश्वत सिद्धान्तों का वर्णन करूँगा।

2 हे ऋषियों, मैं आप लोगों से भगवान विष्णु की अद्भुत लीलाएँ कह चुका हूँ, क्योंकि आप लोगों ने इनके विषय में मुझसे पूछा था। ऐसी कथाओं का सुनना उस व्यक्ति के लिए उचित है, जो वास्तव में मानव है।

3 यह ग्रन्थ उन भगवान श्री हरि का पूर्ण गुणगान करनेवाला है, जो अपने भक्तों के सारे पापों को दूर करने वाल

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अध्याय ग्यारह – महापुरुष का संक्षिप्त वर्णन

1 श्री शौनक ने कहा: हे सूत, आप सर्वश्रेष्ठ विद्वान तथा भगवद्भक्त हैं। अतएव अब हम आपसे समस्त तंत्र शास्त्रों के अन्तिम निर्णय के विषय में पूछते हैं।

2-3 आपका कल्याण हो, कृपा करके हम जिज्ञासुओं को लक्ष्मीपति दिव्य भगवान की नियमित पूजा द्वारा सम्पन्न की जानेवाली क्रिया योग विधि बतायें। कृपा करके यह भी बतलायें कि भक्तगण उनके अंगों, संगियों, आयुधों तथा आभूषणों की किन विशेष भौतिक वस्तुओं से कल्पना करते हैं। भगवान की दक्षतापूर्वक पूजा करके मर्त्य प्राणी अमरता

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अध्याय दस – शिवजी तथा उमा द्वारा मार्कण्डेय ऋषि का गुणगान

1 सूत गोस्वामी ने कहा: भगवान नारायण ने अपनी मोहमयी शक्ति का यह ऐश्वर्यशाली प्रदर्शन नियोजित किया था। इसका अनुभव करके मार्कण्डेय ऋषि ने भगवान की शरण ग्रहण की।

2 श्री मार्कण्डेय ने कहा: हे भगवान हरि, मैं आपके उन चरणकमलों के तलवों की शरण ग्रहण करता हूँ जो उनकी शरण ग्रहण करनेवालों को अभय दान देते हैं। बड़े-बड़े देवता भी आपकी माया से मोहित रहते हैं जो ज्ञान के रूप में उनके समक्ष प्रकट होती है।

3 सूत गोस्वामी ने कहा: एक बार जब शिवजी अपनी पत्नी प

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अध्याय नौ – मार्कण्डेय ऋषि को भगवान की मायाशक्ति के दर्शन

1 सूत गोस्वामी ने कहा: नर के मित्र भगवान नारायण, बुद्धिमान मुनि मार्कण्डेय द्वारा की गई उपयुक्त स्तुति से तुष्ट हो गये। अतएव वे उन श्रेष्ठ भृगुवंशी से बोले।

2 भगवान ने कहा: हे मार्कण्डेय, तुम समस्त विद्वान ब्राह्मणों में श्रेष्ठ हो। तुमने अविचल भक्ति, तपस्या, वेदाध्ययन एवं विधि-विधानों द्वारा परमात्मा पर ध्यान स्थिर करके अपने जीवन को सफल बना लिया है।

3 हम तुम्हारे आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत से पूर्णतया संतुष्ट हैं, तुम्हारा कल्याण हो। मैं समस्

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अध्याय आठ – मार्कण्डेय द्वारा नर-नारायण ऋषि की स्तुति

1 श्री शौनक ने कहा: हे सूत, आप दीर्घायु हों। हे साधु, हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, आप हमसे इसी तरह बोलते रहें। निस्सन्देह, आप ही मनुष्यों को उस अज्ञान से निकलने का मार्ग दिखा सकते हैं जिसमें वे विचरण कर रहे हैं।

2-5 विद्वानों का कहना है कि मृकण्डु के पुत्र मार्कण्डेय ऋषि, अति दीर्घ आयु वाले मुनि थे और ब्रह्मा के दिन के अन्त होने पर वे ही एकमात्र बचे हुए थे जबकि सारा ब्रह्माण्ड प्रलय की बाढ़ में जलमग्न हुआ था। किन्तु यही मार्कण्डेय ऋषि, जोकि भृगुवंश

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अध्याय सात – पौराणिक साहित्य

1 सूत गोस्वामी ने कहा: सुमन्तु ऋषि, ने अथर्ववेद संहिता अपने शिष्य कबन्ध को पढ़ाई जिसने इसे पाठ्य और वेददर्श से कहा।

2 शौक्लायनी, ब्रह्मवलि, मोदोष तथा पिप्पलायनि वेददर्श के शिष्य थे। मुझसे पथ्य के भी शिष्यों के नाम सुनो। हे ब्राह्मण, वे हैं---कुमुद, शुनक तथा जाजलि। वे सभी अथर्ववेद को अच्छी तरह जानते थे।

3 बभ्रु तथा सैंधवायन नामक शुनक के शिष्यों ने अपने गुरु द्वारा संकलित अथर्ववेद के दो भागों का अध्ययन किया। सैंधवायन के शिष्य सावर्ण तथा अन्य ऋषियों के शिष्यों ने भी अथर्

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अध्याय छह - महाराज परीक्षित का निधन

1-10 सूत गोस्वामी ने कहा: व्यासदेव के पुत्र, स्वरूपसिद्ध तथा समदृष्टि वाले श्रील शुकदेव गोस्वामी द्वारा जो कहा गया था उसे सुनकर महाराज परीक्षित नम्रतापूर्वक उनके चरणकमलों के पास गये। मुनि के चरणों पर अपना शीश झुकाते हुए, हाथ जोड़े, जीवन-भर भगवान विष्णु के संरक्षण में रह चुके राजा परीक्षित ने इस प्रकार कहा।   महाराज परीक्षित ने कहा: आपने आदि तथा अन्त से रहित भगवान हरि की यह कथा सुना कर मुझ पर इतनी महती कृपा प्रदर्शित की है कि मुझे अपने जीवन का लक्ष्य प्राप्त हो ग

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अध्याय पाँच – महाराज परीक्षित को श्रील शुकदेव गोस्वामी का अन्तिम उपदेश

1 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा: इस श्रीमदभागवत की विविध कथाओं में भगवान हरि का विस्तार से वर्णन हुआ है जिनके प्रसन्न होने पर ब्रह्माजी उत्पन्न होते हैं और उनके क्रोध से रुद्र का जन्म होता है।

2 हे राजन, तुम यह सोचने की पशु-मनोवृत्ति कि, “मैं मरने जा रहा हूँ" त्याग दो। तुम शरीर से सर्वथा भिन्न हो क्योंकि तुमने जन्म नहीं लिया है। विगतकाल में ऐसा कोई समय नहीं था जब तुम नहीं थे और तुम विनष्ट होनेवाले भी नहीं हो।

3 तुम अपने ही पुत

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अध्याय चार – ब्रह्माण्ड के प्रलय की चार कोटियाँ

1 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा: हे राजन, मैं पहले ही तुम्हें एक परमाणु की गति से मापे जाने वाले सबसे छोटे अंश से लेकर ब्रह्मा की कुल आयु तक काल की माप बतला चुका हूँ। मैंने ब्रह्माण्ड के इतिहास के विभिन्न युगों की माप भी बतला दी है। अब ब्रह्मा के दिन तथा प्रलय की प्रक्रिया के विषय में सुनो।

2 चार युगों के एक हजार चक्रों से ब्रह्मा का एक दिन होता है, जो कल्प कहलाता है। हे राजा, इस अवधि में चौदह मनु आते-जाते हैं।

3 ब्रह्मा के एक दिन के बाद, उनकी रात क

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भूमि गीत (12.3)

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अध्याय तीन – भूमि गीत

1 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा: इस जगत के राजाओं को अपने पर विजय प्राप्त करने के प्रयास में जुटे देखकर, पृथ्वी हँसने लगी। उसने कहा: “जरा देखो तो इन राजाओं को जो मृत्यु के हाथों में खिलौनों जैसे हैं, मुझ पर विजय पाने की इच्छा कर रहे हैं।"

2 मनुष्यों के महान शासक, यहाँ तक कि जो विद्वान भी हैं, भौतिक कामेच्छा के कारण हताशा तथा असफलता को प्राप्त होते हैं। ये राजा काम से प्रेरित होकर, मांस के मृत पिण्ड में, जिसे हम शरीर कहते हैं, अत्यधिक आशा तथा श्रद्धा रखते हैं यद्यपि भौतिक ढाँ

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अध्याय दो – कलियुग के लक्षण

1 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा: हे राजन, तब कलियुग के प्रबल प्रभाव से धर्म, सत्य, पवित्रता, क्षमा, दया, आयु, शारीरिक बल तथा स्मरणशक्ति दिन प्रतिदिन क्षीण होते जायेंगे।

2 कलियुग में एकमात्र सम्पत्ति को ही मनुष्य के उत्तम जन्म, उचित व्यवहार तथा उत्तम गुणों का लक्षण माना जायेगा। कानून तथा न्याय तो मनुष्य के बल के अनुसार ही लागू होंगे।

3 पुरुष तथा स्त्रियाँ केवल ऊपरी आकर्षण के कारण एकसाथ रहेंगे और व्यापार की सफलता कपट पर निर्भर करेगी। पुरुषत्व तथा स्त्रीत्व का निर्णय कामश

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अध्याय एक – कलियुग के पतित वंश

1-2 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा: हमने इसके पूर्व मागध वंश के जिन भावी शासकों के नाम गिनाए उनमें अन्तरिम राजा पुरञ्जय था, जो बृहद्रथ के वंशज के रूप में जन्म लेगा। पुरञ्जय का मंत्री शुनक राजा की हत्या करके अपने पुत्र प्रद्योत को सिंहासनारूढ़ करेगा। प्रद्योग का पुत्र पालक होगा और उसका पुत्र विशाखयूप होगा जिसका पुत्र राजक होगा।

3 राजक का पुत्र नन्दिवर्धन होगा और प्रद्योतन वंश में पाँच राजा होंगे जो 138 वर्षों तक पृथ्वी का भोग करेंगे।

4 नन्दिवर्धन का शिशुनाग नामक पुत्र

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अध्याय इकतीस – भगवान श्रीकृष्ण का अन्तर्धान होना

1 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा : तब ब्रह्माजी, शिवजी--उनकी प्रेयसी भवानी, मुनियों, प्रजापतियों तथा इन्द्रादि देवताओं सहित, प्रभास आये।

2-3 भगवान का प्रस्थान देखने के लिए चारणों, यक्षों, राक्षसों, किन्नरों, अप्सराओं तथा गरुड़ के सम्बन्धियों को साथ लेकर पितरगण, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर तथा बड़े बड़े सर्प भी आये। आते समय वे सभी व्यक्ति भगवान शौरी (कृष्ण) के जन्म तथा लीलाओं का कीर्तन और उनकी महिमा का गायन कर रहे थे।

4 हे राजन, उन्होंने आकाश में अपने विमा

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अध्याय तीस -- यदुवंश का संहार

1 राजा परीक्षित ने कहा : जब महान भक्त उद्धव जंगल चले गये तो समस्त जीवों के रक्षक भगवान ने द्वारका नगरी में क्या किया?

2 ब्राह्मणों के शाप से अपने ही वंश के नष्ट हो जाने के बाद, यदुओं में श्रेष्ठ भगवान ने किस तरह अपना शरीर छोड़ा जो सारे नेत्रों की परमप्रिय वस्तु था।

3 एक बार उनके दिव्य रूप पर अपनी आँखें गड़ा देने पर, स्त्रियाँ उन्हें हटा पाने में असमर्थ होती थीं और यदि वह रूप एक बार मुनियों के हृदयों में प्रवेश कर जाता, तो फिर वह हटाये नहीं हटता था। ख्याति पाने के विषय

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भक्तियोग (11.29)

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अध्याय उन्तीस – भक्तियोग

1 श्री उद्धव ने कहा: हे भगवान अच्युत, मुझे भय है कि आपके द्वारा वर्णित योग-विधि उस व्यक्ति के लिए अत्यन्त कठिन है, जो अपने मन को वश में नहीं रख सकता। इसलिए आप सरल शब्दों में यह बतायें कि कोई व्यक्ति किस तरह इसे अधिक आसानी से सम्पन्न कर सकता है।

2 हे कमलनयन भगवान, सामान्यतया जो योगीजन मन को स्थिर करने का प्रयास करते हैं, उन्हें समाधि की दशा पूर्ण कर पाने की अपनी अक्षमता के कारण, निराशा का अनुभव करना पड़ता है। इस तरह वे मन को अपने वश में लाने के प्रयास में उकता जाते हैं।

3

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ज्ञानयोग (11.28)

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अध्याय  अट्ठाईस -- ज्ञानयोग

1 भगवान ने कहा: प्रकृति तथा भोक्ता आत्मा परम सत्य पर आश्रित हैं। अतः मनुष्य को किसी अन्य व्यक्ति के स्वभाव तथा कर्मों की न तो प्रशंसा न ही आलोचना करनी चाहिए।

2 जो भी व्यक्ति दूसरों के गुणों तथा आचरण की प्रशंसा करता है या आलोचना करता है, वह मायामय द्वैतों में फँसने के कारण – उत्तमोत्तम हित से शीघ्र विपथ हो जाएगा।

3 जिस तरह देहधारी आत्मा की इन्द्रियाँ स्वप्न देखने के भ्रम या मृत्यु जैसी गहरी निद्रावस्था के द्वारा परास्त हो जाती हैं, उसी तरह भौतिक द्वन्द्व का अनुभव करनेवा

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अध्याय सत्ताईस – देवपूजा विषयक श्रीकृष्ण के आदेश

1 श्री उद्धव ने कहा : हे प्रभु, हे भक्तों के स्वामी, कृपा करके मुझे आपके अर्चाविग्रह रूप में पूजा की नियत विधि बतायें। अर्चाविग्रह की पूजा करने वाले भक्तों की क्या योग्यताएँ होती हैं? ऐसी पूजा किस आधार पर तय की जाती है? तथा पूजा की विशिष्ट विधि क्या है?

2 सारे मुनि बारम्बार घोषित करते हैं कि ऐसी पूजा से मनुष्य जीवन का बड़े-से-बड़ा सम्भव लाभ मिलता है। नारद मुनि, महान व्यासदेव तथा मेरे गुरु बृहस्पति का यही मत है।

3-4 हे वदान्य प्रभु, अर्चाविग्रह की पूज

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ऐल गीत (11.26)

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अध्याय छब्बीस – ऐल गीत

1 भगवान ने कहा: मानव-जीवन मेरा साक्षात्कार करने का अवसर प्रदान करता है। मेरी प्रेमाभक्ति में स्थित होकर, मनुष्य मुझे प्राप्त कर सकता है, जो समस्त आनन्द का आगार तथा प्रत्येक जीव के हृदय में वास करनेवाला परमात्मा स्वरूप है।

2 दिव्य ज्ञान में स्थिर व्यक्ति प्रकृति के गुणों के फलों से अपनी झूठी पहचान त्यागकर, बद्ध जीवन से मुक्त हो जाता है। इन फलों को मात्र मोह समझकर उन्हीं के बीच निरन्तर रहते हुए भी वह प्रकृति के गुणों में फँसने से अपने को बचाता है। चूँकि गुण तथा उनके फल सत्य न

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अध्याय पच्चीस – प्रकृति के तीन गुण तथा उनसे परे

1 भगवान ने कहा : हे पुरुषश्रेष्ठ, मैं तुमसे वर्णन करूँगा कि जीव किस तरह किसी भौतिक गुण की संगति से विशेष स्वभाव प्राप्त करता है। तुम उसे सुनो।

2-5 मन तथा इन्द्रिय संयम, सहिष्णुता, विवेक, नियत कर्म का पालन, सत्य, दया, भूत तथा भविष्य का सतर्क अध्ययन, किसी भी स्थिति में सन्तोष, उदारता, इन्द्रियतृप्ति का परित्याग, गुरु में श्रद्धा, अनुचित कर्म करने पर व्यग्रता, दान, सरलता, दीनता तथा अपने में सन्तोष – ये सतोगुण के लक्षण है। भौतिक इच्छा, महान उद्योग, मद,

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