Priya Sakhi Devi Dasi's Posts (52)

आपसे सूना ये असीम अम्बर

इसकी भला क्या हमें जरुरत

आपकी कभी न दिखे है छवि

फिर क्यों रोज उगता है ये रवि.

चाहूं कि बादल में, पानी में

हर जगह ही आपको मै देखूं.

पर अब तक आप दिखे न मुझे

ये देखने की कला कैसे मै सीखूं.

पानी का स्वाद या चाँद की चाँदनी

हर जगह ही आप मौजूद सदा है.

ये हवाओं के झोकें, ये बादल की बूंदे

ये सब भी तो आपकी ही अदा है.

मुझ जैसे अज्ञानी, अधम पापी को

कण-कण में आप दिख पाते नही.

जहाँ लेकर गैया बजाये आप वंशी

प्रभु मुझे भी वहीँ क्यों बुलाते नही.

मुझे भी वहीँ क्यों बुलाते नही..........................

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जहाँ भी गए हम इस जहां  में

जरूरतों के रिश्ते

 नाते है बिकते.

पर उस जहां की जो सुनी

मैंने कहानी जहाँ

रिश्ते जन्मों तक है निभते.

लेने को सब यहाँ मर रहे हैं

सुना है वहाँ देने की

होड़ है होती.

गम की वहाँ चर्चा भी नही

खुशियाँ ही कभी-कभी

पलकें भिगोती.

वहाँ चलता नही कोई

नाचते हैं सब

बोलने में भी गाते हैं.

ये सूर

ये मीरा जो हुए यहाँ

वे उसी जहां से तो आते हैं.

इस जहाँ से कितना

अलग वो जहां 

जाने को वहाँ कब तड़पेगा मन मेरा

मेरे इस मलिन मन ने तो

इसी जहां में

बना लिया है अपना रैन बसेरा.

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ये मुरलीवाला, नंद का लाला

ब्रज का ये सुन्दर-सा  ग्वाला.

जिसके इशारों पे नाचे ये सृष्टि

नचा रही हैं उसे ब्रज की बाला.

होगा ये परमेश्वर वैकुंठ में अपने

यहाँ तो है इसने माखन चुराया.

बचना है तो भागना ही पड़ेगा

सुदर्शन भी नही यहाँ काम आया.

ज्ञानी, ध्यानी जन्मों  लगाकर

जिसका ध्यान अपनी ओर खींचे.

वेद-पुराण गाये जिनके गान वो

भाग रहा है देखों गायों के पीछे.

स्तुति नही मिल रही है गाली

मैया की मार भी खानी पड़ती.

फिर भी प्रभु को  तीनों लोकों में

सबसे प्यारी है ब्रज की धरती.

प्रभु के इस घर आँगन में अगर

रहने का कभी भाग्य मिले मुझे.

करोड़ों जन्म मै राह तकूँ कभी

माखन चुराते वे दिख जाए मुझे.

कभी माखन चुराते वे दिख जाए मुझे...............

!!कभी माखन चुराते वे दिख जाए मुझे...............!!

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दिल के किसी एक कोने का खालीपन

सारी दुनिया के सुख से भी जाता नही.

हर मंजिल के बाद भी जो रह जाए शेष

जग का कोई रिश्ता उसे भर पाता नही.

हमेशा ही लगता कि कमी है किसी की

किसी का मिलना जैसे अभी है बाकी.

प्रतीक्षा किसी की मुझे, किसी को मेरी

जैसे कोई चीज जो है नही इस जहाँ की.

जैसे कोई साथी मेरा  जनम-जनम का

अब भी रहता जैसे हर पल साथ वो मेरे.

जैसे वो जानता मुझे मुझसे भी ज्यादा

उससे रिश्ता ऐसा जो है हर रिश्ते से परे.

पता लगाया तो  पता चला है ये राज मुझे

उससे ही जन्मी उसकी ही एक अंश हूँ मै.

वो रहता सदा दिल में मेरे  बनकर साथी

हर जगह हर शख्स में जिसे  ढूंढती रही मै.

उसकी जगह कोई ले नही पाया अब तक

क्योंकि उसके जैसा यहाँ कोई है ही नही.

ये तो बस अपना मुरलीवाला ही है जो

हर जन्म, हर रिश्ते में उतरे सदा ही सही.

!!जैसे कोई साथी मेरा जनम-जनम का, अब भी रहता जैसे हर पल साथ वो मेरे!!

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हम जग में रहे ये तो सही बात है

पर हममें बसे जग ये ठीक नही.

जितना जरुरी निभाये हम तन से

पर बसा न ले दुनिया मन में कहीं

मन से मनन सदा मोहन का हो

चित्त भी करे  उनका ही चिंतन.

मन से हम किसको मान रहे हैं

इसपे नही है दुनिया का नियंत्रण.

मोहन तो मन को ही पढ़ लेते है

उनके समक्ष क्या करना प्रदर्शन.

होगी तड़प और लालसा मन में

तो दे देंगे एकदिन वे हमें दर्शन.

!!मोहन तो मन को ही पढ़ लेते है, उनके समक्ष क्या करना प्रदर्शन !!

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आत्माराम हैं, आप्तकाम हैं

आप तो कहलाते हैं निजानंद.

कहीं से लाने की जरूरत नही

आप में ही, आपसे ही है आनंद.

आनंद भरी लीलाएं आपकी

संग में तो है दिव्य आनंद.

विरह में भी है इतना आनंद

इसके आगे फीका ब्रह्मानंद.

दृष्टि से, चरणों से , हाथों से

वितरित करे सदा ही आनंद.

आपके होने का अहसास मात्र

भर देता है जीवन में आनंद.

नख से शिख तक आनंद आनंद

चिदानंद आप , आप सच्चिदानंद.

प्रेम करे वो भी आनंदित हो जाए

सबसे बड़ा आनंद आपका प्रेमानंद.

!! आत्माराम हैं, आप्तकाम हैं आप तो कहलाते हैं निजानंद !!

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खुले आसमान को अपलक मै निहारूँ 

क्योंकि ऊपरवाला कहते हैं सब तुझे.

कभी किसी दिन बन जाए किस्मत 

और तेरी एक झलक मिल जाए मुझे..

कभी कोशिश करूँ मै ह्रदय में झाँकू

कहते हैं लोग कि तू वहाँ भी है रहता.

मन को लगन है कि अब देखूं तुझे 

कहीं से मिल जाये बस मुझे तेरा पता.

कण-कण में है तू, जन-जन में हैं तू 

फिर मेरा मन क्यों खाली है इतना.

क्यों लगता मुझे तू बहुत दूर मुझसे 

इस धरती से अम्बर है दूर जितना.

जीवन में मेरे तेरी कमी है कान्हा पर 

तुझे लाने का जरिया मुझे मालूम नही.

मुझसे न कुछ आस लगा, बस आ जा 

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जिधर दृष्टि डालें हम इस सृष्टि में

हर दिशा विभिन्न रंगों से है सराबोर.

बादलों की गरज, पंछियों का कलरव

एक मधुर संगीत-सा फैला है हर ओर.

लगती है ये दुनिया जैसे कैनवास

हर कोना करीने से सजाया गया  है.

भांति-भांति के हैं रंग रूप इसमें

सही जगह सबको बिठाया गया है.

जैसे कोई हाथों में ले रंग औ कूंची

बड़े प्यार से जग में रंग भर रहा है.

वही है कलाकार, वही है सूत्रधार

जिसके इशारों पे समय चल रहा है.

बारिश में बरसते बादल रिमझिम

उसने ही बनाया तारों की टिमटिम

आसमान के फलक पे उगता सूरज

उसी ने बनाया है ढलता हुआ दिन.

पौधों की हरियाली, फूलों के रंग

संभाले वो पंछियों की अटखेलियाँ .

पशु भी समझ जाते हैं अपनी भाषा

उसी की बनायी है ये मूक बोलियाँ.

धरती का ताप बढ़ जाता है जब

वही तो मेघों को संदेश पठाता है.

हरदिन ही कोई आता है जग में

तो किसी को अपने पास बुलाता है.

नदियों पहुँच जाती है समंदर तक

वही तो बताता है उनको भी रास्ता.

प्रबंध ऐसा, अँधेरा होते ही आने लगे

देखो चाँद तारे आहिस्ता-आहिस्ता.

इतनी विचित्रता,इतनी सुन्दरता

जिसकी कलाकारी है इतनी मोहक.

वो कलाकार अपना कन्हैया भला

होगा कैसा अनुपम,अद्भूत सम्मोहक.

!! जैसे कोई हाथों में ले रंग औ कूंची, बड़े प्यार से जग में रंग भर रहा है !!

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जितनी सीमित और संकीर्ण

है हमारी दुनिया

उतना ही विशाल और विस्तृत

प्रभु का संसार है.

हमारी सोच है सीमित,

हमारे विचार है सीमित

सीमित है हमारे अपने

और सीमित है हमारे प्रेम का दायरा

प्रभु सबके सुहृत हैं

सबकी ही उनको फिक्र है.

सारा जग उनका अपना है

उनकी करुणा असीम, अथाह, अपार है.

हम किसी को कुछ देते

तो कभी भूलते नही.

वे सब कुछ देकर भी सबको

कभी भी किसी को याद नही दिलाते.

मौन रहकर मदद करते

ये हवा, ये पानी, ये साधन-संसाधन उनका ही तो है.

हर चलती हमारी साँस

उनका हमारे साथ होना ही तो है.

हमारी संकीर्ण बुद्धि

कृपा आपकी देख नही पा रही.

फिर भी एक क्षण नही ऐसा

जब कृपा न की हो आपने हरि.

एक और कृपा कर दो प्रभु हम पर

हमें आपकी कृपा हर चीज में दिखे.

छूटे कृपणता, कृतघ्नता के संस्कार

हम आपसे निश्छल प्रेम करना सीखे.

!! हर चलती हमारी साँस उनका हमारे साथ होना ही तो है !!

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समझदारों के समाज में कहते है लोग कि

तीर्थों में बढ़ गए हैं भिखारी.

जहाँ जाओ वहीं माँगने आ जाते कितने

निपटना हो जाता है इनसे भारी.

सही हो सकती है उनकी भी बातें पर

वे भी तो प्रभु से मांगने ही है जाते.

फर्क इतना कि वे मांगते मंदिर के भीतर

शायद इसलिए भिखारी न कहलाते.

 कुछ खाने को, कुछ पहनने को माँगा

तो देते हैं अक्सर उन्हें फटकार

ऊपरवाले के दिए से,दिया गर थोडा तो

इसमें किया क्या हमने उपकार.

पर खुद  जब मांगते हैं प्रभु से ये लोग

मांगों की कोई सीमा न होती.

न कोई उपकार, न कोई अहसान

न ही हया आँखों को कभी धोती.

मंदिर के बाहर इतने भिखारी न होते

जितने मंदिर के भीतर हैं होते.

पर कभी बांकेबिहारी को देखा किसी ने

किसी को भगाते या गाली देते.

भिखारी जब मांगे तो भी कहे

साहिब भगवान् के नाम पर कुछ दे दो

पर ये न नाम लेते न साहिब ही मानते

इनके लिए तो बस दे दो, दे दो.

न करे हम गुमान अपने चंद सिक्कों पर

न करे  अपमान किसी गरीब का.

भगवान् से बड़ा भी भला कोई धनी यहाँ

हर जीव है बच्चा उस अमीर का.

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समझदारों के समाज में कहते है लोग कि

तीर्थों में बढ़ गए हैं भिखारी.

जहाँ जाओ वहीं माँगने आ जाते कितने

निपटना हो जाता है इनसे भारी.

सही हो सकती है उनकी भी बातें पर

वे भी तो प्रभु से मांगने ही है जाते.

फर्क इतना कि वे मांगते मंदिर के भीतर

शायद इसलिए भिखारी न कहलाते.

 कुछ खाने को, कुछ पहनने को माँगा

तो देते हैं अक्सर उन्हें फटकार

ऊपरवाले के दिए से,दिया गर थोडा तो

इसमें किया क्या हमने उपकार.

पर खुद  जब मांगते हैं प्रभु से ये लोग

मांगों की कोई सीमा न होती.

न कोई उपकार, न कोई अहसान

न ही हया आँखों को कभी धोती.

मंदिर के बाहर इतने भिखारी न होते

जितने मंदिर के भीतर हैं होते.

पर कभी बांकेबिहारी को देखा किसी ने

किसी को भगाते या गाली देते.

भिखारी जब मांगे तो भी कहे

साहिब भगवान् के नाम पर कुछ दे दो

पर ये न नाम लेते न साहिब ही मानते

इनके लिए तो बस दे दो, दे दो.

न करे हम गुमान अपने चंद सिक्कों पर

न करे  अपमान किसी गरीब का.

भगवान् से बड़ा भी भला कोई धनी यहाँ

हर जीव है बच्चा उस अमीर का.

!! मंदिर के बाहर इतने भिखारी न होते जितने मंदिर के भीतर हैं होते !!

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राधारमण , श्यामसुंदर, बांकेबिहारी

किसी की भी सूरत न हमने निहारी.

गुजरते-गुजरते साल ही गुजर गया

पर हो न पायी देखो मुलाकात हमारी.

कहते हैं सब मन में बसाओ वृन्दावन

मन से ही यात्रा और मन से ही दर्शन.

पर इन आँखों को मै समझाऊं कैसे

करे जो हर क्षण,ब्रज दर्शन को क्रंदन.

मलिन मन ठहरे नही जो करूं चिंतन

ह्रदय में भी न कोई भाव न है  भक्ति.

न ही है प्रेम प्रभु से, न ही लाड प्रभु से

उस पर  जगत से है इतनी आसक्ति.

ऐसे में तो दर्शन बिना न काम बने

क्योंकि संस्कारों  मै बहुत ही नीचे हूँ.

बड़ी-बड़ी साधना न हो पाती मुझसे

क्योंकि भक्ति में भी बहुत पीछे हूँ.

इस नए साल में एक उपहार दे दो

कि तेरे ब्रज में कुछ दिन बीत जाए.

राधारमण, श्यामसुंदर, बांकेबिहारी

इन नयनों में एकबार फिर से समाये.

!!इस नए साल में एक उपहार दे दो कि तेरे ब्रज में कुछ दिन बीत जाए!!

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दायें हाथ में चाबुक और

लिए बाएं हाथ में लगाम.

हे पार्थसारथी ! आपके सिवा

और किसे करूँ  मै प्रणाम.

जिनकी दृष्टि से सृष्टि

हो जाती है चलायमान.

कैसे हांक रहे स्वयं रथ

कर अर्जुन को विराजमान.

तीनों लोकों के स्वामी

चौदहों भुवनों के पति.

बनकर बैठे हैं सारथी

बनाया  भक्त को रथी.

भक्तों से करे जो ऐसे प्रेम

छोड़ उसको हम किसे भजे.

छोड़ दे भले सारा जग साथ

पर कृष्ण हमें कभी न तजे.

हे भक्तों के पालक, प्रेमी, प्रभु

सेवा में अपनी हमें भी लगा लो.

बिगड़ गई है मेरी मति व गति

आपकी ही हूँ आप ही संभालो.

!!दायें हाथ में चाबुक और लिए बाएं हाथ में लगाम. हे पार्थसारथी ! आपके सिवा और किसे करूँ मै प्रणाम!!

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जल को जितना भी मथ ले कोई

नवनीत कभी भी निकल न पाए.

कृष्ण बिना जो जीए जीवन फिर

जीवन में आनंद भला कैसे आये.

जग में जो सुख सुलभ ही नही

ढूँढने से भी क्या मिल पायेगा.

बबूल के पेड़ पे कितना भी ढूँढे

आम तो उसपे कभी न आएगा.

बिन कृष्ण भजे भला  कैसे मिले

सुख, शांति, प्रेम और भाईचारा.

जड़ से अगर जुड़े ही नही हम तो

फिर कैसे मिले हमें कोई सहारा.

सीधी सी बात जीवन का सूत्र

कृष्ण से जोड़े अपनी टूटी कड़ी.

आह्लादित हो जाता है जीवन

मान लेते उन्हें अपना जिस घड़ी.

!!जल को जितना भी मथ ले कोई, नवनीत कभी भी निकल न पाए!!

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ये रथ जा रहा किस ओर

कहाँ चले हे नंदकिशोर.

जा रहा क्यूं व्रज को तू छोड़

हमसे सारे रिश्तों को तोड़.

 

ज़रा बता दे गलती हमारी

हो गया क्या हमसे कसूर.

क्षण का विरह सहा नही जाता

जा रहा तू अब इतनी दूर.

 

दिन को बांसुरी बजा बुलाया

रात को संग में रास रचाया.

कैसी आग लगी मथुरा में कि

तूने आज वो सब कुछ भुलाया.

 

प्यार था तेरा या था छलावा

अपनापन का था वो दिखावा.

हम तो ठहरी गावं की ग्वालन

प्रेम समझ उसे सिर पे चढ़ाया.

 

व्रज के रक्षक कहलाते थे और

आज प्राण हमारे लिए जा रहे.

हम हुए थे तेरे सबको छोड़

आज जाके अपनी किसे कहे.

 

निकुंज की बातें,कुञ्ज की क्रीड़ा

क्या सब थी वो तेरी चाल.

हो गए तुम कैसे निर्मोही कि

दिखता नही तुझे हमारा हाल.

 

बिन देखे तुझे मर भी न पाए

जीने की तो आस ही नही.

सोचना भी हो रहा है दुष्कर

कि होगा कान्हा पास नही.

 

यूँ न हम तुझे जाने देंगी

रोक दो रथ यही-का-यही.

हमसे होकर गुजरेगा होगा

अगर तुझे जाना है कही.

 

तुझसे हम और तू ही न हो

ऐसी जिंदगी हम क्या करे.

तेरे बिना जीने से अच्छा

सामने ही हम तेरे मरे.

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क्यूँ भेजा मुझे मथुरा मैया
कोई कहे न मुझे कन्हैया.
ये ठाट-बाट भये न मुझको
लौटा दे मेरी लटुकी और गैया.
न यहाँ यमुना,यहाँ मधुवन 
न व्रजवालों-सा चितवन.
सब कहे हैं ईश्वर मुझको
कोई सुने न मेरा क्रंदन.
सुबह कलेवा,दिन का भोजन
व्रज का वो मिस्री और माखन.
जब मथुरा सारी करे शयन
तब याद कर भीगे मेरे नयन .
मुरली बजाना भूल ही गया
राग तो सारे व्रज में ही छूटे.
रूठ गयी मुरली मुझसे मैया
तिस पर तुम सब भी हो रूठे.
क्यूं भेजा मुझे मथुरा मैया..........
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आँसू जो तेरे चरणों के लिए
वो तकलीफों में बह रहे हैं.
रोना था हमें तेरे लिए प्रभु
पर अपनी परेशानियों पे रो रहे हैं.

तेरा विरह मुझे
बेचैन नही कर पाता उतना .
ये संसार,ये माहौल
कर जाता है जितना.

तेरे मिलन की तड़प
अभी भी इस कदर न तडपाये
कि बाकी सारे सुख-दुःख
मुझे नजर ही न आये.

भक्ति के एक भी चिह्न
मुझमे दिखाई नही देते.
सुध बनी रहती है अब भी
तेरे नाम लेते-लेते.

कब मेरी भक्ति की शुरुआत होगी
कब होठों पे मेरे तेरी ही बात होगी.
कब खुले आँखों से तेरे दर्शन होंगे
कब स्वप्न में भी मुलाकात होगी.

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जाने क्यों संसार के इन बंधनों में
आत्मा को घुटन-सी होती है.
भौतिक बातें तो दिलोदिमाग
को जल्दी-ही थका जाती हैं

ये माया हमारी भक्ति को
परख रही है .
या प्रभु के प्रेम से
विरक्ति उपज रही है.

दुविधा खड़ी हो जाती है
हर एक कदम उठाने पर.
कही ये प्रभु से दूर न जाए
कुछ भी न बचे आने तक.


जो भी हो संभालना मुश्किल है
दोनों को साथ ले चलना मुश्किल है.
दोनों को कैसे मै दिल से लगाऊं
मेरे पास एक -ही तो दिल है.

कान्हा तुझे मै छोड़ नही सकती
और दूसरे को भी साथ ले चलना है.
मेरे वश में कुछ भी न रहा अब
अब जो भी है तुझे ही करना है.

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देखो आज बरसाने में
बरस रहा है कैसा ये प्यार
गोलोक से आ गई है राधिका
लिए साथ अपने भक्ति का संसार

राधा गोरी,अपनी किशोरी
लिया है जग में अवतार
वृषभानु के अंगने में देखो
सज रहा है वंदनवार

खुश है सारे व्रज के वासी
बधाई हो रही हर द्वार
देवगण भी कर रहे हैं
कैसे पुष्पों की बौछार

धरती पे आ गई हैं
सारी सृष्टि की पटरानी
जय हो जय हो जय हो
जय हो श्री राधे महारानी

जय जय श्री राधे
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!! राधे राधे !!

क्या बोले कान्हा की धडकन
किसको ढूंढें कान्हा निधिवन
कौन चुराए कान्हा का चितवन
कौन समाया कान्हा के मन

किसको पुकारे मुरली की धुन
दौड़े कान्हा किसकी आहट सुन
वृन्दावन में गूंजे किसकी रुनझुन
ब्रज की भूमि गाये किसके गुण

इन सबका है एक ही जवाब
राधे राधे!! राधे राधे !!
राधे राधे!! राधे राधे !!
राधे राधे!! राधे राधे !!


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