मूल:
मूढ़ जहीहि धनागमतृष्णां कुरू सद्-बुद्धिं मनसि वितृष्णाम्।
यल्लभसे निजकर्मोपात्तं वित्तं तेन विनोदय चित्तमं॥
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढ़्मते।
हिन्दी:
राग न रख धन के संचय में, हो वितृष्ण धर सुमति हृदय में।
अर्जित हो जो धन स्वकर्म से, रह उससे आनन्द अभय में॥
भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़्मते।
श्री शंकराचार्य ने अपने पहले श्लोक में संसारी प्राणियों को यह चेतावनी दी थी कि पांडित्य और उससे मिलने वाली ख्याति के लोभ में पड़ कर ईश्वर को मत भूलो। इसके बाद इस दूसरे श्लोक में वो लोगों को धन
