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श्री गुरु गौरांग जयतः

श्रीमद भगवद्गीता यथारूप

अध्याय पन्द्रह पुरुषोत्तम योग

https://www.youtube.com/watch?v=e33nvksOLbo&t=34s

1. भगवान ने कहा—कहा जाता है कि एक शाश्र्वत अश्र्वत्थ वृक्ष है, जिसकी जड़े तो ऊपर की ओर हैं और शाखाएँ नीचे की ओर तथा पत्तियां वैदिक स्रोत हैं। जो इस वृक्ष को जानता है, वह वेदों का ज्ञाता है।

2. इस वृक्ष की शाखाएँ ऊपर तथा नीचे फैली हुई हैं और प्रकृति के तीन गुणों द्वारा पोषित हैं। इसकी टहनियाँ इंद्रियविषय हैं। इस वृक्ष की जड़ें नीचे की ओर भी जाती है, जो मानवसमाज के सकाम कर्मों से बँधी हुई हैं।

3-4. इस वृक्ष के वास्तविक स्वरूप का अनुभव इस जगत में नहीं किया जा सकता। कोई भी नहीं समझ सकता कि इसका आदि कहाँ है, अंत कहाँ है या इसका आधार कहाँ है ? लेकिन मनुष्य को चाहिए कि इस दृढ़ मूल वाले वृक्ष को विरक्ति के शस्त्र से काट गिराए। तत्पश्चात उसे ऐसे स्थान की खोज करनी चाहिए जहां जाकर लौटना न पड़े और जहां उस भगवान की शरण ग्रहण कर ली जाये, जिससे अनादि काल से प्रत्येक वस्तु का सूत्रपात तथा विस्तार होता आया है।

5. जो झूठी प्रतिष्ठा, मोह तथा कुसंगति से मुक्त हैं, जो शाश्र्वत तत्व को समझते हैं, जिन्होंने भौतिक काम को नष्ट कर दिया है, जो सुख तथा दुख के द्वंद से मुक्त हैं और जो मोहरहित होकर परम पुरुष के शरणागत होना जानते हैं, वे उस शाश्र्वत राज्य को प्राप्त होते हैं।

6. वह मेरा परमधाम न तो सूर्य या चंद्रमा के द्वारा प्रकाशित होता है और न अग्नि या बिजली से। जो लोग वहाँ पहुँच जाते हैं, वे इस भौतिक जगत में फिर से लौट कर नहीं आते।

7. इस बद्ध जगत में सारे जीव मेरे शाश्र्वत अंश हैं। बद्ध जीवन के कारण वे छहों इंद्रियों से घोर संघर्ष कर रहे हैं, जिनमें मन भी सम्मिलित है।

8. इस संसार में जीव अपनी देहात्म बुद्धि को एक शरीर से दूसरे शरीर में उसी तरह ले जाता है, जिस तरह वायु सुगंधी को ले जाता है। इस प्रकार वह एक शरीर धारण करता है और फिर इसे त्याग कर दूसरा शरीर धारण करता है।

9. इस प्रकार दूसरा स्थूल शरीर धारण करके जीव विशेष प्रकार का कान, आँख, जीभ, नाक तथा स्पर्श इंद्रिय (त्वचा) प्राप्त करता है, जो मन के चारों ओर सुंपुंजित हैं। इस प्रकार वह इंद्रियविषयों के एक विशिष्ट समुच्चय का भोग करता है।

10. मूर्ख न तो समझ पाते हैं कि जीव किस प्रकार अपना शरीर त्याग सकता है, न ही वे यह समझ पाते हैं कि प्रकृति के गुणों के अधीन वह किस तरह के शरीर का भोग करता है। लेकिन जिसकी आँखें ज्ञान में प्रशिक्षित होती हैं, वह यह सब देख सकता है।

11. आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त प्रयत्नशील योगीजन यह सब स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। लेकिन जिनके मन विकसित नहीं हैं और जो आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त नहीं हैं, वे प्रयत्न करके भी यह नहीं देख पाते कि क्या हो रहा है।

12. सूर्य का तेज जो सारे विश्व के अंधकार को दूर करता है, मुझसे ही निकलता है। चंद्रमा तथा अग्नि के तेज भी मुझसे उत्पन्न हैं।

13. मैं प्रत्येक लोक में प्रवेश करता हूँ और मेरी शक्ति से सारे लोक अपनी कक्षा में स्थित रहते हैं। मैं चंद्रमा बनकर समस्त वनस्पतियों को जीवन-रस प्रदान करता हूँ।

14. मैं समस्त जीवों के शरीरों में पाचन-अग्नि (वैश्र्वानर) हूँ और मैं श्र्वास-प्रश्र्वास (प्राण-वायु) में रहकर चार प्रकार के अन्नों को पचाता हूँ।

15. मैं प्रत्येक जीव के हृदय में आसीन हूँ और मुझसे ही स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति होते है। मैं ही वेदों के द्वारा जानने योग्य हूँ। निस्संदेह मैं वेदान्त का संकलनकर्ता तथा समस्त वेदों का जानने वाला हूँ।

16. जीव दो प्रकार के हैं—च्युत तथा अच्युत। भौतिक जगत में प्रत्येक जीव च्युत (क्षर) होता है और आध्यात्मिक जगत में प्रत्येक जीव अच्युत (अक्षर) कहलाता है।

17. इन दोनों के अतिरिक्त, एक परम पुरुष परमात्मा है, जो साक्षात अविनाशी भगवान है और जो तीनों लोकों में प्रवेश करके उनका पालन कर रहा है।

18. चूँकि मैं क्षर तथा अक्षर दोनों के परे हूँ और चूँकि मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ, अतएव मैं इस जगत में तथा वेदों में परम पुरुष के रूप में विख्यात हूँ।

19. जो कोई भी मुझे संशयरहित होकर पुरषोत्तम भगवान के रूप में जानता है, वह सब कुछ जानने वाला है। अतएव हे भरतपुत्र ! वह व्यक्ति मेरी पूर्ण भक्ति में रत होता है।

20. हे अनघ ! यह वैदिक शास्त्रों का सर्वाधिक गुप्त अंश है, जिसे मैंने अब प्रकट किया है। जो कोई इसे समझता है, वह बुद्धिमान हो जाएगा और उसके प्रयास पूर्ण होंगे।

(समर्पित एवं सेवारत -- जगदीश चन्द्र चौहान)

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