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अध्याय आठ - भगवान नृसिंह द्वारा असुरराज का वध

1 नारद मुनि ने आगे कहा : सारे असुरपुत्रों ने प्रह्लाद महाराज के दिव्य उपदेशों की सराहना की और उन्हें अत्यंत गंभीरतापूर्वक ग्रहण किया। उन्होंने षंड तथा अमर्क नामक अपने गुरुओं द्वारा दिये गये भौतिकतावादी उपदेशों का तिरस्कार कर दिया।

2 जब शुक्राचार्य के पुत्र षंड तथा अमर्क ने देखा कि सारे विद्यार्थी असुर पुत्र प्रह्लाद महाराज की संगति से कृष्णभक्ति में आगे बढ़ रहे हैं, तो वे डर गये। अतएव वे असुरराज के पास गये और उनसे सारी स्थिति यथावत वर्णन कर दी।

3-4 जब हिरण्यकशिपु सारी स्थिति समझ गया तो वह इतना अधिक क्रुद्ध हुआ कि उसका सारा शरीर काँपने लगा। इस तरह उसने अंततः अपने पुत्र प्रह्लाद को मार डालने का निश्र्चय कर लिया। हिरण्यकशिपु स्वभाव से अत्यंत क्रूर था और अपने को अपमानित हुआ जानकर, वह पाँव से कुचले सर्प की भाँति फुफकारने लगा। उसका पुत्र प्रह्लाद शांत, विनम्र तथा भद्र था, वह इंद्रियसंयमी था और हिरण्यकशिपु के समक्ष हाथ जोड़े खड़ा था। वह अपनी आयु तथा आचरण के अनुसार प्रताड़ना के योग्य न था। फिर भी हिरण्यकशिपु ने टेढ़ी नजर से उसे घूरते हुए निम्नलिखित कटु शब्दों के द्वारा फटकारा।

5 हिरण्यकशिपु ने कहा : अरे उदण्ड, निपट दुर्बुद्धि, परिवार को कलंकित करनेवाले! अरे नीच! तुमने अपने ऊपर शासन करने वाली शक्ति का उल्लंघन किया है, अतएव तू हठी मूर्ख है। आज मैं तुझे यमराज के घर भेजूँगा।

6 अरे दुष्ट पुत्र प्रह्लाद! तुम जानते हो कि जब मैं क्रुद्ध होता हूँ तो तीनों लोक अपने-अपने नायकों सहित काँपने लगते हैं। तो फिर तुम किसके बल पर इतने धृष्ट हो गये हो कि तुम निर्भीक होकर मेरी आज्ञा का उल्लंघन कर रहे हो?

7 प्रह्लाद महाराज ने कहा, हे राजन, आप जिस बल के मेरे स्रोत को जानना चाह रहे हैं वही आपके बल का भी स्रोत है। निस्संदेह, समस्त प्रकार के बलों का मूल स्रोत एक ही है। वह न केवल आपका या मेरा बल है, अपितु सबों का एकमात्र बल है। उसके बिना किसी को कोई बल नहीं मिल सकता। चाहे चल हो या अचल, उच्च हो या नीच, ब्रह्मा समेत सारे जीव पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान के बल द्वारा नियंत्रित हैं।

8 परम नियंता एवं काल-रूप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान इंद्रियों के बल, मन के बल, शरीर के बल तथा इंद्रियों के प्राण हैं। उनका प्रभाव असीम है। वे समस्त जीवों में श्रेष्ठ तथा प्रकृति के तीनों गुणों के नियंता हैं। वे अपनी शक्ति से इस ब्रह्मांड का सृजन, पालन तथा संहार करते हैं।

9 प्रह्लाद महाराज ने कहा : हे पिता, आप अपनी आसुरी प्रवृत्ति त्याग दें। आप अपने हृदय में शत्रु-मित्र में भेदभाव न लाएँ, आप अपने मन को सबों के प्रति समभाव बनाएँ। इस संसार में अनियंत्रित तथा पथभ्रष्ट मन के अतिरिक्त कोई शत्रु नहीं है। जब कोई मनुष्य प्रत्येक व्यक्ति को समानता के स्तर पर देखता है तभी वह भगवान की ठीक से पूजा करने की स्थिति में होता है।

10 प्राचीन काल में आपके समान ही अनेक मूढ़ हुए हैं जिन्होंने उन छह शत्रुओं को नहीं जीता जो शरीर की धन-संपदा को चुरा ले जाते हैं। वे मूढ़ यह सोचकर गर्वित होते हैं "मैंने तो दसों दिशाओं के सारे शत्रुओं को जीत लिया है।" किन्तु यदि कोई व्यक्ति इन छह शत्रुओं पर विजयी होता है और सारे जीवों पर समभाव रखता है, तो उसके लिए शत्रु नहीं होते। शत्रु की कल्पना अज्ञानवशता की जाती है।

11 हिरण्यकशिपु ने उत्तर दिया: रे धूर्त! तू मेरे महत्त्व को घटाने का प्रयास कर रहा है मानो तू मुझसे अधिक इंद्रिय-संयमी है। यह अति बुद्धिमत्ता है। अतएव मैं समझ रहा हूँ कि तुम मेरे हाथों मरना चाहते हो, क्योंकि ऐसी बेसिर-पैर की (ऊटपटाँग) बातें वे ही करते हैं, जो मरणा-सन्न होते हैं।

12 अरे अभागे प्रह्लाद! तूने सदैव मेरे अतिरिक्त किसी परम पुरुष का वर्णन किया है,जो हर एक के ऊपर है, हर एक का नियंता है तथा जो सर्वव्यापी है। लेकिन वह है कहाँ? यदि वह सर्वत्र है, तो वह मेरे सामने के इस खंभे में क्यों उपस्थित नहीं है?

13 चूँकि तुम इतना अधिक अनर्गल वार्तालाप कर रहे हो अतएव अब मैं तुम्हारे शरीर से तुम्हारा सिर छिन्न कर दूँगा। अब मैं देखुंगा कि तुम्हारा परम आराध्य ईश्र्वर तुम्हारी रक्षा किस तरह करता है। मैं उसे देखना चाहता हूँ।

14 अतिशय क्रोध के कारण महा-बलशाली हिरण्यकशिपु ने अपने महाभागवत पुत्र को अत्यंत कटु वचन कहे और उसकी भर्त्सना की। उसे बारंबार शाप देते हुए हिरण्यकशिपु अपनी तलवार लेकर, अपने राजसी सिंहासन से उठ खड़ा होकर और अत्यंत क्रोध के साथ खंभे पर मुष्टिका-प्रहार किया।

15 तब उस खंभे से एक भयावह आवाज आई जिससे ब्रह्मांड का आवरण विदीर्ण होता प्रतीत हुआ। हे युधिष्ठिर, यह आवाज ब्रह्मा इत्यादि देवताओं के निवासों तक पहुँच गई और जब देवताओं ने इसे सुना तो उन्होंने सोचा "ओह! अब हमारे लोकों का विनाश होने जा रहा है।"

16-18 अपने ही पुत्र को मारने के इच्छुक हिरण्यकशिपु ने जो इस तरह अपना अद्वितीय शौर्य दिखला रहा था जब एक अद्भुत भीषण (घोर) ध्वनि सुनी जिसे इसके पूर्व उसने कभी नहीं सुना था। इसी ध्वनि को सुनकर अन्य असुरनायक भी भयभीत हुए। उस सभा में इस ध्वनि के उद्गम को कोई नहीं ढूंढ पाया।

17 अपने दास प्रह्लाद महाराज के वचनों को सिद्ध करने के लिए कि वे सत्य हैं---अर्थात यह सिद्ध करने के लिए कि परमेश्र्वर सर्वत्र उपस्थित हैं, यहाँ तक कि सभा भवन के खंभे के भीतर भी हैं---पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्री हरि ने अपना अभूतपूर्व अद्भुत रूप प्रकट किया। यह रूप न तो मनुष्य का था, न सिंह का। इस प्रकार भगवान उस सभाकक्ष में अपने अद्भुत रूप में प्रकट हुए।

18 जब हिरण्यकशिपु उस ध्वनि का स्रोत ढुढ़ने के लिए इधर-उधर देख रहा था तो उस खंभे से भगवान का एक अद्भुत रूप प्रकट हुआ जो न तो मनुष्य का था और न सिंह का माना जा सकता था। हिरण्यकशिपु आश्र्चर्यचकित हुआ, “यह कैसा प्राणी है, जो आधा पुरुष तथा आधा सिंह है?”

19-22 हिरण्यकशिपु ने अपने समक्ष खड़े नृसिंह देव के रूप का निश्र्चय करने के लिए भगवान के रूप को ध्यान से देखा। उनकी क्रुद्ध आँखों के कारण जो पिघले स्वर्ण से मिलती थी वह रूप अत्यंत भयानक लग रहा था; उनके चमकीले अयाल (गर्दन के बाल) उनके भयानक मुखमंडल के आकार को फैला रहे थे; उनके दाँत मृत्यु-जैसे भयानक थे, उनकी उस्तरे जैसी तीक्ष्ण जीभ लड़ाई में तलवार के समान इधर-उधर चल रही थी। उनके कान खड़े तथा स्थिर थे और उनके नथुने तथा खुला मुख पर्वत की गुफा-जैसे लग रहे थे। उनके जबड़े फैले हुए थे जिससे भय उत्पन्न हो रहा था और उनका समूचा शरीर आसमान को छू रहा था। उनकी गर्दन अत्यंत छोटी तथा मोटी थी; उनकी छाती चौड़ी थी तथा कमर पतली थी। उनके शरीर के रोएँ चंद्रमा की किरणों के समान श्र्वेत लग रहे थे। उनकी भुजाएँ चारों दिशाओं में फैले सैनिकों की टुकड़ियों से मिलती जुलती थी, जब वे असुरों धूर्तों तथा नास्तिकों का अपने शंख, चक्र, गदा, कमल तथा अन्य प्राकृतिक अस्त्र-शस्त्रों से वध रहे थे।

23 हिरण्यकशिपु ने मन ही मन कहा :अत्यधिक योग शक्ति वाले भगवान विष्णु ने मेरा वध करने के लिए यह योजना बनाई है, किन्तु ऐसा प्रयास करने से क्या लाभ है? भला ऐसा कौन है,जो मुझसे युद्ध कर सकता है?” ऐसा सोचते हुए हाथी के समान हिरण्यकशिपु ने अपनी गदा उठाकर भगवान पर धावा बोल दिया।

24 जिस तरह एक बेचारा छोटा पतंगा बरबस अग्नि में गिरकर अदृश्य हो जाता है उसी तरह जब हिरण्यकशिपु ने तेजोमय भगवान पर आक्रमण किया तो वह अदृश्य हो गया। यह आश्र्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि भगवान सदैव सतोगुण की स्थिति में रहते हैं। प्राचीन काल में सृष्टि के समय वे अंधकारपूर्ण ब्रह्मांड में प्रविष्ट हो गये थे और उसे उन्होंने अपने आध्यात्मिक तेज से प्रकाशित कर दिया था।

25 तत्पश्र्चात अत्यंत क्रुद्ध उस महान असुर हिरण्यकशिपु ने तेजी से नृसिंह देव पर अपनी गदा से आक्रमण कर दिया और उन्हें मारने लगा। किन्तु भगवान नृसिंह देव ने उस महान असुर को उसकी गदा समेत उसी तरह पकड़ लिया जिस तरह गरुड़ किसी साँप को पकड़ ले।

26 हे भरत के महान पुत्र युधिष्ठिर, जब नृसिंह देव ने हिरण्यकशिपु को अपने हाथ से छूट जाने का अवसर दे दिया, जिस तरह से कभी-कभी गरुड़ साँप के साथ खिलवाड़ करते हुए उसे अपने मुँह से सरक जाने देता है, तो सारे देवताओं ने, जिनके निवास स्थान उनके हाथों से निकल चुके थे और जो असुर के भय से बादलों के पीछे छिपे थे, इस घटना को शुभ नहीं माना। निस्संदेह, वे अत्यधिक व्याकुल थे।

27 जब हिरण्यकशिपु नृसिंह देव के हाथों से छूट गया तो उसे यह मिथ्या विचार हुआ कि भगवान उसके शौर्य से डर गये हैं। अतएव युद्ध से थोड़ा विश्राम करके उसने अपनी ढाल-तलवार निकाली और फिर से अत्यंत बलपूर्वक भगवान पर आक्रमण कर दिया।

28 अट्टहास करते हुए अत्यंत प्रबल तथा शक्तिशाली पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान नारायण ने हिरण्यकशिपु को पकड़ लिया जो किसी प्रकार का वार करने की संभावना छोड़े बिना अपनी तलवार-ढाल से अपनी रक्षा कर रहा था। वह कभी बाज की गति से आकाश में चला जाता और कभी पृथ्वी पर चला आता था। वह नृसिंहदेव के अट्टहास के भय से अपनी आँखें बंद किये था।

29 जिस प्रकार कोई साँप किसी चूहे को या कोई गरुड़ किसी अत्यंत विषैले सर्प को पकड़ ले उसी तरह भगवान नृसिंहदेव ने उस हिरण्यकशिपु को दबोच लिया जिसकी त्वचा में इन्द्र का वज्र भी नहीं घुस सकता था। पकड़े जाने पर ज्योंही वह अत्यंत पीड़ित होकर अपने अंग इधर-उधर तथा चारों ओर छटपटाने लगा त्योंही नृसिंहदेव ने उस असुर को अपनी गोद में दबोच लिया और जांघों का सहारा देकर उस सभा भवन की देहली पर अपने हाथ के नाखूनों से सरलतापूर्वक उस असुर को फाड़ डाला।

30 भगवान नृसिंहदेव के मुख तथा गर्दन के बाल रक्त के छींटों से सने थे और क्रोध से पूर्ण होने के कारण उनकी भयानक आँखों की ओर देख पाना असंभव था। वे अपने मुँह की कोरों को जीभ से चाट रहे थे तथा हिरण्यकशिपु के उदर से निकली आँतों की माला से सुशोभित थे। वे उस सिंह की भाँति प्रतीत हो रहे थे जिस ने अभी-अभी किसी हाथी को मारा हो।

31 अनेकानेक भुजाओं वाले पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान ने सर्वप्रथम हिरण्यकशिपु का हृदय निकाल लिया और उसे एक ओर फेंक दिया। फिर वे असुर के सैनिकों की ओर मुड़े। वे सैनिक हजारों के झुंड में भगवान से लड़ने आये थे और हाथों में हथियार उठाए थे। ये हिरण्यकशिपु के अत्यंत स्वामीभक्त अनुचर थे, किन्तु नृसिंह देव ने उन्हें अपने नाखूनों की नोकों से ही मार डाला।

32 नृसिंह देव के सिर के बालों से बादल हिलकर इधर-उधर बिखर गये। उनकी जलती आँखों से आकाश के नक्षत्रों का तेज मंद पड़ गया और उनके श्र्वास से समुद्र उद्वेलित हो उठे। उनकी गर्जना से संसार के सारे हाथी भय से चिंघाड़ने लगे। नृसिंह देव के सिर के बालों से वायुयान (विमान) बाह्य आकाश तथा उच्च लोकों में जा गिरे। भगवान के चरणकमलों के दबाव से पृथ्वी अपनी स्थिति से छिटकती प्रतीत हुई और उनके असह्य बल से सारे पर्वत ऊपर उछल गये। भगवान के शारीरिक तेज से आकाश तथा समस्त दिशाओं का प्राकृतिक प्रकाश घट गया।

33 अपना पूर्ण तेज तथा भयंकर मुखमंडल दिखलाते हुए नृसिंह देव अत्यंत क्रुद्ध होने तथा अपने बल एवं ऐश्वर्य का सामना करने वाले किसी को न पाकर सभा भवन में राजा के श्रेष्ठतम सिंहासन पर जा बैठे। भय तथा आज्ञाकारिता के कारण किसी में साहस न हुआ कि सामने आकर भगवान की सेवा करे।

35 हिरण्यकशिपु तीनों लोकों का सिरदर्द बना हुआ था। अतएव जब स्वर्गलोक में देवताओं की पत्नियों ने देखा कि इस महान असुर का वध पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान के हाथों से हो गया है, तो उनके चेहरे प्रसन्नता के मारे खिल उठे। देवताओं की स्त्रियों ने स्वर्ग से भगवान नृसिंहदेव पर पुनः पुनः फूलों की वर्षा की।

36 उस समय परमेश्र्वर नारायण का दर्शन करने के इच्छुक देवताओं के विमानों से आकाश पट गया। देवतागण ढोल तथा नगाड़े बजाने लगे जिन्हें सुनकर देवलोक की स्त्रियाँ नाचने लगीं और गन्धर्वों के मुखिया मधुर तान में गाने लगे।

37-39 हे राजा युधिष्ठिर, तब सारे देवता भगवान के निकट आ गये। उनमें ब्रह्माजी, इन्द्र तथा शिवजी प्रमुख थे और उनके साथ बड़े-बड़े साधु पुरुष एवं पितृ, सिद्ध, विद्याधर, नाग, गंधर्व, अप्सरा, चारण आदि लोकों के निवासी भी थे। वहीं सारे मनु तथा अन्य लोकों के प्रजापति भी पहुँच गये। यक्ष, किन्नर, बेताल, किम्पुरुष लोक के वासी तथा विष्णु के पार्षद सुनंद एवं कुमुद आदि भी पहुँचे। ये सभी भगवान के निकट आये जो अपने तीव्र प्रकाश से चमक रहे थे। इन सबों ने अपने-अपने सिरों के ऊपर हाथ जोड़कर नमस्कार किया और स्तुतियाँ कीं।

40 ब्रह्माजी ने प्रार्थना की: हे प्रभु, आप अनंत हैं और आपकी शक्ति का कोई अंत नहीं है। कोई भी आपके पराक्रम तथा अद्भुत प्रभाव का अनुमान नहीं लगा सकता, क्योंकि आपके कर्म माया द्वारा दूषित नहीं होते। आप भौतिक गुणों से सहज ही ब्रह्मांड का सृजन, पालन तथा संहार करते हैं लेकिन तो भी आप अव्यय बने रहते हैं। अतएव मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।

41 शिवजी ने कहा : कल्प का अंत ही आपके क्रोध का समय होता है। अब जबकि यह नगण्य असुर हिरण्यकशिपु मारा जा चुका है, हे भक्तवत्सल प्रभु, कृपा करके उसके पुत्र प्रह्लाद महाराज की रक्षा करें जो आपके निकट पूर्ण शरणागत भक्त के रूप में खड़ा हुआ है।

42 राजा इन्द्र ने कहा : हे परमेश्र्वर, आप हमारे उद्धारक तथा रक्षक हैं। आपने दैत्य से हमारे वास्तविक यज्ञ भाग जो वास्तव में आपके हैं लौटाये हैं। चूँकि असुरराज हिरण्यकशिपु अत्यंत भयानक था, अतः आपके स्थायी निवास हमारे हृदय उसके द्वारा विजित हो चुके थे। अब आपकी उपस्थिति से हमारे हृदयों से निराशा तथा अंधकार दूर हो गये हैं। हे प्रभु, जो लोग आपकी सेवा में सदैव लगे रहते हैं उनके लिए सारा भौतिक ऐश्वर्य तुच्छ है, क्योंकि आपकी सेवा मोक्ष से भी बढ़कर है। वे जब मोक्ष की भी परवाह नहीं करते तो काम, अर्थ तथा धर्म के विषय में क्या कहा जाये?

43 सारे उपस्थित ऋषियों ने उनकी इस प्रकार स्तुति की: हे प्रभु, हे शरणागत पालक, हे आदि पुरुष, आपने हमें पहले जिस तपस्या की विधि का उपदेश दिया है, वह आपकी ही आध्यात्मिक शक्ति है। आप तपस्या से ही भौतिक जगत का सृजन करते हैं। यह तपस्या आपमें सुप्त रहती है। इस दैत्य ने अपने कार्यकलापों से इसी तपस्या को रोक सा रखा था, किन्तु अब हम लोगों की रक्षा करने के लिए आप जिस नृसिंहदेव के रूप में प्रकट हुए हैं उससे तथा इस असुर को मारने से तपस्या की विधि का फिर से अनुमोदन हुआ है।

44 पितृलोक के वासियों ने प्रार्थना की: हम ब्रह्मांड के धार्मिक नियमों के पालनकर्ता भगवान नृसिंहदेव को सादर नमस्कार करते हैं। आपने उस असुर को मार डाला है, जो हमारे श्राद्ध के अवसर पर हमारे पुत्रों-पौत्रों द्वारा अर्पित बलि को छीनकर खा जाता था और तीर्थस्थलों पर अर्पित की जाने वाली तिलांजलि को पी जाता था। हे प्रभु, आपने इस असुर को मारकर अपने नाखूनों से इसके पेट को चीर करके उसमें से समस्त चुराई हुई सामग्री निकाल ली है। अतएव हम आपको सादर नमस्कार करते हैं।

45 सिद्धलोक के वासियों ने प्रार्थना की: हे भगवान नृसिंहदेव, हम लोग सिद्धलोक के निवासी होने के कारण अष्टांग योग में स्वतःसिद्ध होते हैं। तो भी हिरण्यकशिपु इतना धूर्त था कि उसने अपने बल तथा तपस्या से हमारी सारी शक्तियाँ छीन ली थीं। इस तरह वह अपने योगबल के प्रति घमंडी हो गया था। अब आपके नखों से इस दुष्ट का वध हो जाने के कारण हम आपको सादर नमस्कार करते हैं।

46 विद्याधर के निवासियों ने प्रार्थना की : उस मूढ़ हिरण्यकशिपु ने विविध प्रकार के ध्यान के अनुसार प्रकट तथा अप्रकट होने की हमारी शक्ति पर प्रतिबंध लगा दिया था, क्योंकि उसे अपनी श्रेष्ठ शारीरिक शक्ति तथा अन्यों को जीत लेने की सामर्थ्य का घमंड था। अब पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान ने उसी तरह वध कर दिया है जैसे वह असुर कोई पशु हो। हम भगवान नृसिंह देव के उस लीला रूप को सादर प्रणाम करते हैं।

47 नागलोक के वासियों ने कहा : अत्यंत पापी हिरण्यकशिपु ने हम सबके फणों की मणियाँ तथा हम सबकी सुंदर पत्नियाँ छीन ली थीं। अब चूँकि उसके वक्षस्थल को आपने अपने नाखूनों से विदीर्ण कर दिया है, अतएव आप हमारी पत्नियों की परम प्रसन्नता के कारण हैं। इस तरह हम सभी मिलकर आपको सादर नमस्कार करते हैं।

48 समस्त मनुओं ने इस प्रकार प्रार्थना की : हे प्रभो, हम सारे मनु आपके आज्ञापालक के रूप में मानव समाज के लिए विधि प्रदान करते हैं किन्तु इस महान असुर हिरण्यकशिपु की क्षणभंगुर प्रभसत्ता के कारण वर्णाश्रम धर्म-पालन विषयक हमारे नियम नष्ट हो गये थे। हे स्वामी, अब आपके द्वारा इस महान असुर का वध हो जाने से हम अपनी सहज स्थिति में हैं। कृपया अपने इन शाश्र्वत दासों को आज्ञा दें कि अब वे क्या करें।

49 प्रजापतियों ने इस प्रकार स्तुति की: हे परमेश्र्वर, हे ब्रह्माजी तथा शिवजी के भी पूज्य प्रभु, हम सारे प्रजापति आपके द्वारा दी गई आज्ञा के पालन के लिए उत्पन्न किये गये थे, किन्तु हिरण्यकशिपु ने हमें और उत्तम संतान उत्पन्न करने से रोक दिया। अब यह असुर हमारे समक्ष मृत पड़ा है, जिसके वक्षस्थल को आपने विदीर्ण कर दिया है। अतएव हम आपको सादर नमस्कार करते हैं, क्योंकि इस शुद्ध सात्विक रूप में आपका यह अवतार समग्र ब्रह्मांड के कल्याण के निमित्त है।

50 गंधर्वलोक के निवासियों ने प्रार्थना की: हे भगवान, हम नाच तथा अभिनय में गायन द्वारा आपकी सेवा में लगे रहते थे, किन्तु इस हिरण्यकशिपु ने अपनी शारीरिक शक्ति तथा पराक्रम से हमें अपने अधीन बना लिया था। अब आपके द्वारा यह इस अधम दशा को प्राप्त हुआ है। भला हिरण्यकशिपु जैसे कुमार्गगामी के कार्यकलापों से हमें क्या लाभ हो सकता है?

51 चारणलोक के निवासियों ने कहा : हे प्रभु, आपने उस असुर हिरण्यकशिपु को विनष्ट कर दिया जो सारे निष्कपट पुरुषों के हृदयों में आतंक बना हुआ था। अब हमें शांति मिली है। हम सभी सदैव आपके उन चरणकमलों की शरण ग्रहण करते हैं, जो बद्धजीव को भौतिक कल्मष से मुक्ति दिलानेवाले हैं।

52 यक्षलोक के निवासियों ने प्रार्थना की : हे चौबीस तत्त्वों के नियामक, हम आपको भाने वाली सेवाएँ करने के कारण आपके सर्वश्रेष्ठ सेवक माने जाते हैं फिर भी दितिपुत्र हिरण्यकशिपु के आदेश पर हमसे पालकी ढोने का कार्य लिया जाता था। हे नृसिंहदेव, आप यह जानते हैं कि इस असुर ने किस तरह सबों को कष्ट पहुंचाया है, किन्तु अब आपने इसका वध कर दिया है और इसका शरीर पंच तत्त्वों में मिल गया है।

53 किम्पुरुषलोक के वासियों ने कहा : हम क्षुद्र जीव हैं और आप परम नियंता पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान हैं। अतएव हम आपकी समुचित स्तुति कैसे कर सकते हैं? जब भक्तों ने तंग आकर इस असुर का धिक्कार किया तो आपने इसका वध कर दिया।

54 वैतालिकलोक के निवासियों ने कहा : हे प्रभु, सभाओं तथा यज्ञस्थलों में आपके विमल यश का गायन करने के कारण प्रत्येक व्यक्ति हमें आदर प्रदान करता था। किन्तु इस असुर ने हमारे उस पद को छीन लिया था। अब हमारा अहो भाग्य है कि आपने इस महान असुर का उसी तरह वध कर दिया जिस प्रकार कोई भीषण रोग को ठीक कर देता है।

55 किन्नरों ने कहा : हे परम नियंता, हम आपके सतत सेवक हैं, लेकिन आपकी सेवा में युक्त न होकर हम सभी इस असुर की बेगार में लगाये गये थे। अब आपने इस पापी का वध कर दिया है, अतएव हे नृसिंहदेव, हे स्वामी, हम आपको सादर नमस्कार करते हैं। कृपा करके हमारे संरक्षक बने रहें।

56 विष्णु के वैकुंठलोक के पार्षदों ने यह प्रार्थना की : हे स्वामी, हे परम शरणदाता, आज हमने नृसिंहदेव के रूप में आपके अद्भुत रूप का दर्शन किया है, जो समस्त जगत में सौभाग्य लाने वाला है। हे भगवन, हम यह समझते हैं कि हिरण्यकशिपु आपकी सेवा में रत रहने वाला जय ही था, किन्तु ब्राह्मणों ने शाप दिया था जिससे उसे असुर का शरीर प्राप्त हुआ था। हम समझते हैं कि उसका मारा जाना उस पर आपकी विशेष कृपा है।

(समर्पित एवं सेवारत - जगदीश चन्द्र चौहान)

 

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