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अध्याय अठारह - राजा इन्द्र का वध करने के लिए दिति का व्रत 

1 श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : पृश्नि, जो अदिति के बारह पुत्रों में से पांचवें पुत्र सविता की पत्नी थी, तीन पुत्रियाँ सावित्री, व्याह्यति तथा त्रयी और अग्निहोत्र, पशु, सोम, चार्तुमास्य तथा पंच महायज्ञ नामक पुत्र उत्पन्न हुए।

2 हे राजन ! अदिति के छठे पुत्र भग की पत्नी का नाम सिद्धि था जिसके महिमा, विभु तथा प्रभु नामक तीन पुत्र तथा आशीष नामक एक अत्यंत सुंदरी कन्या उत्पन्न हुई।

3-4 अदिति के सातवें पुत्र धाता की चार पत्नियाँ थीं जिनके नाम थे कुहु, सिनीवाली, राका तथा अनुमति। इन चारों से क्रमशः सायम, दर्श, प्रातः तथा पूर्णमास नामक चार पुत्र हुए। अदिति के आठवें पुत्र विधाता की पत्नी का नाम क्रिया था जिससे पुरीष्य नामक पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। अदिति के नवें पुत्र वरुण की पत्नी चर्षणी थी जिसके गर्भ से ब्रह्मा के पुत्र भृगु ने फिर जन्म लिया।

5 भृगु तथा वाल्मीकि वरुण के विशिष्ट पुत्र थे, जबकि अगस्त्य तथा वशिष्ठ ऋषि वरुण तथा मित्र (अदिति के दसवें पुत्र) के संयुक्त पुत्र थे।

6 स्वर्ग-सुंदरी उर्वशी को देखकर मित्र तथा वरुण दोनों का वीर्य स्खलित हो गया जिसे उन्होंने एक मिट्टी के पात्र में रख दिया। बाद में इसी पात्र से अगस्त्य तथा वसिष्ठ नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए। ये मित्र तथा वरुण के संयुक्त (उभयनिष्ट) पुत्र हैं। मित्र को अपनी पत्नी रेवती से तीन पुत्र उत्पन्न हुए जिनके नाम उत्सर्ग, अरिष्ट तथा पिप्पल थे।

7 हे राजा परीक्षित! अदिति के ग्यारहवें पुत्र एवं स्वर्गलोक के राजा इन्द्र की पत्नी पौलोमी के गर्भ से जयंत, ऋषभ तथा मीढुष नामक तीन पुत्र उत्पन्न हुए। ऐसा हमने सुना है।

8 अनेक शक्तियों वाले पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान अपनी शक्ति से बौने (वामन) के रूप में प्रकट हुए जो अदिति के बारहवें पुत्र उरुक्रम कहलाते हैं। उनकी पत्नी कीर्ति के गर्भ से बृहत्श्लोक नामक एक पुत्र ने जन्म लिया जिसके सौभग इत्यादि कई पुत्र हुए।

9 बाद में (आठवें स्कन्ध में) मैं यह वर्णन करूँगा कि किस प्रकार उरुक्रम अर्थात भगवान वामनदेव परम साधु कश्यप के पुत्र के रूप में प्रकट हुए और किस प्रकार तीनों लोकों को अपने पगों से नाप लिया। मैं उनके अपूर्व (uncommon - असामान्य) कर्मों, गुणों, शक्ति तथा अदिति के गर्भ से जन्म ग्रहण करने के संबंध में वर्णन करूँगा।

10 अब मैं दिति के उन पुत्रों का वर्णन करूँगा जो कश्यप के द्वारा उत्पन्न किये गये किन्तु जो असुर बने। इस असुर वंश में परम भक्त प्रह्लाद महाराज तथा बलि महाराज प्रकट हुए। असुरों को दैत्य कहा जाता है क्योंकि वे दिति के गर्भ से उत्पन्न हुए थे।

11 सर्वप्रथम दिति के गर्भ से हिरण्यकशिपु तथा हिरण्याक्ष दो पुत्र उत्पन्न हुए। ये दोनों अत्यंत शक्तिशाली थे और दैत्यों तथा दानवों द्वारा पूजित थे।

12-13 हिरण्यकशिपु की पत्नी कयाधु नाम से विख्यात थी। वह जंभ की पुत्री एवं दनु की वंशज थी। उसके एक एक करके चार पुत्र हुए जिनके नाम संह्लाद, अनुह्लाद, ह्लाद तथा प्रह्लाद थे। इन चारों भाइयों की बहन का नाम सिंहिका था। उसने विप्रचित नामक असुर से ब्याह करके राहू नामक असुर को जन्म दिया।

14 जब राहू वेश बदलकर देवताओं के बीच में अमृत पी रहा था, तो भगवान हरि ने उसका सिर काट लिया। संहलाद की पत्नी का नाम कृति था। इन दोनों के संयोग से कृति के पंचजन नाम का एक पुत्र उत्पन्न हुआ।

15 ह्लाद की पत्नी का नाम धमनि था। उसने वातापी तथा इल्वल नामक दो पुत्रों को जन्म दिया। जब अगस्त्य मुनि इल्वल के अतिथि बने तो उसने वातापी को, जो मेढे के रूप में था, पकाकर भोजन करवाया।

16 अनुह्लाद की पत्नी सूर्या थी। उसने बाष्कल तथा महिष नामक दो पुत्रों को जन्म दिया। प्रह्लाद के विरोचन नामक एक पुत्र हुआ जिसकी पत्नी से बलि महाराज ने जन्म लिया।

17 इसके पश्र्चात अशना की कोख से महाराज बलि को एक सौ पुत्र प्राप्त हुए जिनमें राजा बाण ज्येष्ठ था। बलि महाराज का चरित्र (महिमा) अत्यंत प्रशंसनीय है और उनका वर्णन आगे (आठवे स्कन्ध) में होगा।

18 चूँकि राजा बाण शिवजी का उपासक था, अतः वह उनके सर्वश्रेष्ठ पार्षदों (गणों) में से एक बन गया। आज भी शिवजी राजा बाण की राजधानी की रक्षा करते हैं और सदैव उसके निकट खड़े रहते हैं।

19 दिति के गर्भ से उनचास मरुतदेव भी उत्पन्न हुए। इनमें से किसी के संतान नहीं हुई। यद्यपि दिति ने उन्हें जन्मा था किन्तु इन्द्र ने उन्हें देव पद प्रदान किया।

20 राजा परीक्षित ने पूछा--- हे प्रभो! जन्म के कारण वे उनचासों मरुत आसुरी वृत्ति से परिपूर्ण रहे होंगे तो फिर स्वर्ग के राजा इन्द्र ने उन्हें देवता क्यों बनाया? क्या उन्होंने कोई पुण्यकर्म या अनुष्ठान किए थे?

21 हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! मैं तथा यहाँ पर उपस्थित सभी साधुजन इसे जानने के लिए परम उत्सुक हैं। अतः हे महात्मन! हमसे इसका कारण बताएँ।

22 श्री सूत गोस्वामी ने कहा : हे महर्षि शौनक ! महाराजा परीक्षित को सविनय एवं संक्षेप में आवश्यक विषयों पर बोलते हुए सुनकर सर्वज्ञाता शुकदेव गोस्वामी ने उनके प्रयत्नों की प्रशंसा की और इस प्रकार उत्तर दिया।

23 श्री शुकदेव गोस्वामी बोले--- इन्द्र की सहायता करने मात्र के लिए भगवान विष्णु ने हिरण्यकशिपु तथा हिरण्याक्ष नामक दोनों भाइयों का वध कर दिया। उनके मारे जाने से उनकी माता दिति शोक तथा क्रोध से परिपूर्ण होकर इस प्रकार सोचने लगी।

24 अत्यंत इंद्रियलोलुप भगवान इन्द्र ने हिरण्यकशिपु तथा हिरण्याक्ष इन दोनों भाइयों का वध भगवान विष्णु के माध्यम से किया है। अतः वह क्रूर, कठोर हृदय एवं पापी है। मैं कब उसे मारकर शांतचित्त होकर दम ले सकूँगी?

25 समस्त राजाओं तथा महान नायकों के शरीर मृत्यु के पश्र्चात कीड़ों, विष्ठा अथवा राख़ में परिणत हो जाएंगे। यदि कोई ऐसे शरीर की रक्षा के लिए ईर्ष्यावश अन्यों का वध करता है, तो क्या वह जीवन के वास्तविक हित को जानता है? निश्र्चय ही वह नहीं जानता क्योंकि अन्य जीवों के प्रति ईर्ष्या करने से वह अवश्य ही नरक को जाता है।

26 दिति ने विचार किया कि इन्द्र अपने शरीर को शाश्र्वत समझकर अनियंत्रित हो गया है। अतः मैं ऐसा पुत्र चाहूंगी जो इन्द्र की उन्मत्तता को दूर कर दे। इसके लिए मैं कुछ न कुछ उपाय करती हूँ।

27-28 इस प्रकार सोचती हुई (इन्द्र को मारने के लिए एक ऐसे पुत्र की इच्छा से) दिति निरंतर अपने पति कश्यप को अपने मोहक आचरण से प्रसन्न रखने लगी। हे राजन! दिति कश्यप की सभी आज्ञाओं का अत्यंत निष्ठा से पालन करती रही। वह सेवा, प्रेम, विनय तथा आत्म-संयम एवं अपनी मृदुल वाणी से और अपनी मंद हँसी और बाँकी चितवन से कश्यप के मन को आकृष्ट करते हुए उसने उन्हें अपने वश में कर लिया।

29 यद्यपि कश्यप मुनि एक विद्वान पुरुष थे, किन्तु वे दिति के बनावटी व्यवहार से मोहित हो गए जिससे वे उसके वश में आ गये। अतः उन्होंने अपनी पत्नी को विश्र्वास दिलाया कि वे उसकी इच्छाओं की पूर्ति करेंगे। पति द्वारा ऐसा वचन तनिक भी आश्र्चर्यजनक नहीं है।

30 सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्मांड की जीवात्माओं के पिता ब्रह्माजी ने देखा कि समस्त जीवात्मा विरक्त हो रहे हैं। अतः उन्होंने जनसंख्या बढ़ाने के उद्देश्य से पुरुष के आधे अंग से स्त्री की रचना की क्योंकि स्त्री का आचरण मनुष्य के मन को हर लेता है।

31 हे प्रिय! अपनी पत्नी दिति के विनम्र आचरण से अत्यधिक प्रसन्न होकर परम शक्तिशाली साधु पुरुष कश्यप हँस पड़े और इस प्रकार बोले।

32 कश्यप मुनि ने कहा : हे अनिंद्य सुंदरी! मैं तुम्हारे आचरण से परम प्रसन्न हूँ, अतः तुम चाहे जो भी वर माँग सकती हो। यदि पति प्रसन्न हो तो चाहे इस लोक की या अन्य लोक की वह कौन सी इच्छा है, जो पूरी न हो सके?

33-34 पति ही स्त्रियों के लिए परम देवता होता है। लक्ष्मीपति भगवान वासुदेव सबों के हृदय में स्थित हैं और सकाम भक्तों द्वारा विभिन्न नामों तथा देव-रूपों में पूजे जाते हैं। इसी प्रकार पति भगवान के रूप में पत्नी के लिए पूजा की वस्तु है।

35 हे सुंदर शरीर वाली, तन्वंगी प्रिये ! कर्तव्य- निष्ठा पत्नी को सदाचारिणी और अपने पति की आज्ञाकारिणी होना चाहिए। उसे अपने पति की पूजा वासुदेव के प्रतिनिधि के रूप में भक्तिपूर्वक करनी चाहिए।

36 हे कल्याणी ! तुमने मुझे श्रीभगवान का प्रतिनिधि मानकर अत्यंत भक्तिपूर्वक मेरी पूजा की है, अतः मैं तुम्हारी इच्छाओं को पूरा करके तुम्हें पुरस्कृत करूँगा, जो किसी अ-सती पत्नी के लिए दुर्लभ है।

37 दिति ने उत्तर दिया-- हे पतिदेव! हे महात्मन! मैं अपने दो पुत्र खो चुकी हूँ। यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं, तो मैं ऐसा अमर पुत्र चाहूँगी जो इन्द्र का वध कर सके। मैं इसलिए यह प्रार्थना कर रही हूँ क्योंकि इन्द्र ने विष्णु की सहायता से मेरे दो पुत्रों, हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकशिपु, का वध किया है।

38 दिति की प्रार्थना सुनकर कश्यप मुनि अत्यधिक उद्विग्न हो गये। वे पश्र्चाताप करने लगे, “हाय, अब मेरे समक्ष इन्द्र को वध करने के अपवित्र कार्य का संकट आया है।

39 कश्यप मुनि ने सोचा, ओह! मैं अब भौतिक सुख के प्रति अत्यधिक आसक्त हो चुका हूँ। अतः इस अवसर का लाभ उठाकर मेरा मन श्रीभगवान की माया द्वारा स्त्री (अपनी पत्नी) के रूप में आकृष्ट हुआ है। अतः मैं अत्यंत नीच हूँ और अवश्य ही नरक में जा गिरूँगा।

40 मेरी इस पत्नी ने उस साधन का सहारा लिया है, जो उसकी प्रकृति का अनुगामी है, अतः उसको दोष नहीं दिया जा सकता। किन्तु मैं तो पुरुष हूँ। सारा दोष तो मेरा है क्योंकि मैं तनिक भी जान न पाया कि मेरी भलाई किसमें है क्योंकि मैं अपनी इंद्रियों को वश में नहीं रख सका।

41 स्त्री का मुख शरदकालीन खिले हुए कमल-पुष्प के समान आकर्षक तथा सुंदर होता है। उसके शब्द अत्यंत मधुर और कानों को प्रिय लगने वाले होते हैं, किन्तु यदि उसके हृदय का अध्ययन किया जाये, तो पता चलेगा कि वह छुरे की धार के समान अत्यंत पैना है। भला ऐसा कौन है, जो स्त्री के कार्यकलापों को जान सके?

42 अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए स्त्रियाँ मनुष्यों के साथ ऐसा व्यवहार करती हैं मानो वे उनकी सर्वाधिक प्रिय हों, किन्तु वास्तव में उनका कोई प्रिय नहीं होता। स्त्रियों को अति साधु स्वभाव का माना जाता है, किन्तु अपने स्वार्थ के लिए वे अपने पति, पुत्र या भाई की भी हत्या कर सकती हैं या दूसरों से करा सकती हैं।

43 मैंने उसे एक वर देने का वचन दिया है, जिसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता, लेकिन इन्द्र वध किये जाने योग्य नहीं है। इस स्थिति में मैंने जो उपाय (हल) सोचा है, वह उपयुक्त है।

44 श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार विचारते हुए कश्यप मुनि कुछ-कुछ क्रुद्ध हो गये। हे कुरुवंशी महाराज परीक्षित! वे अपने आपको धिक्कारते हुए दिति से इस प्रकार बोले।

45 कश्यप मुनि ने कहा, हे कल्याणी ! यदि तुम अपने इस व्रत के संबंध में मेरे उपदेशों का कम से कम एक वर्ष तक पालन करोगी तो तुम्हें निश्चित रूप से पुत्र प्राप्त होगा जो इन्द्र का वध करने में सक्षम होगा। किन्तु यदि तुम वैष्णव नियमों का पालन करनेवाले इस व्रत से तनिक भी विचलित होगी तो तुम्हें जो पुत्र प्राप्त होगा वह इन्द्र का अनुयायी होगा।

46 दिति ने उत्तर दिया--- हे ब्राह्मण ! मैं आपके परामर्श को स्वीकार करती हूँ। मैं व्रत का पालन करूँगी। अब मुझे बतावें कि मुझे क्या करना है, क्या नहीं करना है और किस प्रकार यह व्रत भंग नहीं हो सकेगा? कृपा करके यह सब स्पष्ट बताएँ।

47 कश्यप मुनि ने कहा, हे प्रिये ! इस व्रत का पालन करते समय न तो उग्र बने, न ही किसी को कष्ट पहुंचाए। न तो किसी को शाप दे, न असत्य भाषण करे। न तो अपने नाखून तथा बाल काटे और न हड्डियों तथा खोपड़ी जैसी अशुद्ध वस्तुओं का स्पर्श करे।

48 कश्यप मुनि ने आगे कहा : हे कल्याणी ! नहाते समय पानी में कभी न घुसे, कभी क्रोध न करे और न दुष्ट लोगों से कभी बोले या संगति करें। कभी भी बिना धुले वस्त्र न पहने और पहले धारण की गई माला को कभी न पहने।

49 कभी भी जूठा भोजन न खायें, देवी काली (दुर्गा) को चढ़ाया हुआ प्रसाद न खायें और मांस या मछ्ली से मिश्रित कोई भी वस्तु न खायें। शूद्र द्वारा लाई गई या शूद्र द्वारा स्पर्श की गई अथवा रजस्वला स्त्री द्वारा देखी गई किसी भी सामग्री को न खायें। अंजली से पानी न पिये।

50 भोजन करने के पश्र्चात तुम्हें मुँह, हाथ तथा पाँव धोये बिना बाहर सड़क पर नहीं जाना चाहिए। तुम्हें न तो शाम को या बाल खोले हुए और न आभूषणों से सज्जित हुए बिना बाहर जाना चाहिए। जब तक वाणी का संयम न हो और शरीर ठीक से ढका न हो तब तक तुम्हें घर से बाहर नहीं जाना चाहिए।

51 तुम्हें न तो दोनों पाँव धोये बिना या शुद्ध हुए बिना, न ही गीले पाँव अथवा अपना सिर पश्र्चिम या उत्तर करके सोना चाहिए। सूर्योदय अथवा सूर्यास्त के समय, निर्वस्त्र होकर तथा अन्य स्त्रियों के साथ नहीं लेटना चाहिए।

52 मनुष्य को चाहिए कि धुला वस्त्र पहनकर, सदैव शुद्ध रहकर तथा हल्दी, चंदन और अन्य मांगलिक सामग्रियों से अलंकृत होकर कलेवा करने के पूर्व गायों, ब्राह्मणों, ऐश्वर्य की देवी (लक्ष्मी) तथा श्रीभगवान की पूजा करे।

53 इस व्रत का पालन करने वाली स्त्री को चाहिए कि वह पुष्प माला, चन्दन, आभूषण तथा अन्य सामग्रियों से पुत्रवती तथा सौभाग्यवती स्त्रियों की पूजा करे। गर्भवती स्त्री को अपने पति की पूजा करके उसकी स्तुति करनी चाहिए। उसे उसका ध्यान यह सोचकर करना चाहिए कि वह उसके गर्भ में स्थित है।

54 कश्यप मुनि ने आगे कहा : यदि तुम श्रद्धापूर्वक कम से कम एक वर्ष तक इस व्रत में लगी रहकर इस पुंसवन अनुष्ठान को करोगी तो तुम्हारे एक पुत्र उत्पन्न होगा जो इन्द्र का वध करेगा। किन्तु यदि इस व्रत को करने में कुछ भी त्रुटि रह गई तो तुम्हारा पुत्र इन्द्र का मित्र बन जाएगा।

55 हे राजा परीक्षित ! कश्यप की पत्नी दिति ने पुंसवन नामक शुद्धिकर्त्री विधि को करना अंगीकार कर लिया। उसने कहा, 'हाँ, मैं आपके उपदेशानुसार सब कुछ करूँगी।' वह अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक गर्भवती हुई और श्रद्धापूर्वक व्रत का पालन करती रही।

56 सबों का सम्मान करनेवाले हे राजा ! इन्द्र ने दिति का मंतव्य जान लिया, अतः वह अपना स्वार्थ साधने की युक्ति सोचने लगा। इस तर्क का अनुसरण करते हुए कि आत्म-रक्षा प्रकृति का प्रथम नियम है, उसने दिति की प्रतिज्ञा को भंग करना चाहा। अतः वह आश्रमवासिनी अपनी मौसी दिति की सेवा करने लगा।

57 इन्द्र प्रतिदिन जंगल से फूल, फल, कंद तथा यज्ञ के लिए समिधा लाकर अपनी मौसी की सेवा करने लगा। वह उचित समय पर कुश, पत्तियाँ, कलियाँ, मिट्टी तथा जल भी ले आता था।

58 हे राजा परीक्षित ! जिस प्रकार बहेलिया हिरण को मारने के लिए हिरण की खाल पहनकर छद्मवेष धारण करता है उसी प्रकार से इन्द्र, हृदय से दिति पुत्रों का शत्रु किन्तु बाहर से मित्र बनकर अत्यंत श्रद्धापूर्वक दिति की सेवा करने लगा। इन्द्र का मन्तव्य दिति के व्रत के अनुष्ठान में त्रुटि निकालकर उसे धोखा देना था, किन्तु साथ ही वह नहीं चाहता था कि कोई उसे पहचान सके इसलिए वह अत्यंत सतर्कता के साथ उसकी सेवा करने लगा।

59 हे विश्र्वेश्र्वर ! जब इन्द्र को कोई त्रुटि न मिली तो उसने सोचा, अब मेरा कल्याण कैसे हो? इस प्रकार वह गहरी चिंता में डूब गया।

60 कठोरता से व्रत का पालन करते रहने से अत्यंत क्षीण एवं अशक्त हो जाने से दुर्भाग्यवश दिति ने भोजन के पश्र्चात मुँह, हाथ तथा पाँव धोने में लापरवाही बरती और संध्या में ही सो गई।

61 इस त्रुटि को पाकर समस्त योगशक्तियों (योग सिद्धियाँ तथा अणिमा, लघिमा) का स्वामी इन्द्र घोर निद्रा में अचेत दिति के गर्भ में प्रविष्ट हो गया।

62 दिति के गर्भ में प्रविष्ट होकर इन्द्र ने अपने वज्र से चमकते हुए सोने के समान गर्भ (भ्रूण) को सात खंडों में काट डाला। सात स्थानों में सात विभिन्न जीव रोने लगे। इन्द्र ने "मत रो" ऐसा कहकर पुनः सातखंडों में काट डाला।

63 अत्यंत संतप्त होकर, हाथ जोड़कर उन्होंने इन्द्र से कहा : ” हे राजन! हे इन्द्र! हम तुम्हारे भाई मरुदगण हैं। तुम हमें क्यों मार रहे हो?”

64 जब इन्द्र ने देखा कि वे वास्तव में उसके भक्त-अनुयायी हैं, तो उसने उनसे कहा कि यदि तुम सचमुच मेरे भाई हो तो तुम्हें मुझसे डरने की कोई आवश्यकता नहीं है।

65 शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा परीक्षित! आप अश्र्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से जला दिये गये थे, किन्तु जब श्रीकृष्ण आपकी माता के गर्भ में प्रविष्ट हुए तो आप बच गए। इसी प्रकार यद्यपि इन्द्र ने एक गर्भ को वज्र द्वारा उनचास खंडों में काट डाला था, किन्तु वे सभी पूर्ण पुरषोत्तम भगवान के अनुग्रह से बच गये।

66-67 यदि कोई पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान की पूजा एक बार भी करता है, तो वह वैकुंठ में प्रवेश करने का अधिकारी हो जाता है तथा भगवान विष्णु के रूप को प्राप्त करता है। संकल्पपूर्वक कड़ाई से नियमों का पालन करते हुए दिति ने लगभग एक वर्ष तक भगवान विष्णु की पूजा की। आध्यात्मिक जीवन की इस शक्ति के कारण उनचास मरुदगण पैदा हुए। यद्यपि मरुदगण दिति के गर्भ से पैदा हुए, किन्तु परम भगवान की कृपा से वे देवताओं की बराबरी पर आ गये, यह कैसा आश्र्चर्य है?

68 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान की पूजा करने से दिति पूर्णतया शुद्ध हो गई थी। जब वह बिस्तर से उठी तो उसने इन्द्र समेत अपने उनचास पुत्रों को देखा। ये उनचासों पुत्र अग्नि के समान तेजवान थे और इन्द्र के मित्र थे अतः वह अतीव प्रसन्न थी।

69 तदनंतर, दिति ने इन्द्र से कहा : हे पुत्र ! मैं इस कठोर व्रत का इसलिए पालन कर रही थी कि तुम बारहों आदित्यों को मारने के लिए एक पुत्र प्राप्त कर सकूँ।

70 मैंने केवल एक पुत्र के लिए प्रार्थना की थी, किन्तु मैं देखती हूँ कि ये तो उनचास हैं। यह किस तरह संभव हो सका? मेरे पुत्र इन्द्र! यदि तुम जानते हो तो मुझसे सच सच कहो। झूठ बोलने का प्रयास मत करना।

71 इन्द्र ने उत्तर दिया-- हे माता ! स्वार्थ से अंधा होने के कारण मैंने धर्म से मुँह मोड़ लिया था। जब मुझे ज्ञात हुआ कि आप आध्यात्मिक जीवन का महान व्रत धारण कर रही हैं, तो मैं उसमें कोई त्रुटि निकालना चाहता था और जब मुझे त्रुटि मिल गई तो मैं आपके गर्भ में प्रविष्ट हो गया और मैंने गर्भ को खंड खंड कर दिया।

72 सर्वप्रथम मैंने गर्भस्थ शिशु को सात खंडों में काट डाला जिससे सात शिशु बन गये। तब फिर मैंने प्रत्येक शिशु के भी सात सात खंड कर दिये। किन्तु परमेश्र्वर के अनुग्रह से इनमें से कोई भी मरा नहीं।

73 हे माता! जब मैंने देखा कि उनचासों पुत्र जीवित हैं, तो निश्र्चित ही मुझे आश्र्चर्य हुआ। मुझे विश्र्वास हो गया कि यह आपके द्वारा विष्णु उपासना के लिए की गई नियमित भक्तिपूर्ण सेवा का ही आनुषंगिक फल है।

74 यद्यपि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान की उपासना में ही निरत रहने वालों को भगवान से किसी भी प्रकार की भौतिक इच्छा यहाँ तक कि मुक्ति की भी कामना नहीं रहती, तो भी भगवान कृष्ण उनकी समस्त कामनाओं को परिपूर्ण करते हैं।

75 समस्त आकांक्षाओं का अंतिम लक्ष्य भगवान का दास बनना है। यदि कोई बुद्धिमान मनुष्य, अपने आपको आत्मसमर्पित करके परम प्रिय भगवान की सेवा करता है, तो वह भौतिक सुख की कामना कैसे कर सकता है, जो नरक में भी प्राप्य है?

76 हे माता, हे महीयसी ! मैं मूर्ख हूँ। मैंने जो पाप किये हैं उसके लिए आप मुझे क्षमा प्रदान करें। आपके उनचासों पुत्र बिना किसी क्षति के आपकी भक्ति के कारण ही उत्पन्न हुए हैं। मैंने शत्रु होने के नाते उनको खंड खंड कर दिया था, किन्तु आपकी परम भक्ति के कारण वे मरे नहीं।

77 श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : दिति इन्द्र के इस उत्तम आचरण से अत्यंत प्रसन्न हुई। तब इन्द्र ने अपनी मौसी को अत्यंत आदरपूर्वक प्रणाम किया और उसकी आज्ञा से अपने मरुदगण भाइयों सहित स्वर्गलोक को चला गया।

78 हे राजा परीक्षित ! मैंने यथासंभव तुम्हारे द्वारा पूछे गये प्रश्नों विशेष रूप से मरुतों के इस शुद्ध मंगलकारी वर्णन का उत्तर दिया। अब तुम आगे जो पूछना चाहते हो पूछो, मैं उसे भी विस्तार से बताऊँगा।

(समर्पित एवं सेवारत - जगदीश चन्द्र चौहान)

 

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