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अध्याय सत्रह - माता पार्वती द्वारा चित्रकेतु को शाप 

1 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जिस दिशा में भगवान अनंत अन्तर्धान हुए थे उस दिशा की ओर नमस्कार करके, राजा चित्रकेतु विद्याधरों का अगुवा बनकर बाह्य अन्तरिक्ष में यात्रा करने लगा।

2-3 महान साधुओं तथा मुनियों एवं सिद्धलोक तथा चारणलोक के वासियों द्वारा प्रशंसित, सर्वाधिक शक्तिशाली योगी चित्रकेतु लाखों वर्षों तक जीवन का आनंद भोगता हुआ विचरता रहा। शारीरिक शक्ति तथा इंद्रियों के क्षीण हुए बिना वह सुमेरु पर्वत की घाटियों में वहाँ घूमता रहा जो विभिन्न प्रकार की योग-शक्तियों की सिद्धि का स्थान है। उसने भगवान हरि की महिमा का जप करते हुए विद्याधरलोक की रमणियों के साथ जीवन का आनंद उठाया।

4-5 एक बार जब राजा चित्रकेतु भगवान विष्णु द्वारा प्रदत्त अत्यंत तेजोमय विमान पर बैठकर बाह्य अन्तरिक्ष में यात्रा कर रहा था, तो उन्होंने भगवान शिव को सिद्धों एवं चारणों से घिरा हुआ देखा। शिवजी महामुनियों की सभा में बैठे थे और देवी पार्वती को अपनी गोद में बैठाकर उनका आलिंगन कर रहे थे। राजा चित्रकेतु पार्वती के निकट जाकर तेजी से हँसे और कहने लगे।

6-8 चित्रकेतु ने कहा : जटाधारी शिवजी ने निस्संदेह कठिन तपस्या की है। वे वैदिक नियमों के कट्टर अनुयायियों की सभा के अध्यक्ष हैं। शिवजी समस्त जगत के गुरु हैं और भौतिक देहधारी जीवात्माओं में सर्वश्रेष्ठ हैं। वे ही धर्मपद्धति के व्याख्याता है, तो भी यह कितना आश्र्चर्यजनक कि वे बड़े बड़े संत पुरुषों की सभा के बीच अपनी पत्नी का आलिंगन कर रहे हैं।

9 श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा- हे राजा! चित्रकेतु के वचन सुनकर परम बलशाली, अगाध ज्ञानवान देवाधिदेव शिव केवल हँस दिये और चुप रहे। सभा के समस्त सदस्यों ने भी उन्हीं का अनुकरण किया और कुछ नहीं कहा।

10 शिवजी तथा पार्वती के शौर्य को न जानते हुए राजा चित्रकेतु ने उनकी तीखी आलोचना की। उसके वचन तनिक भी अच्छे लगने वाले न थे, अतः अत्यंत क्रुद्ध देवी पार्वती चित्रकेतु से, जो अपने को इंद्रियों के नियंत्रण में शिवजी से श्रेष्ठ समझ रहा था, इस प्रकार बोलीं।

11 देवी पार्वती ने कहा : ओह, क्या हम जैसे व्यक्तियों को दंड देने के लिए इसने दंडधारी का पद ले लिया है? क्या इसे शासक नियुक्त किया गया है? क्या यही सबों का एकमात्र स्वामी हैं?

12 अहो! ऐसा प्रतीत होता है कि न तो कमल-पुष्प से जन्म लेने वाले ब्रह्मा, न भृगु तथा नारद जैसे महामुनि अथवा सनतकुमार आदि चारों कुमार ही धर्म के नियमों को जानते हैं। मनु तथा कपिल भी उन नियमों को भूल चुके हैं। मैं सोचती हूँ कि इसलिए उन्होंने कभी शिवजी को इस प्रकार आचरण करने के लिए नहीं टोका।

13 यह चित्रकेतु घोर निकृष्ट है क्योंकि इसने उन शिवजी का तिरस्कार करके ब्रह्मा तथा अन्य देवताओं को मात कर दिया है, जो उनके चरणकमलों का सदैव ध्यान धरते रहते हैं। भगवान शिव साक्षात धर्म तथा समस्त जगत के गुरु हैं अतः चित्रकेतु दंडनीय है।

14 यह व्यक्ति ऐसा सोचकर अपनी सफलता से फुला हुआ है कि मैं ही सर्वश्रेष्ठ हूँ। यह व्यक्ति भगवान विष्णु के उन चरणकमलों के निकट, जिनकी उपासना सभी साधु पुरुष करते हैं, जाने के योग्य ही नहीं है क्योंकि यह अपने को अत्यंत महत्त्वपूर्ण समझकर घमंडी बन गया है।

15 ऐ मेरे दुर्बुद्धि बेटे! अब तुम असुरों के निम्न तथा पापी परिवार में जन्म ग्रहण करो जिससे तुम पुनः इस संसार में महान संत पुरुषों के प्रति ऐसा पाप न कर सको।

16 श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे राजा परीक्षित ! पार्वती द्वारा शाप दिये जाने पर चित्रकेतु अपने विमान से नीचे उतरा, उनके समक्ष विनम्रतापूर्वक नतमस्तक हुआ और उसने उन्हें पूर्णरूपेण प्रसन्न कर दिया।

17 चित्रकेतु ने कहा : हे माता ! मैं अपने हाथ जोड़कर आपका शाप स्वीकार करता हूँ। मुझे शाप की परवाह नहीं है, क्योंकि मनुष्य के पूर्वकर्मों के अनुसार ही देवताओं द्वारा सुख या दुख प्रदान किये जाते हैं।

18 अज्ञान से मोहग्रस्त होकर यह जीवात्मा इस संसार रूपी जंगल में भटकता रहता है और हर जगह तथा हर समय अपने पूर्वकर्मों के फलस्वरूप सुख तथा दुख पाता रहता है (अतः हे माता ! इस घटना के लिए न आप दोषी हैं न मैं)

19 इस संसार में न तो स्वयं जीवात्मा और न पराये (मित्र तथा शत्रु) ही भौतिक सुख तथा दुख के कारण हैं। केवल अज्ञानतावश जीवात्मा यह सोचता है कि वह तथा पराये लोग इसके कारणस्वरूप हैं।

20 यह संसार सतत प्रवाहमान नदी की तरंगों के समान है, अतः इसमें क्या शाप और क्या अनुग्रह? क्या स्वर्गलोक और क्या नरकलोक? क्या सुख और क्या वास्तविक दुख? निरंतर प्रवाहित होते रहने के कारण तरंगें कोई शाश्र्वत प्रभाव नहीं छोड़ती।

21 श्रीभगवान एक हैं। वे भौतिक जगत की स्थितियों से प्रभावित हुए बिना आत्मस्वरूप शक्ति से समस्त जीवों की सृष्टि करते हैं। माया से दूषित होकर जीवात्मा अविद्या को प्राप्त होता है और अनेक प्रकार के बंधनों में जा पड़ता है। कभी-कभी ज्ञान के कारण जीवात्मा को मुक्ति दी जाती है। सत्व तथा रजो गुणों के कारण उसे सुख तथा दुख मिलते हैं।

22 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान समस्त जीवों को एकसमान देखते हैं। अतः न तो कोई उनका अत्यंत प्रिय है, न कोई शत्रु, न तो उनका कोई मित्र है न कोई परिजन। इस भौतिक जगत से अनासक्त होने के कारण उन्हें तथाकथित सुख के लिए न तो कोई स्नेह है, न दुख के लिए किसी प्रकार की घृणा। सुख तथा दुख सापेक्ष हैं। भगवान सदैव प्रसन्न रहनेवाले हैं, अतः उनके लिए दुख का कोई अर्थ नहीं है।

23 यद्यपि परमेश्र्वर कर्म के अनुसार प्राप्त होनेवाले हमारे सुख दुख से अनासक्त हैं और कोई भी उनका शत्रु या मित्र नहीं है, तो भी वे अपनी भौतिक शक्ति (माया) के द्वारा शुभ तथा अशुभ कर्मों की उत्पत्ति करते हैं। इस प्रकार भौतिक जीवन को चालू रखने के लिए वे सुख-दुख, लाभ-हानि, बंधन-मोक्ष, जन्म-मृत्यु की सृष्टि करते हैं।

24 हे माता ! आप अब वृथा ही क्रुद्ध हैं। चूँकि मेरे समस्त सुख-दुख मेरे पूर्वकर्मों के द्वारा सुनिश्र्चित हैं, अतः मैं न तो क्षमा-प्रार्थी हूँ और न आपके शाप से मुक्त होना चाहता हूँ। यद्यपि मैंने जो कुछ कहा है अनुचित नहीं है, किन्तु जो कुछ आप अनुचित समझती हों उसके लिए क्षमा करें।

25 श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : -हे शत्रुओं को दमन करनेवाले राजा परीक्षित! शिवजी तथा पार्वती को प्रसन्न करने के बाद चित्रकेतु अपने विमान पर बैठ गए और उनके देखते-देखते प्रस्थान कर गये। जब शिवजी तथा पार्वती ने देखा कि शापित होने पर भी चित्रकेतु निर्भय था, तो वे उसके आचरण पर विस्मित होकर हँस पड़े।

26 तत्पश्र्चात परमसाधु नारद, असुरों, सिद्धलोक के वासियों तथा अपने व्यक्तिगत सहयोगियों के समक्ष सर्वशक्तिमान भगवान शिव अपनी पत्नी पार्वती से बोले और वे सब सुनते रहे।

27 शिवजी ने कहा : हे सुंदरी ! तुमने वैष्णवों की महानता देख ली? श्रीभगवान हरि के दासानुदास होकर वे महान पुरुष होते हैं और किसी प्रकार के सांसारिक सुख में रुचि नहीं रखते।

28 पूरी तरह से भगवान नारायण की सेवा में लीन रहनेवाले भक्तजन जीवन की किसी भी अवस्था से भयभीत नहीं होते। उनके लिए स्वर्ग, मुक्ति तथा नरक एकसमान हैं क्योंकि ऐसे भक्त ईश्र्वर की सेवा में ही रुचि रखते हैं।

29 परमेश्र्वर की बहिरंगा शक्ति के कार्यों के कारण जीवात्माएँ भौतिक देह के संपर्क में बद्ध हैं। सुख तथा दुख, जन्म तथा मृत्यु, शाप तथा अनुग्रह के द्वैतभाव संसार के संपर्क के सहज गौण फल हैं।

30 जिस प्रकार मनुष्य फूलमाला को सर्प समझ बैठता है अथवा स्वप्न में सुख तथा दुख का अनुभव करता है उसी प्रकार भौतिक संसार में सुविचार के अभाव में हम सुख तथा दुख में एक को अच्छा तथा दूसरे को बुरा समझ कर विभेद करते हैं।

31 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान वासुदेव कृष्ण की भक्ति में अनुरक्त व्यक्ति स्वभावतः परम ज्ञानी तथा इस संसार से विरक्त रहने वाले होते हैं। अतः ऐसे भक्त न तो इस संसार के तथाकथित सुख में न ही तथाकथित दुख में कोई रुचि रखते हैं।

32 न तो मैं (शिव), न ब्रह्मा या अश्विनीकुमार, न ही नारद या ब्रह्मा के अन्य साधु-पुत्र और न देवता ही परमेश्र्वर की लीलाओं को तथा उनके स्वरूप को समझ सकते हैं। भगवान के अंश होते हुए भी हम अपने को स्वतंत्र तथा पृथक शासक (नियंता) मान बैठते हैं जिससे हम उनके स्वरूप को नहीं समझ सकते।

33 भगवान को न कोई अति प्रिय है और न कोई अप्रिय। उनके न तो कोई स्वजन है और न कोई पराया है। वे वास्तव में समस्त जीवों की आत्मा के आत्मा हैं। इस प्रकार वे समस्त जीवों के कल्याणकारी मित्र तथा उन सबों के अत्यंत प्रिय हैं।

34-35 यह परम उदार चित्रकेतु ईश्र्वर का प्रिय भक्त है। यह सभी जीवों का समदर्शी है और आसक्ति तथा घृणा से मुक्त है। इसी प्रकार मैं भी भगवान नारायण का परम प्रिय हूँ, अतः नारायण के उच्च भक्तों की गतिविधियों को देखकर चकित नहीं होना चाहिए क्योंकि वे आसक्ति तथा द्वेष से मुक्त रहते हैं। वे सदैव शांत रहते हैं और समदर्शी होते हैं।

36 श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा, हे राजन ! अपने पति से यह संभाषण सुनकर देवी उमा (शिव की पत्नी) को राजा चित्रकेतु के व्यवहार पर जो विष्मय उत्पन्न हुआ था वह जाता रहा और उनकी बुद्धि स्थिर हो गई।

37 महान भक्त चित्रकेतु इतना शक्तिमान था कि यदि वह चाहता तो पलटकर (बदले में) माता पार्वती को शाप दे देता, किन्तु ऐसा न करके उसने नम्रता से शाप को स्वीकार किया और शिवजी तथा उनकी पत्नी के सम्मुख अपना सिर झुकाया। इसे वैष्णव का आदर्श आचरण समझना चाहिए।

38 माता दुर्गा (भवानी, शिवजी की पत्नी) से शापित होकर उसी चित्रकेतु ने आसुरी योनि में जन्म लिया। वह त्वष्टा द्वारा किये गए यज्ञ से असुर के रूप में प्रकट हुआ, यद्यपि वह दिव्य ज्ञान और उसके व्यावहारिक उपयोग में अभी भी परिपूर्ण था और इस प्रकार वह वृत्रासुर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

39 हे राजा परीक्षित! तुमने मुझसे पूछा था की परम भक्त वृत्रासुर ने असुर वंश में किस प्रकार जन्म लिया; अतः मैंने तुम्हें उसके विषय में सब कुछ बताने का प्रयास किया है।

40 चित्रकेतु महान भक्त (महात्मा) था। यदि कोई मनुष्य किसी शुद्ध भक्त से इस इतिहास को सुने तो श्रोता भी इस संसार में अपने बद्ध जीवन से मुक्त हो जाता है।

41 जो व्यक्ति प्रातःकाल उठकर अपने मन तथा वाणी को वश में रखकर तथा श्रीभगवान का स्मरण करके चित्रकेतु का यह इतिहास पढ़ता है, वह बिना कठिनाई के भगवान के धाम को चला जाता है।

[सारांश:--चित्रकेतु द्वारा शिव की आलोचना का उद्देश्य रहस्यमय है और सामान्य व्यक्ति की समझ के परे है। भगवान चित्रकेतु को यथाशीघ्र वैकुंठलोक लाना चाहते थे। ईश्वर की योजना यह थी कि पार्वती के शाप से चित्रकेतु वृत्रासुर बने जिससे वह अगले जन्म में भगवान के धाम को तुरंत लौट सके। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने इस प्रकार टिप्पणी की है। परम वैष्णव एवं परम शक्तिशाली देवता होने के कारण शिवजी अपने इच्छानुसार कुछ भी करने में समर्थ हैं। यद्यपि वे बाह्यरूप से सामान्य व्यक्ति का सा आचरण कर रहे थे और शिष्टाचार का पालन नहीं कर रहे थे, किन्तु ऐसे कार्यों से उनकी उच्च स्थिति में कोई कमी नहीं आती।]

(समर्पित एवं सेवारत - जगदीश चन्द्र चौहान)

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