This Nityananda Trayodashi marks the 19th anniversary of ISKCON Desire Tree - Hare Krsna TV. 

Every tree needs nourishment in order to serve others. 

Donate

Serving mankind through _ _ Websites, _ _ Apps, _ _Youtube Video and Hare Krsna Tv Channel. Reaching out to more than 50 Million Homes Worldwide. 

8438914678?profile=RESIZE_584x

अध्याय बारह - वृत्रासुर की यशस्वी मृत्यु

1 शुकदेव गोस्वामी ने कहा : अपना शरीर छोड़ने की इच्छा से वृत्रासुर ने विजय की अपेक्षा युद्ध में अपनी मृत्यु को श्रेयस्कर समझा। हे राजा परीक्षित ! उसने अत्यंत बलपूर्वक अपना त्रिशूल उठाया और बड़े वेग से स्वर्ग के राजा पर उसी प्रकार से आक्रमण किया जिस प्रकार ब्रह्मांड के जलमग्न होने पर कैटभ ने श्रीभगवान पर बड़े ही बल से आक्रमण किया था।

2 तब असुरों में महान वीर वृत्रासुर ने कल्पांत (प्रलय) की धधकती अग्नि की लपटों के समान तीखी नोकों वाले त्रिशूल को अत्यंत क्रोध एवं वेग से इन्द्र पर चला दिया। उसने गरजकर कहा, “अरे पापी, मैं तेरा वध किये देता हूँ।"

3 आकाश में उड़ता हुआ वृत्रासुर का त्रिशूल प्रकाशमान उल्का के समान था। यद्यपि इस प्रज्ज्वलित आयुध की ओर देख पाना कठिन था, किन्तु राजा इन्द्र ने निर्भीक होकर अपने वज्र से उसके खंड-खंड कर दिये। उसी समय उसने वृत्रासुर की एक भुजा काट ली, जो सर्पों के राजा वासुकि के शरीर के समान मोटी थी।

4 शरीर से एक भुजा के कट जाने पर भी वृत्रासुर क्रोधपूर्वक राजा इन्द्र के निकट पहुँचा और लोहे के बल्लम (परिघ) से उसकी ठोड़ी पर प्रहार किया। उसने इन्द्र के हाथी पर भी प्रहार किया। इससे इन्द्र के हाथ से उसका वज्र गिर गया।

5 विभिन्न लोकों के वासी, यथा देवता, असुर, चारण तथा सिद्ध, वृत्रासुर के कार्य की प्रशंसा करने लगे, किन्तु जब उन्होंने देखा कि इन्द्र महान संकट में है, तो वे 'हाय हाय' करके विलाप करने लगे।

6 शत्रु की उपस्थिति में अपने हाथ से वज्र गिर जाने पर इन्द्र एक प्रकार से पराजित हो गया था और अत्यंत लज्जित हुआ। उसने पुनः अपने आयुध उठाने का दुस्साहस नहीं किया। किन्तु वृत्रासुर ने उसे यह कहते हुए प्रोत्साहित किया, “अपना वज्र उठा लो और अपने शत्रु को मार दो। यह भाग्य को कोसने का अवसर नहीं है।"

7 वृत्रासुर ने आगे कहा : हे इन्द्र ! आदि भोक्ता पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान के अतिरिक्त किसी की सदैव विजय होना निश्र्चित नहीं है। वे ही उत्पत्ति, पालन और प्रलय के कारण हैं और सब कुछ जानने वाले हैं। अधीन होने तथा भौतिक देहों को धारण करने के लिए बाध्य होने के कारण युद्धप्रिय अधीनस्थ कभी विजयी होते हैं, तो कभी पराजित होते हैं।

8 समस्त लोकों के प्रमुख लोकपालों सहित, इस ब्रह्मांड के समस्त लोकों के समस्त जीव, पूर्णत: भगवान के वश में हैं। वे जाल में पकड़े गए उन पक्षियों के समान कार्य करते हैं, जो स्वतंत्रतापूर्वक विचरण नहीं कर सकते।

9 हमारी इंद्रियों का शौर्य, मानसिक शक्ति, दैहिक बल, जीवन शक्ति, अमरत्व एवं मृत्यु सभी कुछ परम भगवान की देखरेख के अधीन हैं। इसे जाने बिना मूर्ख लोग अपने जड़ शरीर को ही अपने कार्यकलापों का कारण मानते हैं।

10 हे देवराज इन्द्र! जिस प्रकार काठ की पुतली जो स्त्री के समान प्रतीत होती है अथवा घास-फूस का बना हुआ पशु न तो हिल-डुल सकता है और न अपने आप नाच सकता है, वरन उसे हाथ से चलाने वाले व्यक्ति पर पूरी तरह निर्भर रहता है, उसी प्रकार हम सभी परम नियंता पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान के इच्छानुसार नाचते हैं। कोई भी स्वतंत्र नहीं है।

11 तीनों पुरुष--कारणोदकशायी विष्णु, गर्भोदकशायी विष्णु तथा क्षीरोदकशायी विष्णु--भौतिक प्रकृति, समग्र भौतिक शक्ति (महत तत्त्व), मिथ्या अहंकार, पाँचों भौतिक तत्त्व, भौतिक इंद्रियाँ, मन, बुद्धि तथा चेतना, ये सब भगवान के आदेश के बिना भौतिक जगत की सृष्टि नहीं कर सकते।

12 ज्ञानरहित मूर्ख व्यक्ति पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान को नहीं समझ सकता। वह शाश्र्वत अधीन रहकर भी अपने आपको झूठे ही सर्वोच्च मानता है। यदि कोई यह सोचे कि अपने पूर्व सकाम कर्मों के अनुसार उसका भौतिक शरीर उसके माता-पिता द्वारा उत्पन्न किया गया है और उसी शरीर को दूसरा कोई विनष्ट कर देता है जैसे कि बाघ दूसरे पशु को निगल जाता है, तो यह सही ज्ञान नहीं है। श्रीभगवान स्वयं सृष्टि करते हैं और अन्य जीवों के द्वारा जीवों को निगलते रहते हैं।

13 जिस प्रकार मरने की इच्छा न रखने पर भी मनुष्य को मृत्यु के समय अपनी आयु, ऐश्वर्य, यश तथा अन्य सब कुछ त्याग देना पड़ता है उसी प्रकार जब ईश्र्वर की कृपा होती है, तो विजय के नियत समय के अनुकूल होने पर ये सारी वस्तुएँ उसे मिल जाती हैं।

14 चूँकि प्रत्येक वस्तु भगवान की परम इच्छा पर निर्भर करती है, अतः मनुष्य को यश-अपयश, हार-जीत तथा जीवन-मृत्यु में निश्र्चिंत रहकर समभाव बनाये रखना चाहिए।

15 जो पुरुष यह जानता है कि सतो, रजो तथा तमो गुण--ये तीनों आत्मा के नहीं, वरन भौतिक प्रकृति के गुण हैं और जो यह जानता है कि शुद्ध आत्मा इन गुणों के कर्मों तथा फलों का साक्षी मात्र है, उसे मुक्त पुरुष मानना चाहिए। वह इन गुणों से नहीं बंधता।

16 अरे मेरे शत्रु ! जरा मेरी ओर देख । मैं पहले ही पराजित हो चुका हूँ, क्योंकि मेरा हथियार तथा मेरी भुजा पहले ही खंड-खंड हो चुके हैं। तुमने मुझे पहले ही परास्त कर दिया है, तो भी मैं तुम्हें मारने की प्रबल इच्छा के कारण तुमसे लड़ने का भरसक प्रयत्न कर रहा हूँ। ऐसी विषम परिस्थिति में मैं तनिक भी दुखी नहीं हूँ। अतः तुम उदासीनता त्याग करके युद्ध जारी रखो।

17 अरे मेरे शत्रु ! इस युद्ध को द्यूतक्रीड़ा का खेल मानो जिसमें हमारे प्राणों की बाजी लगी है, बाण पासे हैं और वाहक पशु चौसर हैं। कोई नहीं जानता कि कौन हारेगा और कौन जीतेगा। यह सब विधाता पर निर्भर है।

18 शुकदेव गोस्वामी ने कहा : वृत्रासुर के निष्कपट तथा निर्देशात्मक वचन सुनकर राजा इन्द्र ने उसकी प्रशंसा की और अपने वज्र को पुनः हाथ में धारण कर लिया। इसके बाद बिना मोह या द्वैत-भाव से वह हँसा और वृत्रासुर से इस प्रकार बोला।

19 इन्द्र ने कहा हे असुरश्रेष्ठ ! मैं देखता हूँ कि संकटमय स्थिति में होते हुए भी अपने विवेक तथा भक्तियोग में निष्ठा के कारण तुम श्रीभगवान के पूर्ण भक्त तथा जन-जन के मित्र हो।

20 तुमने भगवान विष्णु की माया को पार कर लिया है और इस मुक्ति के कारण तुमने आसुरी भाव का परित्याग करके महान भक्त का पद प्राप्त कर लिया है।

21 हे वृत्रासुर! असुर सामान्यतः रजोगुणी होते हैं, अतः यह कितना महान आश्र्चर्य है। कहा जायेगा कि असुर होकर भी तुमने भक्त-भाव ग्रहण करके अपने मन को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान वासुदेव में स्थिर कर दिया है, जो सदैव शुद्ध सत्त्व में स्थित रहते हैं।

22 जो मनुष्य परम कल्याणकारी परमेश्र्वर हरि की भक्ति में स्थिर है, वह अमृत के समुद्र में तैरता है। उसके लिए छोटे-छोटे गड्डों के जल से क्या प्रयोजन?

23 श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : वृत्रासुर तथा राजा इन्द्र ने युद्धभूमि में भी भक्तियोग के संबंध में बातें कीं और अपना कर्तव्य समझकर दोनों पुनः युद्ध में भिड़ गये। हे राजन! दोनों ही बड़े योद्धा और समान रूप से शक्तिशाली थे।

24 हे महाराज परीक्षित! अपने शत्रु को वश में करने में पूर्ण सक्षम वृत्रासुर ने अपना लोहे का परिघ उठाकर चारों ओर घूमाया और इन्द्र को लक्ष्य बनाकर अपने बाएँ हाथ से उस पर फेंका।

25 इन्द्र ने अपने शतपर्वन नामक वज्र से वृत्रासुर के परिघ तथा उसके बचे हुए हाथ को एक साथ खंड-खंड कर डाला।

26 जड़ से दोनों भुजाएँ कट जाने से तेजी से रक्त बहने के कारण वृत्रासुर उड़ते हुए पर्वत के समान सुंदर लग रहा था जिसके पंखों को इन्द्र ने खंड-खंड कर दिया हो।

27-29 वृत्रासुर अत्यंत शक्तिशाली था। उसने अपने निचले जबड़े को भूमि पर और ऊपरी जबड़े को आकाश में गड़ा दिया। उसका मुख इतना गहरा हो गया मानो आकाश हो और उसकी जीभ बहुत बड़े सर्प के सदृश लग रही थी। अपने काल के समान कराल दाँतों से वह सम्पूर्ण ब्रह्मांड को निगलने का प्रयास करता प्रतीत हुआ। इस प्रकार विराट शरीर धारण करके उस महान असुर वृत्रासुर ने पर्वतों तक को हिला दिया और अपने पाँवों से पृथ्वी की सतह को इस प्रकार मर्दित करने लगा मानो वह चलता हुआ साक्षात हिमालय पर्वत हो। वह इन्द्र के सामने आया और उसके वाहन ऐरावत समेत उसे इस प्रकार निगल गया मानो एक बड़े अजगर ने हाथी निगल लिया हो।

30 जब देवताओं, ब्रह्मा समेत अन्य प्रजापतियों तथा अन्य बड़े-बड़े साधु पुरुषों ने देखा कि असुर ने इन्द्र को निगल लिया है, तो वे अत्यंत दुखी हुए और 'हाय हाय' 'कितनी बड़ी विपत्ति'! कह करके विलाप करने लगे।

31 इन्द्र के पास नारायण का जो सुरक्षा कवच था, वह स्वयं भगवान नारायण से अभिन्न था। उस कवच के द्वारा तथा अपनी योगशक्ति से सुरक्षित होने पर राजा इन्द्र वृत्रासुर द्वारा निगले जाने पर भी उस असुर के उदर में मरा नहीं।

32 अत्यंत शक्तिशाली राजा इन्द्र ने अपने वज्र के द्वारा वृत्रासुर का पेट फाड़ डाला और बाहर निकल आया। बल असुर के मारने वाले इन्द्र ने उसके तुरंत बाद वृत्रासुर के पर्वत-शृंग जैसे ऊँचे सिर को काट लिया।

33 यद्यपि वज्र वृत्रासुर की गर्दन के चारों ओर अत्यंत वेग से घूम रहा था, किन्तु उसके शरीर से सिर को विलग करने में पूरा एक वर्ष (360 दिन) लग गया, जो सूर्य, चंद्र तथा अन्य नक्षत्रों के उत्तरी तथा दक्षिणी यात्रा पूर्ण करने में लगने वाले समय के तुल्य है। तब वृत्रासुर के वध का उपयुक्त समय (योग) उपस्थित होने पर उसका सिर पृथ्वी पर गिर पड़ा।

34 वृत्रासुर के मारे जाने पर, गन्धर्वों तथा सिद्धों ने हर्षित होकर स्वर्गलोक में दुंदुभियाँ बजाई। उन्होंने वृत्रासुर के संहर्ता इन्द्र के शौर्य का वेद-स्रोत्रों से अभिनंदन किया और अत्यंत प्रसन्न होकर उस पर फूलों की वर्षा की।

35 हे शत्रुओं का दमन करने वाले राजा परीक्षित! तब वृत्रासुर के शरीर से सजीव ज्योति निकल कर बाहर आई और भगवान के परम धाम को लौट गई। सभी देवताओं के देखते-देखते वह भगवान संकर्षण का संगी बनने के लिए दिव्य लोक में प्रविष्ट हुआ।

(समर्पित एवं सेवारत - जगदीश चन्द्र चौहान)

 

E-mail me when people leave their comments –

You need to be a member of ISKCON Desire Tree | IDT to add comments!

Join ISKCON Desire Tree | IDT