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अध्याय ग्यारह - वृत्रासुर के दिव्य गुण

1 श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन ! असुरों के प्रधान सेनानायक वृत्रासुर ने अपने सेनानायकों को धर्म के नियमों का उपदेश दिया, किन्तु वे कायर तथा भगोड़े सेनानायक भय से इतने विचलित हो चुके थे कि उन्होंने उसके वचनों को नहीं माना।

2-3 हे राजा परीक्षित ! समय द्वारा प्रदत्त अनुकूल अवसर का लाभ उठाकर देवताओं ने असुरों की सेना पर पीछे से आक्रमण कर दिया और असुर सैनिकों को खदेड़कर इधर-उधर बिखेर दिया, मानो उनकी सेना में कोई नायक ही न हो। अपने सैनिकों की दयनीय दशा को देखकर असुरश्रेष्ठ वृत्रासुर जिसे इन्द्रशत्रु कहा जाता था, अत्यंत दुखी हुआ। ऐसी पराजय न सह सकने के कारण उसने देवताओं को रोका और बलपूर्वक डांटते हुए क्रुद्धभाव से इस प्रकार कहा।

4 हे देवताओं ! इन असुर सैनिकों का जन्म वृथा ही हुआ। निस्संदेह, ये अपनी माताओं के शरीर से मलमूत्र के समान आये हैं। ऐसे शत्रुओं को, जो डर के मारे भाग रहे हैं, पीछे से मारने में क्या लाभ होगा? अपने को वीर कहलाने वाले को चाहिए कि वह अपनी मृत्यु से भयभीत शत्रु का वध न करे। ऐसा वध न तो प्रशंसनीय है, न ही इससे किसी को स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

5 हे तुच्छ देवों ! यदि तुम्हें अपनी वीरता में सचमुच विश्र्वास है, यदि तुम्हारे अंतस्थल में धैर्य है और यदि तुम इंद्रियतृप्ति के कामी नहीं हो, तो क्षण भर मेरे समक्ष ठहरो।

6 शुकदेव गोस्वामी ने कहा : अति क्रुद्ध एवं अत्यंत शक्तिशाली वीर वृत्रासुर देवताओं को अपने बलिष्ठ एवं गठित शरीर से भयभीत करने लगा। जब उसने ज़ोर से गर्जना की तो लगभग सारे जीव अचेत हो गये।

7 जब समस्त देवताओं ने वृत्रासुर की सिंह जैसी भयानक गर्जना सुनी तो वे मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े, मानो उन पर वज्रपात हुआ हो।

8 ज्योंही देवताओं ने डर के मारे अपनी आँखें बंद कर लीं, वृत्रासुर ने अपना त्रिशूल उठा करके और अपने बल से पृथ्वी को दहलाते हुए युद्धभूमि में देवताओं को अपने पैरों के तले उसी प्रकार रौंद डाला जिस प्रकार पागल हाथी नरकट के वन को रौंद डालता है।

9 वृत्रासुर की करतूत देखकर स्वर्ग का राजा इन्द्र अधीर हो उठा और उस पर अपनी एक गदा फेंकी, जिसको रोकपाना अत्यंत दुष्कर था। फिर भी ज्योंही वह गदा उसकी ओर पहुँची, वृत्रासुर ने अपने बाएँ हाथ से सरलतापूर्वक पकड़ लिया।

10 हे राजा परीक्षित! इन्द्र के शत्रु, पराक्रमी वृत्रासुर ने उस गदा से क्रोधपूर्वक इन्द्र के हाथी के सिर पर ज़ोर से प्रहार किया जिससे वह युद्धभूमि में चिघाड़ने लगा। इस वीरता पूर्ण कार्य के लिए दोनों पक्षों के सैनिकों ने उसकी प्रशंसा की।

11 वृत्रासुर की गदा के आघात से ऐरावत हाथी वज्र के द्वारा ताड़ित पर्वत के समान, तीव्र वेदना का अनुभव करता हुआ तथा अपने टूटे मुँह से रक्त उगलता हुआ चौदह गज पीछे छिटक गया। भारी वेदना के कारण वह पीठ पर बैठे इन्द्र के समेत भूमि पर गिर पड़ा।

12 जब उसने देखा कि इन्द्र-वाहन हाथी थका हुआ एवं घायल है और उसे इस तरह आहत हुआ देखकर इन्द्र स्वयं खिन्न है, तो वह महापुरुष वृत्रासुर धर्म के नियमों का पालन करते हुए इन्द्र पर अपनी गदा से पुनः प्रहार करने से हिचका। इस अवसर का लाभ उठाकर इन्द्र ने अपने अमृतवर्षी हाथ से हाथी को छु दिया जिससे उस पशु की पीड़ा जाती रही और उसके घाव ठीक हो गये। तब हाथी तथा इन्द्र दोनों चुपचाप खड़े हो गए।

13 हे राजन ! जब महाभट्ट वृत्रासुर ने अपने शत्रु तथा अपने भाई के हत्यारे इन्द्र को अपने समक्ष लड़ने के लिए हाथ में वज्र लिए हुए देखा तो उसे स्मरण हो आया कि इन्द्र ने किस क्रूरता के साथ उसके भाई का वध किया था। इन्द्र के पापकर्मों को सोचते हुए वह शोक तथा विस्मृति से पागल हो उठा। व्यंग्य से हँसते हुए उसने इस प्रकार कहा।

14 श्रीवृत्रासुर ने कहा : वह जिसने ब्राह्मण की हत्या की है, वह जिसने अपने गुरु का वध किया है, वह जिसने मेरे भाई की हत्या की है, इस समय सौभाग्यवश मेरे शत्रु के रूप में मेरे सामने खड़ा हुआ है। अरे नीच ! जब मैं तुम्हारे पत्थर-सदृश हृदय को अपने त्रिशूल से भेद डालूँगा तब मैं अपने भाई के ऋण से उऋण हो सकूँगा।

15 तुमने स्वर्ग में निवास करते रहने के उद्देश्य से मेरे बड़े भाई का, जो स्वरूपसिद्ध (आत्मवेत्ता), निष्पाप एवं सुपात्र ब्राह्मण था, जिसे तुमने अपना मुख्य पुरोहित नियुक्त किया था, वध कर दिया है। वह तुम्हारा गुरु था और यद्यपि तुमने अपना यज्ञ करने का सारा भार उस पर छोड़ रखा था, किन्तु बाद में अत्यंत क्रूरता के साथ उसके सिर को शरीर से उसी प्रकार छिन्न कर दिया जिस प्रकार कोई पशु की हत्या कर दे।

16 अरे इन्द्र! तुम सभी प्रकार की लज्जा, दया, कीर्ति तथा ऐश्वर्य से विहीन हो। अपने सकाम कर्मों के फल से इन सद्गुणों से रहित होकर तुम राक्षसों के द्वारा भी निंदनीय हो। अब मैं तुम्हारे शरीर को अपने त्रिशूल से बेध डालूँगा और जब तुम घोर कष्ट से मरोगे तो अग्नि भी तुम्हारा स्पर्श नहीं करेगी, केवल गीध तुम्हारे शरीर को खायेंगे।

17 तुम स्वभाव से क्रूर हो। यदि अन्य देवता मेरे शौर्य से अपरिचित रह कर तुम्हारे अनुयायी बनकर अपने उठे हुए हथियारों से मुझ पर आक्रमण करते हैं, तो मैं अपने इस तीक्ष्ण त्रिशूल से उनके सिर काट लूँगा और उन सिरों को भैरव तथा उनके गणों सहित अन्य भूतों के नायकों को बलि चढ़ाऊँगा।

18 किन्तु यदि तुम इस युद्ध में अपने वज्र से मेरा सिर काट लेते हो और मेरे सैनिकों को मार डालते हो तो हे इन्द्र, हे महान वीर! मैं अपने शरीर को अन्य जीवात्माओं (यथा सियारों तथा गीधों) को भेंट करने में अति प्रसन्न हूँगा। इस कारण मैं अपने कर्मबंधन के फलों से छूट जाऊँगा और यह मेरा अहोभाग्य होगा कि मैं नारद मुनि जैसे परम भक्तों के चरणकमलों की धूलि प्राप्त करूँगा।

19 हे स्वर्ग के राजा इन्द्र ! तुम अपने समक्ष खड़े अपने शत्रु मुझ पर अपना वज्र क्यों नहीं छोड़ते? यद्यपि गदा द्वारा मुझ पर किया गया तुम्हारा प्रहार निश्र्चय ही उसी प्रकार निष्फल हो गया था जिस प्रकार कंजूस से धन की याचना निष्फल होती है, किन्तु तुम्हारे द्वारा धारण किया गया यह वज्र निष्फल नहीं होगा। तुम्हें इस विषय में तनिक भी संदेह नहीं करना चाहिए।

20 हे स्वर्ग के राजा इन्द्र ! तुमने जिस वज्र को मुझे मारने के लिए धारण किया है, वह भगवान विष्णु के तेज तथा दधीचि की तपस्या-शक्ति से समन्वित है। चूँकि तुम यहाँ भगवान विष्णु की आज्ञा से मुझे मारने आये हो अतः इसमें अब कोई संदेह नहीं कि तुम्हारे वज्र के छूटने से मैं मारा जाऊँगा। भगवान विष्णु तुम्हारा साथ दे रहे हैं, अतः विजय, ऐश्वर्य तथा समस्त सद्गुण निश्र्चय ही तुम्हारे साथ हैं।

21 तुम्हारे वज्र के वेग से मैं भौतिक बंधन से मुक्त हो जाऊँगा और यह शरीर तथा भौतिक कामनाओं वाला यह संसार त्याग दूँगा। मैं भगवान संकर्षण के चरणकमलों पर अपने मन को स्थिर करके नारद मुनि जैसे महामुनियों के गंतव्य को प्राप्त कर सकूँगा जैसा कि भगवान संकर्षण ने कहा है।

22 श्रीभगवान के चरणारविन्द में जो व्यक्ति पूर्णतया समर्पित होते हैं और निरंतर उनके चरणारविन्द का चिंतन करते हैं, उन्हें भगवान अपने पार्षदों या सेवकों के रूप में स्वीकार कर लेते हैं। भगवान ऐसे सेवकों को उच्च, मध्य तथा निम्न लोकों का आकर्षक ऐश्वर्य प्रदान नहीं करते, क्योंकि जब उन्हें इन लोकों में से किसी एक की भी प्राप्ति हो जाती है, तो उससे शत्रुता, चिंता, मानसिक क्षोभ, अभिमान तथा कलह की वृद्धि होती है। इस प्रकार मनुष्य को अपनी संपत्ति को बढ़ाने और उसको बनाये रखने में काफी प्रयास करना पड़ता है और जब संपत्ति की क्षति हो जाती है, तो उसे भारी दुख होता है।

23 हमारे भगवान अपने भक्तों को धर्म, अर्थ तथा काम (इंद्रिय-तृप्ति) के लिए वृथा प्रयास करने के प्रति वर्जित करते हैं। हे इन्द्र! इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि भगवान कितने दयालु हैं। ऐसी कृपा केवल शुद्ध भक्तों को प्राप्य है, भौतिक लाभ चाहने वाले व्यक्तियों को नहीं।

24 हे भगवन! क्या मैं पुनः आपका दासानुदास बन सकूँगा जो आपके चरणकमल की शरण लेते हैं? हे मेरे जीवनाधार! क्या मैं आपके दासों का दास बन सकूँगा जिससे मेरा मन सदैव आपके दिव्य गुणों को स्मरण करता रहे, मेरी वाणी नित्य आपके गुणों का गान करते रहे और मेरा शरीर आपकी प्रेम-भक्ति में निरंतर लगा रहे?

25 हे समस्त सौभाग्य के स्रोत भगवान ! मुझे न तो ध्रुवलोक में, न स्वर्ग में अथवा ब्रह्मलोक में सुख भोगने की इच्छा है और न ही मैं समस्त भूलोकों अथवा अधःलोकों का सर्वोच्च अधिपति बनना चाहता हूँ। मैं योग शक्तियों का स्वामी भी नहीं बनना चाहता, न ही आपके चरणकमलों को त्याग कर मोक्ष की कामना करता हूँ।

26 हे कमलनयन भगवान ! जैसे पक्षियों के पंखविहीन बच्चे अपनी माँ के लौटने तथा खिलाये जाने की प्रतीक्षा करते रहते हैं, जैसे रस्सियों से बँधे छोटे-छोटे बछड़े गाय दुहे जाने की प्रतीक्षा करते रहते हैं जिससे उन्हें अपनी माताओं का दूध पीने को मिले या जैसे वियोगिनी पत्नी घर से दूर बसे अपने प्रवासी पति के लौटने तथा सभी प्रकार से तुष्ट किये जाने के लिए लालायित रहती है, उसी प्रकार मैं आपकी प्रत्यक्ष सेवा करने के अवसर पाने के लिए सदैव उत्कंठित रहता हूँ।

27 हे भगवान, हे स्वामी ! मैं अपने सकाम कर्मों के फलस्वरूप इस पूरे भौतिक जगत में घूम रहा हूँ और मैं आपके पवित्र तथा प्रबुद्ध भक्तों की संगति की ही खोज कर रहा हूँ। आपकी बहिरंगा शक्ति अर्थात माया के प्रभाव से अपने शरीर, पत्नी, संतान तथा घर के प्रति मेरी आसक्ति बनी हुई है, किन्तु मैं अब और अधिक आसक्त नहीं बने रहना चाहता। मेरा मन, मेरी चेतना तथा मेरा सर्वस्व आपके ही प्रति आसक्त रहे।

(समर्पित एवं सेवारत -- जगदीश चन्द्र चौहान)

 

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