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अध्याय तेईस -- देवहूति का शोक  

1-5 मैत्रेय ने कहा: अपने माता-पिता के चले जाने पर अपने पति की इच्छाओं को समझनेवाली पतिव्रता देवहूति अपने पति की प्रतिदिन प्रेमपूर्वक सेवा करने लगी जिस प्रकार भवानी अपने पति शंकरजी की करती हैं। हे विदुर, देवहूति ने अत्यन्त आत्मीयता और आदर के साथ, इन्द्रियों को वश में रखते हुए, प्रेम तथा मधुर वचनों से अपने पति की सेवा की। बुद्धिमानी तथा तत्परता के साथ कार्य करते हुए उसने समस्त काम, दम्भ, द्वेष, लोभ, पाप तथा मद को त्यागकर अपने शक्तिशाली पति को प्रसन्न कर लिया। पतिपरायणा मनु की पुत्री अपने पति को विधाता से भी बड़ा मानती थी। इस प्रकार वह उनसे बड़ी-बड़ी आशाएँ किये रहती थी। दीर्घकाल तक सेवा करते रहने से धार्मिक व्रतों को रखने के कारण वह अत्यन्त क्षीण हो गई। उसकी दशा देखकर देवर्षि-श्रेष्ठ कर्दम को उस पर दया आ गई और वे अत्यन्त प्रेम से गदगद वाणी में बोले।

6-7 कर्दम मुनि ने कहा: हे स्वायम्भुव मनु की मानिनी पुत्री, आज मैं तुम्हारी अत्यधिक अनुरक्ति तथा प्रेमपूर्ण सेवा से बहुत प्रसन्न हूँ। चूँकि देहधारियों को शरीर अत्यन्त प्रिय है, अतः मुझे आश्चर्य हो रहा है कि तुमने मेरे लिये अपने शरीर को उपेक्षित कर रखा है। कर्दम मुनि ने आगे कहा: मैंने तप, ध्यान तथा कृष्णभक्ति का अपना धार्मिक जीवन बिताते हुए भगवान का आशीर्वाद प्राप्त किया है। यद्यपि तुम्हें भय तथा शोक से रहित इन उपलब्धियों (विभूतियों) का अभी तक अनुभव नहीं है, किन्तु इन सबों को मैं तुम्हें प्रदान करूँगा, क्योंकि तुम मेरी सेवा में लगी हुई हो। अब उन्हें देखो तो। मैं तुम्हें दिव्यदृष्टि प्रदान कर रहा हूँ जिससे तुम देख सको कि वे कितनी सुन्दर हैं।

8 कर्दम मुनि ने कहा: भगवान की कृपा के अतिरिक्त अन्य भोगों से कौन सा लाभ है? सभी भौतिक उपलब्धियाँ श्रीभगवान विष्णु के भृकुटि-चालन से ही ध्वंस हो जाने वाली हैं। तुमने अपने पति की भक्ति करके वे दिव्य भेंटें प्राप्त की हैं और उनका भोग कर रही हो जो राजमद तथा भौतिक सम्पत्ति से गर्वित मनुष्यों के लिए भी दुर्लभ हैं।

9-15 समस्त प्रकार के दिव्य ज्ञान में अद्वितीय, अपने पति को बोलते हुए सुनकर निष्पाप देवहूति अत्यन्त प्रसन्न हुई, उसका मुख किंचित संकोच भरी चितवन और मधुर मुस्कान से खिल उठा और वह अत्यन्त विनय एवं प्रेमवश गदगद वाणी में (रुद्ध कण्ठ से) बोली। श्री देवहूति ने कहा: हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, मेरे प्रिय पति, मैं जानती हूँ कि आपने सिद्धि प्राप्त कर ली है और समस्त अचूक योगशक्ति के स्वामी हैं, क्योंकि आप दिव्य प्रकृति योगमाया के संरक्षण में हैं। किन्तु आपने एक बार वचन दिया था कि अब हमारा शारीरिक संसर्ग होना चाहिए, क्योंकि तेजस्वी पति वाली साध्वी पत्नी के लिए सन्तान बहुत बड़ा गुण है। देवहूति ने आगे कहा: हे प्रभु, मैं कामवेदना से पीड़ित हो रही हूँ। अतः आप शास्त्रों के अनुसार जो भी व्यवस्था की जानी हो करें, जिससे यह मेरा दुर्बल शरीर आपके योग्य हो जाय। हाँ स्वामी, इस कार्य के लिए उपयुक्त घर के विषय में भी विचार करें। मैत्रेय ने आगे कहा: हे विदुर, अपनी प्रिया की इच्छा को पूरा करने के लिए कर्दम मुनि ने अपनी योगशक्ति का प्रयोग किया और तुरन्त ही एक हवाई महल (विमान) उत्पन्न कर दिया जो उनकी इच्छानुसार यात्रा कर सकता था। यह सभी प्रकार के रत्नों से जटित, बहुमूल्य मणियों के खम्भों से सुशोभित तथा इच्छित फल प्रदान करने वाली विस्मयजनक संरचना (महल) थी। यह सभी प्रकार के साज-सामान तथा सम्पदा से सुसज्जित था, जो दिन-प्रति-दिन बढ़ने वाले थे। यह प्रासाद (दुर्ग) सभी प्रकार की सामग्री से सुसज्जित था और यह सभी ऋतुओं में सुखदायक था। यह चारों ओर से पताकाओं, बन्दनवारों तथा नाना-विधिक रंगों की कला-कृतियों से सजाया गया था। यह आकर्षक पुष्पों के हारों से, जिससे मधुर गुंजार करते भौंरे आकृष्ट हो रहे थे तथा लिनेन, रेशमी तथा अन्य तन्तुओं से बने पर्दों से शोभायमान था।

16-21 यह प्रासाद शय्याओं, पलंगों, पंखों तथा आसनों से युक्त सात पृथक-पृथक मंजिलों (तल्लों) वाला होने से अत्यन्त मनोहर लग रहा था। दीवालों में जहाँ तहाँ कलापूर्ण संरचना होने से उनकी सुन्दरता बढ़ गई थी। उसकी फर्श मरकत मणि की थी और चबूतरे मूँगे के बने थे। वह महल अतीव सुन्दर था, उसके द्वारों की देहलियाँ मूँगे की थी और दरवाजे हीरों से जटित थे। इन्द्र नीलमणि के बने गुम्बदों पर सोने के कलश रखे हुए थे। वह हीरों की दीवालों में जड़े हुए मनभावने माणिक से ऐसा प्रतीत होता था मानो नेत्रों से युक्त हो। वह विचित्र चँदोवों और अत्यधिक मूल्यवान सोने के तोरणों से सुसज्जित था। उस प्रासाद में जहाँ तहाँ जीवित हंसों तथा कबूतरों के साथ ही कृत्रिम हंस तथा कबूतर इतने सजीव थे कि असली हंस उन्हें अपने ही तुल्य सजीव पक्षी समझ कर अपनी गर्दनें ऊपर उठा रहे थे। इस प्रकार वह प्रासाद इन पक्षियों की ध्वनि से गूँज रहा था। उस प्रासाद में क्रीड़ास्थल, विश्रामघर, शयनगृह, आँगन तथा चौकें थीं जो नेत्रों को सुख देने वाली थीं। इन सबसे स्वयं मुनि को विस्मय हो रहा था।

22-25 जब उन्होंने देखा कि देवहूति इतने विशाल, ऐश्वर्ययुक्त प्रासाद (भवन) को अप्रसन्न हृदय से देख रही है, तो कर्दम मुनि को उसकी भावनाओं का पता चला, क्योंकि वे किसी के हृदय की बात जान सकते थे। अतः उन्होंने अपनी पत्नी को स्वयं ही इस प्रकार सम्बोधित किया। प्रिये देवहूति, तुम इतनी भयभीत क्यों हो? पहले स्वयं भगवान विष्णु द्वारा निर्मित बिन्दु-सरोवर में स्नान करो, जो मनुष्य की समस्त इच्छाओं को पूरा करने वाला है और तब इस विमान पर चढ़ो। कमललोचना देवहूति ने अपने पति की आज्ञा मान ली। मैले-कुचैले वस्त्रों तथा सिर पर बालों के जटों के कारण वह आकर्षक नहीं दिख रही थी। उसके शरीर पर धूल की मोटी पर्त चढ़ी थी और उसके स्तन कान्तिहीन हो गए थे। किन्तु उसने सरस्वती नदी के पवित्र जल से भरे सरोवर में डुबकी लगाई।

26-30 उसने सरोवर के भीतर एक घर में एक हजार कन्याएँ देखीं जो सब की सब अपनी किशोरावस्था में थीं और कमलों के समान सुगन्धित थीं। उसे देखकर वे तरुणियाँ सहसा उठ खड़ी हुई और हाथ जोड़कर कहा, “हम आपकी दासी हैं। कृपा करके बताएँ कि हम आपके लिए क्या करें?” देवहूति के प्रति अत्यन्त सम्मान प्रदर्शित करने वाली कन्याएँ उसे बाहर लाई और बहुमूल्य तेलों तथा उबटनों को लगाकर नहलाया और उसे महीन, निर्मल, नये वस्त्र पहनने को दिये। तब उन्होंने उसे उत्तम तथा बहुमूल्य आभूषणों से सजाया जो चमचमा रहे थे। फिर उन्होंने सर्वगुण सम्पन्न भोजन तथा मधुर मादक पेय पदार्थ आसवम प्रदान किया। तब उसने दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब देखा। उसका शरीर समस्त प्रकार के मल से रहित हो गया था और वह माला से सज्जित की गई थी। वह निर्मल वस्त्र पहने थी और शुभ तिलक से विभूषित थी। दासियाँ उसकी अत्यन्त आदरपूर्वक सेवा कर रही थीं।

31-35 सिर सहित उसका सारा शरीर नहलाया गया और उसके अंग-प्रत्यंग को आभूषणों से सजाया गया। उसने लटकन से युक्त हार (हार-हुमेल) पहना था। उसकी कलाइयों में चुड़ियाँ थीं और उसकी एड़ियों में सोने के खनकते पायल थे। उसने कमर में अनेक रत्नों से जटित सोने की करधनी पहन रखी थी; वह बहुमूल्य मोतियों के हार तथा मंगल-द्रव्यों से सुसज्जित थी। उसका मुखमण्डल सुन्दर दाँतों तथा मनोहर भौहों से चमक रहा था। उसके नेत्र सुन्दर स्निग्ध कोरों से स्पष्ट दिखाई पड़ने के कारण कमल कली की शोभा को मात करते थे। उसका मुख काले घुँघराले बालों से घिरा हुआ था। जब उसने ऋषियों में अग्रगण्य अपने परम प्रिय पति कर्दम मुनि का स्मरण किया, तो वह अपनी समस्त दासियों सहित वहाँ प्रकट हो गई जहाँ मुनि थे। अपने पति की उपस्थिति में अपने चारों ओर एक हजार दासियाँ और पति की योगशक्ति देखकर वह अत्यन्त चकित थी।

36-39 मुनि ने देखा देवहूति ने स्नान कर लिया है और चमक रही है मानो वह उनकी पहले वाली पत्नी नहीं है। उसने राजकुमारी जैसा अपना पूर्व सौन्दर्य पुनः प्राप्त कर लिया था। वह श्रेष्ठ वस्त्रों से आच्छादित सुन्दर वक्षस्थलों वाली थी। उसकी आज्ञा के लिए एक हजार गन्धर्व कन्याएँ खड़ी थीं। हे शत्रुजित, मुनि को उसकी चाह उत्पन्न हुई और उन्होंने उसे हवाई-प्रासाद में चढ़ा लिया। अपनी प्रिया पर अत्यधिक अनुरक्त रहने तथा गन्धर्व-कन्याओं द्वारा सेवित होने पर भी मुनि की महिमा कम नहीं हुई, क्योंकि उनको अपने पर नियंत्रण प्राप्त था। उस हवाई-प्रासाद में कर्दम मुनि अपनी प्रिया के साथ इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे मानो आकाश में नक्षत्रों के बीच चन्द्रमा हो, जिससे रात्रि में जलाशयों में कुमुदिनियाँ खिलती हैं। उस हवाई-प्रासाद में आरूढ़ हो वे मेरु पर्वत की सुखद घाटियों में भ्रमण करते रहे जो शीतल, मन्द तथा सुगन्ध वायु से अधिक सुन्दर होकर कामेच्छा को उद्वेलित करने वाली थी। इन घाटियों में देवताओं का धनपति कुबेर सुन्दरियों से घिरा रहकर और सिद्धों द्वारा प्रशंसित होकर आनन्द लाभ उठाता है। कर्दम मुनि भी अपनी पत्नी तथा उन सुन्दर कन्याओं से घिरे हुए वहाँ गये और अनेक वर्षों तक सुख-भोग किया।

40 अपनी पत्नी से संतुष्ट होकर वे उस विमान में न केवल मेरु पर्वत पर ही वरन वौश्रंभक, सुरसन, नन्दन, पुष्पभद्रक तथा चैत्ररथ्या में और मानसरोवर के तट पर भी विहार करते रहे।

41-44 वे रास्ते में विभिन्न लोकों से होकर उसी तरह यात्रा करते रहे जिस प्रकार वायु प्रत्येक दिशा में अबाध रूप से चलती रहती है। उसी महान तथा कान्तिमान हवाई-प्रासाद में, जो उनकी इच्छानुसार उड़ सकता था, बैठकर वे देवताओं से बाजी मार ले गये। जिन्होंने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान के चरण-कमलों की शरण प्राप्त कर ली है उन दृढ़प्रतिज्ञ मनुष्यों के लिए कौन सी वस्तु दुर्लभ है? उनके चरण तो गंगा जैसी पवित्र नदी के उदगम हैं, जिनसे सांसारिक जीवन के समस्त अनिष्ट दूर हो जाते हैं। अपनी पत्नी को अनेक आश्चर्यों से पूर्ण ब्रह्माण्ड गोलक तथा इसकी रचना दिखलाकर परमयोगी कर्दम मुनि अपने आश्रम को लौट आये। अपने आश्रम लौटने पर उन्होंने मनु की पुत्री देवहूति के सुख के लिए, जो रति सुख के लिए अत्यधिक उत्सुक थी, अपने आपको नौ रूपों में विभक्त कर लिया। इस प्रकार उन्होंने उसके साथ अनेक वर्षों तक विहार किया, जो एक क्षण के समान व्यतीत हो गये।

45-48 उस विमान में, देवहूति अपने पति के साथ उत्कृष्ट एवं कामेच्छा बढ़ाने वाली सेज में स्थित रह कर जान भी न पाई कि कितना समय कैसे बीत गया। रति सुख के उत्कट इच्छुक पति-पत्नी योग शक्तियों के बल पर विहार करते रहे और एक सौ वर्ष अल्प काल के समान व्यतीत हो गये। शक्तिमान कर्दम मुनि सबों के मन की बात जानने वाले थे और जो कुछ माँगे उसे वही प्रदान कर सकते थे। आत्मा के ज्ञाता होने के कारण वे देवहूति को अपनी अर्धांगिनी मानते थे। उन्होंने अपने आपको नौ रूपों में विभक्त किया। उसके तुरन्त बाद उसी दिन देवहूति ने नौ कन्याओं को जन्म दिया जिनके अंग अंग सुन्दर थे और उनसे लाल कमल की सी सुगन्धी निकल रही थी।

49-50 जब उसने देखा कि उसके पति गृह-त्याग करने ही वाले हैं, तो वह बाहर से हँसी, किन्तु हृदय में अत्यन्त विकल और सन्तप्त थी। वह खड़ी थी और मणितुल्य नाखूनों से मण्डित अपने पैर से पृथ्वी को कुरेद रही थी। उसका सिर झुका था और वह अपने आँसुओं को रोककर धीरे-धीरे मोहक वाणी से बोली।

51-53 देवहूति ने कहा: हे स्वामी, आपने जितने वचन दिये थे वे सब पूर्ण हुए, किन्तु मैं आपकी शरणागत हूँ इसलिए मुझे अभयदान भी दें। हे ब्राह्मण, जहाँ तक आपकी पुत्रियों का प्रश्न है, वे स्वयं ही अपने योग्य वर ढूँढ लेंगी और अपने अपने घर चली जाएँगी। किन्तु आपके संन्यासी होकर चले जाने पर मुझे कौन सान्त्वना देगा? अभी तक हमने अपना सारा समय परमेश्वर के ज्ञान के अनुशीलन की उपेक्षा करके इन्द्रियतृप्ति में ही व्यर्थ गँवाया है।

54 आपकी दिव्य स्थिति (पद) से परिचित न होने के कारण ही मैं इन्द्रियों के विषयों में लिप्त रह कर आपको प्यार करती रही। तो भी मैंने आपके लिए जो आकर्षण (अनुराग) उत्पन्न कर लिया है, वह मेरे समस्त भय को दूर करे।

55 इन्द्रियतृप्ति हेतु संगति निश्चय ही बन्धन का मार्ग है। किन्तु जब वही संगति किसी साधु पुरुष से की जाती है, तो भले ही वह अनजाने में की जाय, मुक्ति के मार्ग पर ले जाने वाली है।

56-57 जिस पुरुष के कर्म से न तो धार्मिक जीवन का उत्कर्ष होता है, न जिसके धार्मिक विधि-विधानों से उसे वैराग्य प्राप्त हो पाता है और वैराग्य प्राप्त पुरुष यदि श्रीभगवान की भक्ति को प्राप्त नहीं होता, तो उसे जीवित होते हुए भी मृत मानना चाहिए। हे स्वामी, मैं निश्चित रूप से श्रीभगवान की अलंघ्य माया द्वारा बुरी तरह से ठगी हुई हूँ, क्योंकि भवबन्धन से मुक्ति दिलाने वाली आपकी संगति में रह कर भी मैंने मुक्ति की चाहत नहीं की ।

स्व कर्मणा तमभ्यर्चया – मनुष्य को चाहिए कि अपने धनधान्य से वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान की पूजा करने का प्रयत्न करे।

भगवान की सेवा करने के अनेक प्रकार हैं और कोई भी व्यक्ति अपनी सामर्थ्य भर भगवान की सेवा कर सकता है।”

(समर्पित एवं सेवारत - जगदीश चन्द्र चौहान)

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Comments

  • 🙏हरे कृष्ण हरे कृष्ण - कृष्ण कृष्ण हरे हरे
    हरे राम हरे राम - राम राम हरे हरे🙏
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