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अध्याय अठारह -- भगवान वराह तथा असुर हिरण्याक्ष के मध्य युद्ध

1 मैत्रेय ने आगे कहा : उस घमंडी तथा अभिमानी दैत्य ने वरुण के शब्दों की तनिक भी परवाह नहीं की। हे विदुर, उसे नारद से श्रीभगवान के बारे में पता लगा और वह अत्यंत वेग से समुद्र की गहराइयों में पहुँच गया।

2 वहाँ उसने सर्वशक्तिमान श्रीभगवान को उनके वराह रूप में, अपनी दाढ़ों के अग्रभाग पर पृथ्वी को ऊपर की ओर धारण किये तथा अपनी लाल लाल आँखों से उसके समस्त तेज को हरते हुए देखा। इस पर वह असुर हँस पड़ा और बोला, “ओह कैसा उभयचर पशु है?”

3 असुर ने भगवान को संबोधित करते हुए कहा : सूकर का रूप धारण किये हुए हे देवश्रेष्ठ, थोड़ा सुनिए तो। यह पृथ्वी हम अधोलोक के वासियों को सौंपी जा चुकी है, अतः तुम इसे मेरी उपस्थिति में मुझसे बचकर नहीं ले जा सकते।

4 हमारे शत्रुओं ने हमारे वध के लिए तुम्हें पाला है और तुमने अदृश्य रहकर कुछ असुरों को मार दिया है। तुम्हारी शक्ति केवल योगमाया है, अतः आज मैं तुम्हें मारकर अपने बंधुओं का शोक दूर कर दूंगा।

5 असुर ने आगे कहा : जब मेरी भुजाओं से फेंकी गई गदा द्वारा तुम्हारा सिर फट जाएगा और तुम मर जाओगे तो वे देवता तथा ऋषि जो तुम्हें भक्तिवश नमस्कार करते तथा भेंट चढ़ाते हैं, स्वतः मृत हो जाएँगे जिस प्रकार बिना जड़ के वृक्ष नष्ट हो जाते हैं।

6 यद्यपि भगवान असुर के तीर सदृश बेधने वाले दुर्वचनों से अत्यंत पीड़ित हुए थे, किन्तु उन्होंने इस पीड़ा को सह लिया। वे अपनी दाढ़ों के अग्रभाग पर स्थित पृथ्वी को भयभीत देखकर जल में से निकलकर उसी प्रकार बाहर आ गये जिस प्रकार घड़ियाल द्वारा आक्रमण किये जाने पर हाथी अपनी सहचरी हथिनी के साथ बाहर आ जाता है।

7 सुनहले बालों तथा भयावने दाँतों वाले उस असुर ने जल से निकलते हुए भगवान का उसी प्रकार पीछा किया जिस प्रकार कोई घड़ियाल हाथी का पीछा कर रहा हो। उसने बिजली के समान कड़क कर कहा, “क्या तुम अपने ललकारने वाले प्रतिद्वंद्वी के समक्ष इस प्रकार भागते हुए लज्जित नहीं हुए हो?” निर्लज्ज प्राणियों के लिए कुछ भी निंदनीय नहीं है।

8 भगवान ने पृथ्वी को लाकर जल की सतह पर अपनी दृष्टि के सामने रख छोड़ा और अपनी निजी शक्ति को उसमें स्थानांतरित कर दिया जिससे वह जल पर तैरती रहे। शत्रु के देखते-देखते, ब्रह्मांड के सृष्टा ब्रह्माजी ने उनकी स्तुति की और अन्य देवताओं ने उन पर फूलों की वर्षा की।

9 शरीर में प्रचुर आभूषण, कंकण तथा सुन्दर स्वर्णीय कवच धारण किये हुए वह असुर एक बड़ी सी गदा लिए भगवान का पीछा कर रहा था। भगवान ने उसके भेदने वाले दुर्वचनों को तो सहन कर लिया, किन्तु प्रत्युत्तर में उन्होंने अपना प्रचण्ड क्रोध व्यक्त किया।

10 भगवान ने कहा- सचमुच हम जंगल के प्राणी हैं और तुम जैसे ही शिकारी कुत्तों का हम पीछा कर रहे हैं। जो मृत्यु के बंधन से मुक्त हो चुका है, वह तुम्हारी आत्मश्लाघा से नहीं डरता, क्योंकि तुम मृत्यु-बंधन के नियमों से बँधे हुए हो।

11 निस्संदेह, मैंने रसातलवासियों की धरोहर चुरा ली है और सारी शर्म खो दी है। यद्यपि तुम्हारी शक्तिशाली गदा से मुझे कष्ट हो रहा है, किन्तु मैं जल में कुछ काल तक और रहूँगा क्योंकि तुम जैसे पराक्रमी शत्रु से शत्रुता ठान कर अन्यत्र जाने के लिए मेरे पास कोई ठौर भी नहीं है।

12 तुम पैदल सेना के नायक की तरह हो अतः तुम शीघ्र ही हमें हराने का प्रयत्न करो। तुम अपनी बकवास बन्द कर दो और हमारा वध करके अपने संबंधियों की चिंताओं को मिटा दो। कोई भले ही गर्वित हो, किन्तु यदि वह जो अपने दिये वचनों (प्रतिज्ञा) को पूरा नहीं कर पाता, सभा में आसन प्राप्त करने का पात्र नहीं है।

13 श्रीमैत्रेय ने कहा : जब श्रीभगवान ने उस राक्षस को इस प्रकार ललकारा तो वह क्रुद्ध और क्षुब्ध हुआ और क्रोध से इस प्रकार काँपने लगा, किस प्रकार छेड़ा गया हुआ विषधर सर्प।

14 क्रोध के मारे सारे अंगों को कँपाते तथा फुफकारता हुआ वह राक्षस तुरंत भगवान के ऊपर झपट पड़ा और उस ने अपनी शक्तिशाली गदा से उन पर प्रहार किया।

15 किन्तु भगवान ने एक ओर सरक कर शत्रु द्वारा अपने वक्षस्थल पर चलाई गई गदा के प्रखर प्रहार को उसी प्रकार झुठला दिया जिस प्रकार सिद्ध योगी मृत्यु को चकमा दे देता है।

16 तब श्री भगवान अपना क्रोध प्रदर्शित करते हुए उस राक्षस की ओर झपटे जो क्रोध के कारण अपने होठ चबा रहा था। उसने फिर से अपनी गदा उठाई और उसे बारम्बार घुमाने लगा।

17 तब भगवान ने अपनी गदा से शत्रु की दाहिनी भौंह पर प्रहार किया, किन्तु वह असुर युद्ध में कुशल था, इसलिए, हे भद्र विदुर, उसने अपनी गदा की चाल से अपने आपको बचा लिया।

18 इस प्रकार असुर हिरण्याक्ष तथा भगवान हरि ने एक दूसरे को जीतने की इच्छा से क्रुद्ध होकर अपनी अपनी विशाल गदाओं से एक-दूसरे पर प्रहार किया।

19 दोनों योद्धाओं में तीखी स्पर्धा थी, दोनों के शरीरों पर एक दूसरे की नुकीली गदाओं से चोटें लगी थीं और अपने-अपने शरीर से बहते हुए रक्त की गंध से वे अधिकाधिक क्रुद्ध हो चले थे। जीतने की उत्कंठा से वे तरह-तरह की चालें चल रहे थे और उनकी यह मुठभेड़ वैसी ही प्रतीत होती थी जैसे किसी गाय के लिए दो बलवान साँड लड़ रहे हों।

20 हे कुरुवंशी, वराह रूप में प्रकट श्री भगवान तथा असुर के मध्य विश्र्व के निमित्त होने वाले इस भयंकर युद्ध को संसार के हेतु देखने के लिए ब्रह्मांड के परम स्वतंत्र देवता ब्रह्मा अपने अनुयायियों सहित आये।

21 युद्धस्थल में पहुँचकर हजारों ऋषियों तथा योगियों के नायक ब्रह्माजी ने असुर को देखा, जिसने अभूतपूर्व शक्ति प्राप्त कर ली थी जिससे कोई भी उससे युद्ध नहीं कर सकता था। तब ब्रह्मा ने आदि सूकर रूप धारण करने वाले नारायण को संबोधित किया।

22-23 ब्रह्माजी ने कहा : हे भगवन, यह राक्षस, देवताओं, ब्राह्मणों, गौवों तथा आपके चरणकमलों में समर्पित निष्कलुष व्यक्तियों के लिए निरंतर चुभने वाला काँटा बना हुआ है। उन्हें अकारण सताते हुए यह भय का कारण बन गया है। मुझसे वरदान प्राप्त करने के कारण यह असुर बना है और समस्त भूमंडल में अपनी जोड़ के योद्धा की तलाश में इस अशुभ कार्य के लिए घूमता रहता है।

24 ब्रह्माजी ने आगे कहा : हे भगवन, इस सर्पतुल्य असुर से खेल करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह सदैव मायावी करतब में दक्ष तथा हेकड़ीबाज है, साथ ही निरंकुश एवं अत्यधिक दुष्ट भी।

25 ब्रह्माजी ने आगे कहा : हे भगवान, आप अच्युत हैं। कृपा करके इस पापी असुर को इसके पूर्व कि आसुरी घड़ी आए और यह अपने अनुकूल दूसरा भयंकर शरीर धारण कर सके, आप इसका वध कर दें। निस्संदेह आप इसे अपनी अंतरंगा शक्ति से मार सकते हैं।

26 हे भगवन, संसार को आच्छादित करने वाली अत्यंत अंधेरी सन्ध्या वेला निकट आ रही है चूँकि आप सभी आत्माओं के आत्मा हैं, अतः आप इसका वध करके देवताओं को विजयी बनाएँ।

27 विजय के लिए सर्वाधिक उपयुक्त अभिजित नामक शुभ मुहूर्त (घड़ी) का योग दोपहर से हो चुका है और अब बीतने ही वाला है, अतः अपने मित्रों के हित में आप इस दुर्जय शत्रु का अविलंब सफाया कर दें।

28 सौभाग्य से यह असुर स्वेच्छा से आपके पास आया है और आपके द्वारा ही इसकी मृत्यु विहित है, अतः आप इसे अपने ढंग से युद्ध में मारिये और लोकों में शांति स्थापित कीजिये।

(समर्पित एवं सेवारत - जगदीश चन्द्र चौहान)

 

 

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