E-Counselor

श्रीमद भगवतम् के प्रथम स्कंध में निष्ठावान भक्तों के लक्षण उल्लिखित हैं । हमें यह पढ़कर, भक्ति में अपनी निष्ठा बढ़ाने की प्रेरणा मिलती है ।

** एक निष्ठावान भक्त को चाहिए कि वह उपनिषद, वेदांत जैसे वैदिक साहित्य, पूर्व आचायों एवं गोस्वामियों द्वारा संकलित ग्रंथों का श्रवण करें । ऐसे साहित्य का श्रवण किये बिना मनुष्य सच्ची उन्नति नहीं कर पाता । श्रवण एवं आदेशों का पालन किये बिना, भक्ति का प्रदर्शन निरर्थक है और भक्ति-पथ में अवरोध जैसा है । 
श्रीमद भगवतम् १.२.१२ (तात्पर्य)

** भगवान के दिव्य प्रेमाभक्ति के प्रति लालसा बढ़ाते जाने के बाद भी भक्त को उसका अंत नहीं दिखता । उत्कट सेवा से मनुष्य को भगवान की दिव्य उपस्थिति की अनुभूति होने लगती है । इसलिए भगवान के दर्शन का अर्थ है उनकी सेवा में लगे रहना क्योंकि उनकी सेवा और स्वयं भगवान में कोई अंतर नहीं है । निष्ठावान भक्त को भगवान की नैष्ठिकी सेवा करते रहना चाहिए । इस तरह की गयी सेवा के लिए भगवान स्वयं मार्गदर्शन करते हैं । 
श्रीमद भगवतम् १.६.२२ (तात्पर्य)

** नारद मुनि ने अपने व्यक्तिगत उदहारण द्वारा भगवान के निष्ठावान भक्त के जीवन का संक्षेप में वर्णन किया है । ऐसा भक्त भगवान से या भगवान के प्रामाणिक प्रतिनिधि से दीक्षा लेने के उपरांत भगवान की महिमा का गंभीरता से कीर्तन करता है एवं अन्य लोगों को भगवान की महिमा सुनाने के लिए संसार भर में विचरण करता है । 
ऐसे भक्तों को भौतिक लाभ की कोई इच्छा नहीं रहती । भगवान के धाम वापस जाना ही उनकी एकमात्र इच्छा होती है । यथासमय भौतिक शरीर त्यागने पर उन्हें यह अवसर प्राप्त होता है । 
चूँकि भगवद्धाम जाना उनके जीवन का परम लक्ष्य होता है इसलिए न तो वे किसी से ईर्ष्या करते हैं और न ही भगवद्धाम जाने के लिए सुयोग्य होने का उन्हें अभिमान होता है । 
उनका एकमात्र व्यवसाय भगवान के पवित्र नाम, यश तथा लीलाओं का कीर्तन तथा स्मरण करना और अपनी व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार भौतिक लाभ की इच्छा से रहित होकर दूसरों के कल्याण हेतु भगवद-सन्देश का प्रचार करना होता है । 
श्रीमद भगवतम् १.६.२६ (तात्पर्य)

** सुप्त कृष्ण-प्रेम का पुनर्जागरण मशीनी तरीके से श्रवण तथा कीर्तन करने पर निर्भर न होकर पूर्ण रूप से भगवान की अहैतुकी कृपा पर निर्भर है । जब भगवान भक्त की निष्ठा से पूर्ण रूप से प्रसन्न होते हैं तो वे उसे दिव्य प्रेममयी सेवा प्रदान करते हैं । परन्तु निर्धारित विधियों से श्रवण एवं कीर्तन करने से व्यर्थ और अवांछित दुखों को कम अवश्य किया जा सकता है । भौतिक आसक्ति का कम होना ज्ञान के विकसित होने की प्रतीक्षा नहीं करता अपितु परम ज्ञान ही भक्तिमय सेवा पर निर्भर करता है । 
श्रीमद भगवतम् १.७.६ (तात्पर्य)

** किसी भी मनुष्य को यदि भगवान द्वारा भेजे गए प्रामाणिक प्रतिनिधि की कृपा प्राप्त होती है तो वह भगवद्धाम जाने की चरम सिद्धि प्राप्त कर सकता है । ज्योंही भक्त किसी प्रामाणिक प्रतिनिधि से भेंट करता है उसका भगवद्धाम जाना निश्चित हो जाता है । किन्तु यह उस भक्त की निष्ठा पर निर्भर करता है । भगवान सभी जीवों के हृदय में विद्यमान हैं इसलिए वे जीव की हर गतिविधि से अवगत रहते हैं । ज्योंही भगवान देखते हैं कि कोई जीव भगवद्धाम जाने के लिए अत्यधिक उत्सुक है तो वे तुरंत ही अपना प्रामाणिक प्रतिनिधि भेज देते हैं । इस प्रकार निष्ठावान भक्त का भगवद्धाम जाना सुनिश्चित हो जाता है । निष्कर्ष यह हुआ कि प्रामाणिक गुरु की सहायता प्राप्त करने का अर्थ है साक्षात भगवान से प्रत्यक्ष सहायता प्राप्त करना । 
श्रीमद भगवतम् १.१९.३६ (तात्पर्य)

प्रेषित: ISKCON Desire Tree - हिंदी 
hindi.iskcondesiretree.com
facebook.com/IDesireTreeHindi

E-mail me when people leave their comments –

You need to be a member of ISKCON Desire Tree | IDT to add comments!

Join ISKCON Desire Tree | IDT