अध्याय पाँच – महाराज परीक्षित को श्रील शुकदेव गोस्वामी का अन्तिम उपदेश (12.5)
1 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा: इस श्रीमदभागवत की विविध कथाओं में भगवान हरि का विस्तार से वर्णन हुआ है जिनके प्रसन्न होने पर ब्रह्माजी उत्पन्न होते हैं और उनके क्रोध से रुद्र का जन्म होता है।
2 हे राजन, तुम यह सोचने की पशु-मनोवृत्ति कि, “मैं मरने जा रहा हूँ" त्याग दो। तुम शरीर से सर्वथा भिन्न हो क्योंकि तुमने जन्म नहीं लिया है। विगतकाल में ऐसा कोई समय नहीं था जब तुम नहीं थे और तुम विनष्ट होनेवाले भी नहीं हो।
3 तुम अपने ही पुत्रों तथा पौत्रों के रूप में फिर से जन्म नहीं लोगे जिस तरह बीज से अंकुर जन्म लेता है और पुनः नया बीज बनाता है। प्रत्युत तुम भौतिक शरीर तथा उसके साज-सामान से सर्वथा भिन्न हो, जिस तरह अग्नि अपने ईंधन से भिन्न होती है।
4 स्वप्न में मनुष्य अपने ही सिर को काटा जाते देख सकता है और वह यह समझ सकता है कि उसका आत्मा स्वप्न के अनुभव से अलग खड़ा है। इसी तरह जागने पर मनुष्य यह देख सकता है कि उसका शरीर पाँच भौतिक तत्त्वों का फल है। इसलिए यह माना जाता है कि वास्तविक आत्मा उस शरीर से पृथक है, जिसे वह देखता है और वह अजन्मा तथा अमर है।
5 जब घड़ा टूट जाता है, तो घड़े के भीतर का आकाश पहले की ही तरह आकाश तत्त्व बना रहता है। उसी तरह जब स्थूल तथा सूक्ष्म शरीर मरते हैं, तो उनके भीतर का जीव अपना आध्यात्मिक स्वरूप धारण कर लेता है।
6 आत्मा के भौतिक शरीर, गुण तथा कर्म भौतिक मन द्वारा ही उत्पन्न किये जाते हैं। मन स्वयं भगवान की मायाशक्ति से उत्पन्न होता है और इस तरह आत्मा भौतिक अस्तित्व धारण करता है।
7 दीपक अपने ईंधन, पात्र, बत्ती तथा अग्नि के सम्मेल से ही कार्य करता है। इसी तरह भौतिक जीवन, शरीर के साथ आत्मा की पहचान पर आधारित होने से, उत्पन्न होता है और रजो, तमो तथा सतोगुणों के कार्यों से विनष्ट होता है, जो शरीर के अवयवी तत्त्व हैं।
8 शरीर के भीतर का आत्मा स्वयं-प्रकाशित है और दृश्य स्थूल शरीर तथा अदृश्य सूक्ष्म शरीर से पृथक है। यह परिवर्तनशील शरीरों का स्थिर आधार बना रहता है, जिस तरह आकाश भौतिक रूपान्तर की अपरिवर्तनशील पृष्ठभूमि है। इसलिए आत्मा अनन्त और भौतिक तुलना के परे है।
9 हे राजन, भगवान वासुदेव का निरन्तर ध्यान करते हुए तथा शुद्ध एवं तार्किक बुद्धि का प्रयोग करके अपनी आत्मा पर सावधानी से विचार करो कि यह भौतिक शरीर के भीतर किस तरह स्थित है।
10 ब्राह्मण के शाप से भेजा हुआ तक्षक सर्प तुम्हारी असली आत्मा को जला नहीं सकेगा। मृत्यु के दूत तुम जैसे आत्मा के स्वामी को कभी नहीं जला पायेंगे क्योंकि तुमने भगवदधाम जाने के मार्ग के सारे खतरों को पहले से ही जीत रखा है।
11-12 तुम मन में यह विचार लाओ कि, “मैं परम सत्य, परम धाम से अभिन्न हूँ और परम गन्तव्य परम सत्य मुझसे अभिन्न हैं।" इस तरह अपने को परमात्मा को सौंपते हुए जो सभी भौतिक उपाधियों से मुक्त हैं, तुम तक्षक सर्प को, जब वह तुम्हारे पास पहुँचकर अपने विष-दन्तों से तुम्हारे पैर में काटेगा, तो तुम्हें पता तक नहीं लगेगा। न ही तुम अपने मरते हुए शरीर को या अपने चारों ओर के जगत को देखोगे क्योंकि तुम अपने को उनसे पृथक अनुभव कर चुके होगे।
13 हे प्रिय राजा परीक्षित, मैंने तुमसे ब्रह्माण्ड के परमात्मा भगवान हरि की लीलाएँ – वे सारी कथाएँ – कह दीं जिन्हें प्रारम्भ में तुमने पूछा था। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?
(समर्पित एवं सेवारत – जगदीश चन्द्र चौहान)
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