ऐल गीत (11.26)

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अध्याय छब्बीस – ऐल गीत (11.26)

1 भगवान ने कहा: मानव-जीवन मेरा साक्षात्कार करने का अवसर प्रदान करता है। मेरी प्रेमाभक्ति में स्थित होकर, मनुष्य मुझे प्राप्त कर सकता है, जो समस्त आनन्द का आगार तथा प्रत्येक जीव के हृदय में वास करनेवाला परमात्मा स्वरूप है।

2 दिव्य ज्ञान में स्थिर व्यक्ति प्रकृति के गुणों के फलों से अपनी झूठी पहचान त्यागकर, बद्ध जीवन से मुक्त हो जाता है। इन फलों को मात्र मोह समझकर उन्हीं के बीच निरन्तर रहते हुए भी वह प्रकृति के गुणों में फँसने से अपने को बचाता है। चूँकि गुण तथा उनके फल सत्य नहीं होते, अतएव वह उन्हें स्वीकार नहीं करता।

3 मनुष्य को कभी ऐसे भौतिकतावादियों की संगति नहीं करनी चाहिए जो अपने जननांग तथा उदर की तृप्ति में लगे रहते हों। उनका अनुसरण करने पर मनुष्य अंधकार के गहरे गड्ढे में गिर जाता है, जिस तरह एक अन्धे व्यक्ति द्वारा दूसरे अन्धे व्यक्ति का अनुगमन करने पर होता है।

4 निम्नलिखित गीत सुप्रसिद्ध सम्राट पुरुरवा द्वारा गाया गया था। अपनी पत्नी उर्वशी से विलग होने पर सर्वप्रथम वह सम्भ्रमित हुआ किन्तु अपने शोक को वश में करने से वह विरक्ति का अनुभव करने लगा।

5 जब वह उसको छोड़कर जा रही थी तो निर्वस्त्र होते हुए भी, उसके पीछे पागल की तरह दौड़ने लगा और अत्यन्त दुख से चिल्लाने लगा, “मेरी पत्नी, अरे निष्ठुर नारी! जरा ठहरों।"

6 यद्यपि पुरुरवा ने वर्षों तक सायंकाल की घड़ियों में यौन आनन्द भोगा था, फिर भी ऐसे तुच्छ भोग से वह तृप्त नहीं हुआ था। उसका मन उर्वशी के प्रति इतना आकृष्ट था कि वह यह भी देख नहीं पाया कि रातें किस तरह आती और चली जाती हैं।

7 राजा ऐल ने कहा : हाय! मेरे मोह की सीमा को तो देखो! यह देवी मेरा आलिंगन करती थी और मेरी गर्दन अपनी मुट्ठी में किये रहती थी। मेरा हृदय काम-भाव से इतना दूषित था कि मुझे इसका ध्यान ही न रहा कि मेरा जीवन किस तरह बीता जा रहा है।

8 इस स्त्री ने मुझे इतना ठगा कि मैं उदय होते अथवा अस्त होते सूर्य को भी देख नहीं सका। हाय! मैं इतने वर्षों से व्यर्थ ही अपने दिन गँवाता रहा।

9 यद्यपि मैं शक्तिशाली सम्राट तथा इस पृथ्वी पर समस्त राजाओं का मुकुटमणि माना जाता हूँ, किन्तु देखो न! मोह ने मुझे स्त्रियों के हाथों का खिलौने जैसा पशु बना दिया है।

10 यद्यपि मैं प्रचुर ऐश्वर्य से युक्त शक्तिशाली स्वामी था, किन्तु उस स्त्री ने मुझे त्याग दिया मानों मैं कोई घास का तिनका पत्ती होऊँ। फिर भी मैं निर्लज्ज पागल व्यक्ति की तरह चिल्लाते हुए, उसका पीछा करता रहा।

11 कहाँ है मेरा तथाकथित अत्यधिक प्रभाव, बल तथा स्वामित्व? जिस स्त्री ने मुझे पहले ही छोड़ दिया था उसके पीछे मैं उसी तरह भागा जा रहा हूँ जैसे कि कोई गधा जिसके मुँह पर गधी दुलत्ती झाड़ती है।

12 ऊँची शिक्षा या तपस्या तथा त्याग किस काम का? इसी तरह धार्मिक शास्त्रों का अध्ययन करने, एकान्त तथा मौन होकर रहने और फिर स्त्री द्वारा किसी का मन चुराये जाने से क्या लाभ?

13 धिक्कार है मुझे! मैं इतना बड़ा मूर्ख हूँ कि मैंने यह भी नहीं जाना कि मेरे लिए क्या अच्छा है। मैंने तो यह सोचा था कि मैं अत्यधिक बुद्धिमान हूँ। यद्यपि मुझे स्वामी का उच्च पद प्राप्त हो गया, किन्तु मैं स्त्रियों से अपने को परास्त करवाता रहा मानो मैं कोई बैल या गधा होऊँ।

14 यद्यपि मैं उर्वशी के होठों के तथाकथित अमृत का सेवन वर्षों तक कर चुका था किन्तु मेरी काम-वासनाएँ मेरे हृदय में बारम्बार उठती रहीं और कभी तुष्ट नहीं हुईं जिस तरह घी की आहुति डालने पर, अग्नि कभी भी बुझाई नहीं जा सकती।

15 जो भौतिक अनुभूति के परे हैं और आत्माराम मुनियों के स्वामी हैं, उन भगवान के अतिरिक्त मेरी इस चेतना को जो स्त्री के द्वारा चुराई जा चुकी है, भला और कौन बचा सकता है?

16 चूँकि मैंने अपनी बुद्धि को मन्द बनने दिया और चूँकि मैं अपनी इन्द्रियों को वश में नहीं कर सका, इसीलिए मेरे मन का विटप मोह मिटा नहीं यद्यपि उर्वशी ने सुन्दर वचनों द्वारा मुझे अच्छी सलाह दी थी।

17 भला मैं अपने कष्ट के लिए उसे कैसे दोष दे सकता हूँ जबकि मैं स्वयं अपने असली आध्यात्मिक स्वभाव से अनजान हूँ? मैं अपनी इन्द्रियों को वश में नहीं कर पाया, इसीलिए मैं उस व्यक्ति की तरह हूँ जो निर्दोष रस्सी को भ्रमवश सर्प समझ बैठता है।

18 आखिर यह दूषित शरीर है क्या – इतना गंदा तथा दुर्गन्ध से भरा हुआ? मैं एक स्त्री के शरीर की सुगन्धि तथा सुन्दरता से आकृष्ट हुआ था किन्तु वे आकर्षक स्वरूप हैं क्या? वे माया (मोह) द्वारा उत्पन्न छद्म आवरण ही तो हैं।

19-20 कोई यह निश्चित नहीं कर सकता है कि शरीर वास्तव में किसकी सम्पत्ति है। क्या यह उस माता-पिता की है, जिसने उसे जन्म दिया है, अथवा इसे सुख देनेवाली पत्नी की है या इसके मालिक की है, जो शरीर को हुक्म देता रहता है? अथवा यह चिता की अग्नि की अथवा उन कुत्तों तथा सियारों की है, जो अन्ततोगत्वा इसका भक्षण करेंगे? क्या यह उस अन्तस्थ आत्मा की सम्पत्ति है, जो सुख-दुख में इसका साथ देता है अथवा यह शरीर उन घनिष्ठ मित्रों का है, जो इसको प्रोत्साहित करते तथा इसकी सहायता करते हैं? यद्यपि मनुष्य कभी भी शरीर के स्वामी को निश्चित रूप से तय नहीं कर पाता, किन्तु वह इससे अनुरक्त रहता है। यह भौतिक शरीर उस दूषित पदार्थ के समान है, जो निम्न स्थान की ओर बढ़ रहा है; फिर भी जब मनुष्य किसी स्त्री के मुख की ओर टकटकी लगाता है, तो सोचता है, “कितनी सुन्दर है यह स्त्री? कैसी सुघड़ नाक है इसकी और जरा इसकी सुन्दर हँसी को तो देखो।"

21 सामान्य कीड़ों-मकोड़ों तथा उन व्यक्तियों में अन्तर ही क्या है, जो चमड़ी, मांस, रक्त, पेशी, चर्बी, मज्जा, हड्डी, मल, मूत्र तथा पीब से बने इस भौतिक शरीर का भोग करना चाहते हैं?

22 शरीर की वास्तविक प्रकृति को सिद्धान्त रूप में जानने पर भी व्यक्ति को कभी भी स्त्रियों या स्त्रियों में लिप्त रहनेवाले पुरुषों की संगति नहीं करनी चाहिए। इन्द्रियों का उनके विषयों से सम्पर्क अनिवार्य रूप से मन को विचलित कर देता है।

23 चूँकि मन ऐसी वस्तु से विचलित नहीं होता जो न तो देखी गई हो, न सुनी गई हो, इसलिए ऐसे व्यक्ति का मन, जो अपनी इन्द्रियों को रोकता है, स्वत: अपने भौतिक कर्मों को करने से रोक दिया जाएगा और शान्त हो जायेगा।

24 इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी इन्द्रियों को स्त्रियों की या स्त्रियों के प्रति आसक्त पुरुषों की संगति न करने दे। यहाँ तक कि जो अत्यधिक विद्वान हैं वे मन के छह शत्रुओं पर भरोसा नहीं कर सकते, तो फिर मुझ जैसे मूर्ख व्यक्तियों के बारे में क्या कहा जाय?

25 भगवान ने कहा : इस प्रकार यह गीत गाकर, देवताओं तथा मनुष्यों में विख्यात महाराज पुरुरवा ने, वह पद त्याग दिया जिसे उसने उर्वशीलोक में प्राप्त कर लिया था। दिव्य ज्ञान से उसका मोह हट गया; उसने अपने हृदय में मुझे परमात्मा रूप में समझ लिया जिससे अन्त में उसे शान्ति मिल गई।

26 इसलिए बुद्धिमान मनुष्य को सारी कुसंगति त्याग देनी चाहिए और सन्त भक्तों की संगति ग्रहण करनी चाहिए जिनके शब्दों से मन का अति-अनुराग समाप्त हो जाता है।

27 मेरे भक्त अपने मन को मुझ पर स्थिर करते हैं और किसी भी भौतिक वस्तु पर निर्भर नहीं रहते। वे सदैव शान्त, समदृष्टि से युक्त तथा ममत्व, अहंकार, द्वन्द्व तथा लोभ से रहित होते हैं।

28 हे महाभाग उद्धव, ऐसे सन्त भक्तों की संगति में सदा मेरी चर्चा चलती रहती है और जो लोग मेरी महिमा के कीर्तन तथा श्रवण में भाग लेते हैं, वे निश्चित रूप से सारे पापों से शुद्ध हो जाते हैं।

29 जो कोई मेरी इन कथाओं को सुनता है, कीर्तन करता है और आदरपूर्वक आत्मसात करता है, वह श्रद्धा के साथ मेरे परायण हो जाता है और इस तरह मेरी भक्ति प्राप्त करता है।

30 पूर्ण भक्त के लिए मुझ परम सत्य की भक्ति प्राप्त कर लेने के बाद, करने के लिए बचता ही क्या है? परम सत्य के गुण असंख्य हैं और मैं साक्षात आनन्दमय अनुभव हूँ।

31 जो व्यक्ति यज्ञ-अग्नि के पास पहुँच चुका हो, उसके लिए जिस तरह शीत, भय तथा अंधकार दूर हो जाते हैं, उसी तरह जो व्यक्ति भगवान के भक्तों की सेवा में लगा रहता है उसका आलस्य, भय तथा अज्ञान दूर हो जाता है।

32 भगवान के भक्त, जो कि परम ज्ञान को शान्त भाव से प्राप्त हैं, उन लोगों के लिए चरम शरण हैं, जो भौतिक जीवन के भयावने सागर में बारम्बार डूबते तथा उठते हैं। ऐसे भक्त उस मजबूत नाव के सदृश होते हैं, जो डूब रहे व्यक्तियों की रक्षा करती है।

33 जिस तरह समस्त प्राणियों के लिए भोजन ही जीवन है, जिस तरह मैं दुखियारों का परम आश्रय हूँ तथा जिस तरह इस लोक से मरकर जाने वालों के लिए धर्म ही सम्पदा है, उसी तरह मेरे भक्त उन लोगों के एकमात्र आश्रय हैं, जो जीवन की दुखमय अवस्था में पड़ने से डरते रहते हैं।

34 मेरे भक्तगण दिव्य आँखें प्रदान करते हैं जबकि सूर्य केवल बाह्य दृष्टि प्रदान करता है और वह भी तब, जब वह आकाश में उदय हुआ रहता है। मेरे भक्तगण ही मनुष्य के पूज्य देव तथा असली परिवार हैं; वे स्वयं ही आत्मा हैं और वे मुझसे अभिन्न हैं।

35 इस तरह उर्वशी के लोक में रहने की अपनी इच्छा त्याग करके महाराज पुरुरवा समस्त भौतिक संगति से मुक्त होकर तथा अपने भीतर पूरी तरह तुष्ट होकर पृथ्वी पर विचरण करने लगे।

(समर्पित एवं सेवारत – जगदीश चन्द्र चौहान)

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Comments

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    हरे राम हरे राम - राम राम हरे हरे🙏
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