अध्याय इक्कीस – भगवान कृष्ण द्वारा वैदिक पथ की व्याख्या (11.21)
1 भगवान ने कहा : जो मुझे प्राप्त करने वाली उन विधियों को, जो भक्ति, वैश्लेषिक दर्शन (ज्ञान) तथा नियत कर्मों के नियमित निष्पादन (कर्म-योग) से युक्त हैं, त्याग देता है और भौतिक इन्द्रियों से चलायमान होकर क्षुद्र इन्द्रियतृप्ति में लग जाता है, वह निश्चय ही बारम्बार संसार-चक्र में फँसता जाता है।
2 यह निश्चित मत है कि अपने-अपने पद पर निष्ठा (स्थिरता) वास्तविक शुद्धि कहलाती है और अपने पद से विचलन अशुद्धि है।
3 हे निष्पाप उद्धव, यह समझने के लिए कि जीवन में क्या उचित है, मनुष्य को किसी एक पदार्थ का मूल्यांकन उसकी विशेष कोटि के भीतर ही करना चाहिए। इस तरह धर्म का विश्लेषण करते समय मनुष्य को शुद्धि तथा अशुद्धि पर विचार करना चाहिए। इसी प्रकार अपने सामान्य व्यवहार में मनुष्य को अच्छे तथा बुरे में अन्तर करना चाहिए और अपनी शारीरिक दीर्घजीविता (अतिजीवन) के लिए उसे पहचानना चाहिए कि क्या शुभ है और क्या अशुभ है।
4 मैंने जीवन की यह शैली उन लोगों के लिए प्रकट की है, जो संसारी धार्मिक सिद्धान्तों का भार वहन कर रहे हैं।
5 पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश – ये पाँच मूलभूत तत्त्व भगवान से उद्भूत होते हैं जिनसे ब्रह्मा से लेकर जड़ प्राणियों तक समस्त बद्धजीवों के शरीर बने हैं।
6 हे उद्धव, यद्यपि सारे शरीर इन्हीं पाँच तत्त्वों से बने हैं और इसीलिए समान हैं, किन्तु वैदिक ग्रन्थ ऐसे शरीरों की कल्पना भिन्न भिन्न नामों तथा रूपों में करते हैं जिससे जीव अपने जीवन-लक्ष्य प्राप्त कर सकें।
7 हे सन्त उद्धव, मैंने भौतिकतावादी कर्मों पर प्रतिबन्धित करने के लिए यह सुनिश्चित कर दिया है कि देश, काल तथा सारी भौतिक वस्तुओं में से कौन उचित है और कौन अनुचित है।
8 स्थानों में से वे स्थान दूषित माने जाते हैं, जो धब्बेदार बारहसिंगों से रहित हैं, जो ब्राह्मणों के प्रति भक्ति से रहित है, जहाँ धब्बेदार बारहसिंगे होते हैं, किन्तु जो सम्माननीय व्यक्तियों से रहित होते हैं तथा कीकट जैसे प्रदेश एवं वे स्थान जहाँ स्वच्छता तथा संस्कारों की अवहेलना की जाती है, जहाँ पृथ्वी बंजर होती है।
9 कोई काल विशेष तब शुद्ध माना जाता है जब वह अपनी प्रकृति से अथवा उपयुक्त साज-सामग्री प्राप्त होने से मनुष्य के नियत कर्तव्य को करने के लिए उपयुक्त हो। वह काल जो किसी के कर्तव्य में बाधक हो अशुद्ध माना जाता है।
10 किसी वस्तु की शुद्धि या अशुद्धि की स्थापना दूसरी वस्तु के सम्प्रयोग से, शब्दों से, अनुष्ठानों (संस्कारों) से, काल के प्रभाव से अथवा आपेक्षिक महत्त्व से की जाती है।
11 अशुद्ध वस्तुएँ किसी व्यक्ति पर पाप लगा सकती हैं अथवा नहीं भी लगा सकतीं जो व्यक्ति की शक्ति अथवा दुर्बलता, बुद्धि, सम्पत्ति, स्थान तथा भौतिक स्थिति पर निर्भर करता है।
12 अन्न, लकड़ी के पात्र, अस्थि से बने पदार्थ, धागे, द्रव, अग्नि से प्राप्त वस्तुएँ, चमड़े तथा मिट्टी से बनी वस्तुएँ – ये सब काल, वायु, अग्नि, पृथ्वी तथा जल के द्वारा अलग अलग से अथवा उनके मिले जुले रूप से शुद्ध हो जाती हैं।
13 कोई शुद्ध करनेवाला पदार्थ तब उपयुक्त माना जाता है जब उसके लगाने से किसी दूषित वस्तु की दुर्गन्ध या गन्दी परत हट जाय और वह अपनी पूर्व प्रकृति को प्राप्त कर ले।
14 स्नान, दान, तप, आयु, निजी बल (सामर्थ्य), संस्कार, नियत कर्म तथा इन सबसे ऊपर मेरे स्मरण द्वारा आत्मशुद्धि की जा सकती है। ब्राह्मण तथा अन्य द्विजातियों को अपना विहित कर्म करने के पूर्व ठीक से शुद्ध हो लेना चाहिए।
15 मंत्र तब शुद्ध होता है, जब उसका समुचित ज्ञान के साथ उच्चारण किया जाय तथा कोई कर्म तब शुद्ध बनता है, जब वह मुझे अर्पित किया जाय। इस तरह स्थान, काल, वस्तु, कर्ता, मंत्र तथा कर्म की शुद्धि से मनुष्य धार्मिक बनता है और इन छहों की उपेक्षा करने से, वह अधार्मिक माना जाता है।
16 कभी पुण्य पाप बनता है और कभी वैदिक आदेशों के बल पर पाप पुण्य बन जाता है। ऐसे विशिष्ट नियमों से पुण्य और पाप का स्पष्ट अन्तर मिट जाता है।
17 जिन कर्मों से एक उच्चासिन व्यक्ति नीचे गिरता है, उन्हीं के द्वारा वे व्यक्ति नीचे नहीं गिरते जो पहले से गिरे हुए (पतित) हैं। निस्सन्देह, जमीन पर लेटा रहनेवाला व्यक्ति और नीचे कैसे गिर सकता है? यह भौतिक संगति, जो मनुष्य के अपने स्वभाव द्वारा निर्देशित होती है, सद्गुण मानी जाती है।
18 किसी पापपूर्ण या भौतिकतावादी कर्म से अपने को दूर रखकर, मनुष्य उसके बन्धन से मुक्त हो जाता है। ऐसा त्याग मनुष्यों के धार्मिक तथा कल्याणप्रद जीवन की आधारभूमि है और यह सारे शोक, मोह तथा भय को दूर कर देता है।
19 जो व्यक्ति भौतिक इन्द्रियविषयों को अभीष्ट मान लेता है, वह निश्चित रूप से उनमें आसक्त हो जाता है। ऐसी आसक्ति से काम उत्पन्न होता है और यही काम लोगों में कलह उत्पन्न करता है।
20 कलह से असह्य क्रोध उत्पन्न होता है और उससे अज्ञान का अंधकार उत्पन्न होता है। यह अज्ञान तुरन्त ही मनुष्य की विस्तृत चेतना पर हावी हो जाता है।
21 हे साधु उद्धव, असली बुद्धि से विहीन व्यक्ति को हर वस्तु से विहीन माना गया है। वह जीवन के वास्तविक लक्ष्य से हटकर उसी तरह मन्द (जड़) पड़ जाता है, जिस तरह कि मृत मनुष्य।
22 इन्द्रियतृप्ति में लीन रहने के कारण मनुष्य स्वयं या दूसरों को पहचान नहीं पाता। वह वृक्ष की भाँति अज्ञान में व्यर्थ ही जीवित रहकर धौंकनी की तरह श्वास मात्र लेता रहता है।
23 फल प्रदान करने का वादा करनेवाले श्रुति के वचन मनुष्यों को परम कल्याण दिये जाने की संस्तुति नहीं करते अपितु वे लाभप्रद धार्मिक कर्म करने के लिए प्रलोभन मात्र हैं, जिस तरह कि बच्चे को लाभप्रद औषधी पीने के हेतु, मिश्री देने का प्रलोभन दिया जाता है।
24 निस्सन्देह इन्द्रियतृप्ति, दीर्घायु, इन्द्रिय-कर्म, बल, यौन-शक्ति, मित्रों एवं परिवार के प्रति सारे मनुष्य जन्म से ही आसक्त हैं और इन वस्तुओं में आसक्ति ही वास्तविक जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने में बाधक है।
25 अपने स्वार्थ से अनजान लोग भौतिक संसार के मार्ग में विचरण कर रहे हैं और धीरे धीरे अंधकार की ओर अग्रसर हो रहे हैं। भला वेद उन्हें और अधिक इन्द्रियतृप्ति के प्रति क्यों प्रोत्साहित करने लगे यदि वे मूर्खजन विनीत भाव से वैदिक आदेशों पर ध्यान दें।
26 विकृत बुद्धि वाले लोग वैदिक ज्ञान के इस वास्तविक उद्देश्य को नहीं समझ पाते, प्रत्युत वे फलों का वादा करनेवाले वेदों के अलंकारमय कथनों को परम वैदिक सत्य कहकर प्रचार करते हैं। किन्तु जो वेदों के वास्तविक ज्ञाता हैं, वे वेदों का तात्पर्य इस तरह नहीं बताते।
27 काम, क्रोध तथा लोभ से पूरित मनुष्यगण मात्र फूलों को ही जीवन का वास्तविक फल मान बैठते हैं। अग्नि की चमक से मोहग्रस्त होकर तथा इसके धुएँ से घुटकर, वे अपनी असली पहचान नहीं जान पाते।
28 हे उद्धव, वैदिक अनुष्ठानों का आदर करने से प्राप्त इन्द्रियतृप्ति के प्रति समर्पित लोग, यह नहीं समझ सकते कि मैं हर एक के हृदय में स्थित हूँ और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मुझसे अभिन्न नहीं है और मुझी से उद्भूत है। निस्सन्देह, वे उन व्यक्तियों के समान हैं जिनकी आँखें कुहरे से ढकी रहती हैं।
29-30 जो लोग इन्द्रियतृप्ति के वशीभूत हैं, वे मेरे द्वारा बताये गए वैदिक ज्ञान के गुह्य मत को नहीं समझ सकते। वे हिंसा में आनन्द का अनुभव करते हुए अपनी ही इन्द्रियतृप्ति के लिए यज्ञ में निरपराध पशुओं का निष्ठुरता से वध करते हैं और इस तरह वे देवताओं, पितरों तथा भूत-प्रेतों के नायकों की पूजा करते हैं। किन्तु वैदिक यज्ञविधि में हिंसा की ऐसी उत्कट इच्छा को कभी प्रोत्साहन नहीं दिया जाता।
31 जिस तरह कोई मूर्ख व्यापारी व्यर्थ की व्यापारिक सट्टेबाजी में अपनी असली सम्पत्ति गँवा देता है, उसी तरह मूर्ख व्यक्ति जीवन की वास्तविक मूल्यवान वस्तुओं को त्यागकर स्वर्ग जाने के पीछे पड़े रहते हैं, जो सुनने में मोहक तो है किन्तु स्वप्न सदृश असत्य है। ऐसे मोहग्रस्त लोग अपने हृदयों में यह कल्पना करते हैं कि वे सारे भौतिक वर प्राप्त कर सकेंगे।
32 रजो, सतो तथा तमोगुण में स्थित लोग इन्द्र इत्यादि विशिष्ट देवताओं तथा अन्य अर्चाविग्रहों की पूजा करते हैं, जो उन्हीं रजो, सतो या तमोगुण को प्रकट करते हैं, किन्तु वे मेरी समुचित पूजा करने में विफल रहते हैं।
33-34 देवताओं के उपासक सोचते हैं, “हम इस जीवन में देवताओं की पूजा करेंगे और अपने यज्ञों के बल पर हम स्वर्ग जाकर वहाँ भोग करेंगे। भोग समाप्त होने पर हम इस जगत में लौट आयेंगे और राज-परिवारों में वैभवशाली गृहस्थों के रूप में जन्म लेंगे।" ऐसे लोग अत्यधिक घमण्डी तथा लालची होने से, वेदों के अलंकारयुक्त शब्दों से मोहित हो जाते हैं। वे मुझ भगवान की कथाओं के प्रति आकृष्ट नहीं होते।
35 तीन काण्ड वाले वेद अन्तत: यह बतलाते हैं कि जीव ही शुद्ध आत्मा है। किन्तु वैदिक ऋषि-मुनि तथा मंत्र गुह्य रूप से बतलाते हैं और मैं भी ऐसे गोपनीय वर्णनों से प्रसन्न होता हूँ।
36 वेदों की दिव्य ध्वनि को समझ पाना अत्यन्त कठिन है और वह प्राण, इन्द्रियों तथा मन के भीतर विभिन्न स्तरों में प्रकट होती है। यह वैदिक ध्वनि समुद्र के समान असीम, अगाध तथा अथाह है।
37 मैं सारे जीवों के भीतर असीम, अपरिवर्तनीय तथा सर्वशक्तिमान भगवान के रूप में निवास करते हुए, सारे जीवों के भीतर ॐकार के रूप में वैदिक ध्वनि सुस्थापित करता हूँ। वह उसी तरह सूक्ष्म अनुभव की जाती है, जिस तरह कि कमलनाल का एक तन्तु।
38-40 जिस प्रकार मकड़ी अपने हृदय से अपना जाला निकाल कर मुखमार्ग से बाहर उगलती है, उसी तरह भगवान गूँजती हुई आदि प्राणवायु के रूप में अपने को प्रकट करते हैं। इस प्राणवायु में सारे पवित्र वैदिक छन्द तथा दिव्य आनन्द भरे रहते हैं। इस तरह प्रभु अपने हृदय के आकाश से अपने मन के द्वारा महान तथा असीम वैदिक ध्वनि को उत्पन्न करते हैं, जो स्पर्श जैसी नाना प्रकार की ध्वनियों को जन्म देती है। यह वैदिक ध्वनि हजारों दिशाओं में फूटती है और ॐकार वर्ण से विस्तृत विभिन्न अक्षरों से अलंकृत होती है – यथा व्यंजन, स्वर, ऊष्म तथा अन्तस्थ । तत्पश्चात अनेक मौखिक भेदों से वेद का विस्तार होता है और विभिन्न छन्दों में अभिव्यक्ति होती है जिनमें प्रत्येक छन्द पिछले वाले से चार वर्ण अधिक होता है। अन्त में भगवान वैदिक ध्वनि के अपने स्वरूप को अपने ही भीतर समेट लेते हैं।
41 वैदिक छन्द हैं – गायत्री, उष्णीक, अनुष्टुप, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती, अतिछन्द, अत्याष्टि, अतिजगती तथा अतिविराट।
42 सारे जगत में मेरे अतिरिक्त अन्य कोई वैदिक ज्ञान के गुह्य प्रयोजन को नहीं समझता। अतः लोग यह नहीं जानते कि कर्मकाण्ड के अनुष्ठानिक आदेशों में वेद किस बात की संस्तुति कर रहे हैं अथवा उपासनाकाण्ड में प्राप्य पूजा के सूत्रों से कौन-सी वस्तु सूचित होती है अथवा वेदों के ज्ञानकाण्ड में विभिन्न संकल्पनाओं के माध्यम से किसकी विषद व्याख्या की गई है।
43 मैं वेदों द्वारा आदिष्ट अनुष्ठानिक यज्ञ हूँ और मैं ही उपास्य देव हूँ। मैं ही विभिन्न दार्शनिक सिद्धान्तों द्वारा प्रस्तुत किया जाता हूँ और दार्शनिक विश्लेषण द्वारा निषेध किया जानेवाला भी मैं ही हूँ। इस तरह दिव्य ध्वनि मुझे समस्त वैदिक ज्ञान के अनिवार्य अर्थ के रूप में स्थापित करती है। सारे वेद समस्त भौतिक द्वैत का विस्तारपूर्वक विश्लेषण करते हुए उसे मेरी ही मोहक शक्ति मानकर, अन्त में इस द्वैत का पूर्णतया निषेध करते हैं और अपने आप को तुष्ट करते हैं।
(समर्पित एवं सेवारत – जगदीश चन्द्र चौहान)
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