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अध्याय छप्पन – स्यमन्तक मणि  

1 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा: कृष्ण का अपमान करने के बाद सत्राजित ने अपनी पुत्री तथा स्यमन्तक मणि उन्हें भेंट करके प्रायश्चित करने का भरसक प्रयत्न किया।

2 महाराज परीक्षित ने पूछा: हे ब्राह्मण – राजा सत्राजित ने क्या कर दिया कि भगवान कृष्ण उससे रुष्ट हो गए? उसे स्यमन्तक मणि कहाँ से मिली और उसने अपनी पुत्री भगवान को क्यों दी?

3-5 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा: सूर्यदेव अपने भक्त सत्राजित के प्रति अत्यन्त वत्सल थे। अतः उनके श्रेष्ठ मित्र के रूप में उन्होंने अपनी तुष्टि के चिन्ह रूप में उसे स्यमन्तक नामक मणि प्रदान की। सत्राजित उस मणि को गले में पहनकर द्वारका में प्रविष्ट हुआ। हे राजन, वह साक्षात सूर्य के समान चमक रहा था और मणि के तेज से पहचाना नहीं जा रहा था। जब लोगों ने सत्राजित को दूर से आते देखा तो उसकी चमक से वे चौंधिया गये। उन्होंने मान लिया कि वह सूर्यदेव है और भगवान कृष्ण को बताने गये जो उस समय पाँसा खेल रहे थे।

6-7 द्वारकावासियों ने कहा: हे नारायण, हे शंख, चक्र, गदा धारण करने वाले, हे कमलनेत्र दामोदर, हे गोविन्द, हे यदुवंशी, आपको नमस्कार है। हे ब्रह्माण्ड के स्वामी, सवितादेव आपको मिलने आये हैं। वे अपनी प्रखर तेजोमय किरणों से सबों की आँखों को चौंधिया रहे हैं।

8 हे प्रभु, अब तीनों लोकों के परम श्रेष्ठ देवता आपको खोज निकालने के लिए उत्सुक हैं क्योंकि आपने अपने को यदुवंशियों के बीच छिपा रखा है। अतः अजन्मा सूर्यदेव आपका दर्शन करने यहाँ आये हैं।

9 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने आगे बताया: ये भोलेभाले वचन सुनकर कमलनयन जोर से हँसे और बोले, यह सूर्यदेव, रवि नहीं, अपितु सत्राजित है, जो अपनी मणि के कारण चमक रहा है।

10 राजा सत्राजित समारोह के साथ शुभ अनुष्ठान सम्पन्न करके अपने ऐश्वर्यशाली घर में प्रविष्ट हुआ। उसने योग्य ब्राह्मणों से अपने घर के मन्दिर कक्ष में स्यमन्तक मणि की स्थापना करा दी।

11-12 हे प्रभु, वह मणि प्रतिदिन आठ भार सोना उत्पन्न करता था, जिस स्थान में वह रखा और पूजा जाता था वह स्थान आपदाओं, अकाल, असामयिक मृत्यु, सर्पदंश, मानसिक तथा भौतिक रोगों और ठगों से मुक्त रहता था। एक अवसर पर भगवान कृष्ण ने सत्राजित से अनुरोध किया कि वह इसे यदुराज उग्रसेन को दे दे किन्तु सत्राजीत ने देने से इनकार कर दिया। उसने भगवान की याचना को ठुकराने से होने वाले अपराध की गम्भीरता पर विचार नहीं किया।

13-14 एक बार सत्राजित का भाई प्रसेन उस चमकीली मणि को गले में पहनकर घोड़े पर सवार हुआ और जंगल में शिकार खेलने चला गया। प्रसेन तथा उसके घोड़े को एक सिंह ने मारकर वह मणि ले ली। किन्तु जब वह सिंह पर्वत की गुफा में घुसा तो उस मणि के इच्छुक जाम्बवान ने उसे मार डाला ।

15-17 गुफा के भीतर जाम्बवान ने उस मणि को अपने पुत्र को खिलौने के तौर पर खेलने के लिए दे दी। सत्राजित अपने भाई को वापस आता न देखकर अत्यन्त व्याकुल हो गया । उसने कहा: सम्भवतया कृष्ण ने मेरे भाई को मार डाला है क्योंकि वह अपने गले में मणि पहनकर जंगल गया था। जब लोगों ने यह दोषारोपण सुना तो वे एक-दूसरे से कानाफूसी करने लगे। जब भगवान कृष्ण ने यह अफवाह सुनी तो उन्होंने अपने यश में लगे कलंक को मिटाना चाहा। अतः द्वारका के कुछ नागरिकों को अपने साथ लेकर वे प्रसेन को ढूँढने के लिए रवाना हो गये।

18-20 जंगल में उन्होंने प्रसेन तथा उसके घोड़े दोनों को ही सिंह द्वारा मारा गया पाया। इसके आगे उन्होंने पर्वत की बगल में सिंह को ऋक्ष (जाम्बवान) द्वारा मारा गया पाया। भगवान ने ऋक्षराज की भयावनी घनान्धकारमय गुफा के बाहर नागरिकों को बैठा दिया और अकेले ही गुफा में प्रविष्ट हो गये। वहाँ भगवान कृष्ण ने देखा कि वह बहुमूल्य मणि बच्चे का खिलौना बना हुआ है। उसे लेने का संकल्प करके वे उस बालक के निकट गये।

21-23 उस असाधारण व्यक्ति को अपने समक्ष खड़ा देखकर बालक की धाय भयवश चिल्ला उठी। उसकी चीख सुनकर बलवानों में सर्वाधिक बलवान जाम्बवान क्रुद्ध होकर भगवान की ओर दौड़ा। उनके असली पद से अनजान तथा उन्हें सामान्य व्यक्ति समझते हुए जाम्बवान अपने स्वामी भगवान से क्रुद्ध होकर लड़ने लगे। दोनों जीतने के लिए कृतसंकल्प होकर घमासान द्वन्द्व युद्ध करने लगे। पहले विविध हथियारों से और तब पत्थरों, वृक्षों के तनों और अन्त में निःशस्त्र बाहुओं से एक-दूसरे से भिड़कर, वे मांस के टुकड़े के लिए झपट रहे दो बाजों की तरह लड़ रहे थे।

24-25 यह युद्ध बिना विश्राम के अट्ठाईस दिनों तक चलता रहा। दोनों एक-दूसरे पर मुक्कों से प्रहार कर रहे थे, जो टूक-टूक करने वाले बिजली के प्रहारों जैसे गिरते थे। भगवान कृष्ण के मुक्कों से जाम्बवान की उभरी मांस-पेशियाँ कुचलती गईं, उसका बल घटने लगा और अंग पसीने से तर हो गये, तो वह अत्यन्त चकित होकर भगवान से बोला।

26 जाम्बवान ने कहा: मैं जानता हूँ आप समस्त जीवों के प्राण हैं और ऐन्द्रिय, मानसिक तथा शारीरिक बल हैं। आप आदि-पुरुष, परम पुरुष, सर्व शक्तिमान नियन्ता भगवान विष्णु हैं।

27-28 आप ब्रह्माण्ड के समस्त स्रष्टाओं के परम स्रष्टा तथा समस्त सृजित वस्तुओं में निहित वस्तु (सत) हैं। आप समस्त दमनकारियों के दमनकर्ता, परमेश्वर तथा समस्त आत्माओं के परमात्मा हैं। आप वही हैं जिनके क्रोध को तनिक प्रकट करने वाली चितवन ने अथाह जल के भीतर घड़ियालों तथा तिमिंगिल मछलियों को क्षुब्ध बना दिया था, जिससे सागर मार्ग देने के लिए बाध्य हुआ था। आप वही हैं जिन्होंने अपना यश स्थापित करने के लिए एक महान पुल बनाया, लंका नगरी को जला दिया और जिनके बाणों ने रावण के सिरों को छिन्न कर दिया, जो पृथ्वी पर जा गिरे।

29-30 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा: हे राजन, तब भगवान कृष्ण ने ऋक्षराज को सम्बोधित किया जो सच्चाई जान गया था। समस्त आशीर्वादों के दाता देवकी-पुत्र कमलनेत्र भगवान ने, अपने कर-कमल से जाम्बवान का स्पर्श किया और अपने भक्त से अत्यन्त कृपापूर्वक मेघ की गर्जना जैसी गम्भीर वाणी में बोले।

31 भगवान कृष्ण ने कहा: हे ऋक्षराज, हम इसी मणि के लिए आपकी गुफा में आये हैं। मैं इस मणि का उपयोग अपने विरुद्ध लगाये गये आरोपों को झूठा सिद्ध करने के लिए करना चाहता हूँ।

32 इस प्रकार कहे जाने पर जाम्बवान ने प्रसन्नतापूर्वक अपनी कुमारी पुत्री जाम्बवती के साथ-साथ मणि को भेंट अर्पित करते हुए भगवान कृष्ण का सम्मान किया।

33 भगवान शौरी के गुफा में प्रविष्ट होने के बाद उनके साथ आये द्वारका के लोग बारह दिनों तक उनकी प्रतीक्षा करते रहे किन्तु वे बाहर नहीं आये। अन्त में वे सब निराश होकर अत्यन्त दुखी मन से अपने नगर लौट गये थे।

34-36 जब देवकी, रुक्मिणी देवी, वसुदेव तथा भगवान के अन्य सम्बन्धियों ने सुना कि वे गुफा से बाहर नहीं निकले तो वे सभी दुखी होने लगे। सत्राजित को कोसते हुए व्याकुल द्वारकावासी चन्द्रभागा नामक दुर्गा अर्चाविग्रह के समीप गये और कृष्ण की वापसी के लिए उनसे प्रार्थना करने लगे। जब नगर निवासी देवी की पूजा कर चुके तो वे उनसे बोलीं कि तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार की जाती है। तभी अपने लक्ष्य की पूर्ति करके भगवान कृष्ण अपनी नई पत्नी के साथ उनके समक्ष प्रकट हुए और उन्हें हर्ष से सराबोर कर दिया।

37-39 भगवान हृषिकेश को उनकी नवीन पत्नी के साथ तथा उनके गले में स्यमन्तक मणि पड़ी देखकर सारे लोगों में अत्यधिक प्रसन्नता छा गई, मानों कृष्ण मृत्यु से वापस लौटे हों। भगवान कृष्ण ने सत्राजित को राजसभा में बुलवाया। वहाँ राजा उग्रसेन की उपस्थिति में कृष्ण ने मणि पाये जाने की घोषणा की और तब उसे औपचारिक रीति से सत्राजित को भेंट कर दिया। अत्यधिक लज्जा से मुँह लटकाये सत्राजित ने वह मणि ले ली और घर लौट गया किन्तु सारे समय वह अपने पापपूर्ण आचरण पर पश्चाताप का अनुभव करता रहा।

40-42 अपने घोर अपराध के बारे में सोच-विचार करते और भगवान के शक्तिशाली भक्तों से संघर्ष की सम्भावना के बारे में चिन्तित राजा सत्राजित ने सोचा, “मैं किस तरह अपने कल्मष को धो सकता हूँ और किस तरह भगवान अच्युत मुझ पर प्रसन्न हों? मैं अपने सौभाग्य की पुनः प्राप्ति के लिए क्या कर सकता हूँ? दूरदृष्टि न होने, कंजूस, मूर्ख तथा लालची होने से मैं जनता से शापित होने से कैसे बचूँ? मैं अपनी पुत्री, जो कि सभी स्त्रियों में रत्न है, स्यमन्तक मणि के साथ ही भगवान को भेंट कर दूँगा। निस्सन्देह उन्हें शान्त करने का यही एकमात्र उचित उपाय है।

43-45 इस तरह बुद्धिमानी के साथ मन को दृढ़ करके राजा सत्राजित ने स्वयं अपनी गौर-वर्ण वाली पुत्री के साथ-साथ स्यमन्तक मणि भी भगवान कृष्ण को भेंट करने की व्यवस्था की। भगवान ने उचित धार्मिक रीति से सत्यभामा के साथ विवाह कर लिया। उत्तम आचरण, सौन्दर्य, उदारता तथा अन्य सद्गुणों से सम्पन्न होने के कारण अनेक लोगों ने उसे लेना चाहा था। भगवान ने सत्राजित से कहा: हे राजन, हमें इस मणि को वापस लेने की इच्छा नहीं है। तुम सूर्यदेव के भक्त हो अतः इसे अपने पास ही रखो। इस प्रकार हम भी इससे लाभ उठा सकेंगे।

(समर्पित एवं सेवारत - जगदीश चन्द्र चौहान)

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Comments

  • 🙏हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
    हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे🙏
  • hare krishna prbhu ji dandwat pranam bahut hi uttkrasht seva aap vishwa ke kalyan ke liye kar rahe hain.apka bahut abhar.
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