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भाषा मनुष्य प्रजाति की उन्नति का सबसे बड़ा माध्यम रही है । विश्व में बोलने-समझने, लिखने-पढ़ने वाली असंख्य भाषाएँ हैं ।  कुछ गणनाओं के अनुसार विश्व में प्रायः लोग स्वयं को व्यक्त करने के लिए लगभग ७००० भाषाओँ का प्रयोग कर रहे हैं । वर्तमान में अकेले भारत में लगभग १७९ भाषाएं एवं ५४४ उपभाषाएँ (बोलियाँ) प्रयोग का प्रयोग हो रहा है । 


इन भाषाओँ के अथाह सागर में देवनागरी या हिंदी भाषा का मानव सभ्यता के प्रसार में बहुत बड़ा योगदान है । यह भाषा विश्व की चौथी सबसे अधिक बोली-समझी जाने वाली भाषा है । आज विश्व की लगभग ८० करोड़ जनसँख्या हिंदी समझती है । 

भारतीय संस्कृति के प्रसार में भी हिंदी भाषा ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है । देवनागरी का एक और अर्थ है देवलोक की भाषा । देवनागरी या हिंदी भाषा के द्वारा भक्ति या भगवान के प्रति मनुष्य की अभिव्यक्ति का बहुत प्रचार प्रसार हुआ । पूर्व में इन भाषाओँ ने ही मनुष्य को एक दूसरे से जोड़ कर रखा था और परस्पर प्रेम और सभ्यता को एक दूसरे के साथ साझा का माध्यम बानी थी । 
इतिहास साक्षी है की भक्ति का प्रचार प्रसार भी इन्ही भाषाओँ के माध्यम से हुआ और आज भी हो रहा है । यह बुद्धिमानी नहीं कहलाएगी अगर हम भाषा को प्रचारित करें और उस भाषा में क्या सामग्री उपलध है उसका उल्लेख न करें। देवनागरी लिपि या हिंदी में वैदिक संरचनाओं का अथाह सागर उपलब्ध है । 
इस कम्प्यूटर-युग में लोग इंटरनेट और मोबाइल को तीव्रता के साथ एक दूसरे से जुड़ने का माध्यम बना रहे हैं और वर्तमान तक अंग्रेजी ही इसका सबसे बड़ा माध्यम रहा है । इसी प्रक्रिया में हम भी हिंदी-भाषी लोगों के समक्ष भगवान से सम्बंधित रचनाएँ, पूर्व-आचार्यों की शिक्षाएं, एक दूसरे के साथ मनोभावनाओं का आदान-प्रदान सहज बनाने के लिए एक नयी वेबसाइट, सम्पूर्ण मानव प्रजाति एवं विशेषतः हिंदी भाषी जान-सामान्य को समर्पित करते हैं ।  
१९७२ में लिखे गए एक पत्र में श्रील प्रभुपाद अपने एक शिष्य आग्रह कर रहे है, "अगर तुम अपने कुछ वाराणसी के मित्रों की सहायता से मेरी सारी पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद करो तो मुझे बहुत प्रसन्नता होगी । वाराणसी हिंदी सीखने के लिए उपयुक्त स्थान है । अगर तुम किसी भी तरह अनुवाद कार्य का प्रभार ले सको तो यह भगवान की महान सेवा होगी।" 
श्री चैतन्य महाप्रभु के अनुसार गाँव-गाँव में लोगों को भगवद-भक्ति एवं प्रेम से अवगत कराना एवं भगवान चरणकमलों की सेवा के प्रति आकर्षित करना ही सर्वोत्तम सेवा है। श्रील प्रभुपाद के अंग्रेजी भाषी लोगों को कृष्ण भक्ति का प्रचार करने के लिए प्रस्थान करने का यह ५०वाँ वर्ष है । उनके अथक प्रयासों से हज़ारों - लाखों लोग लाभान्वित हुए हैं जो अपने आप में अलौकिक है ।कालांतर में हमने यह अनुभव किया कि करोड़ों लोग भाषा के बंधन के कारण इन वचनामृत से वंचित रहे हैं । हमारा यह तुच्छ सा प्रायस श्रील प्रभुपाद एवं सभी साधकों एवं भगवद प्रेमियों को समर्पित है । 
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हरे कृष्ण
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