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श्रील प्रभुपाद ने एक बार नक़ल करके बताया कि जब हमारा जप करने का मन न हो रहा हो तो, कैसे हम ध्यान, एकाग्रता और उचित उच्चारण के बिना जप करते हैं । यह कुछ ऐसा होता है, निश निश, राम राम, निश निश, राम राम । इस से हमारी इस मनःस्थिति का पता चलता है, "मुझे कुछ और करना था परन्तु अभी जप करना है ।" और मन में हम सोच रहे होते हैं की किसी तरह यह जप खत्म हो । हम सभी यह करते हैं और यह बद से बदतर हो सकता है । मैं ऐसे भक्तों को जानता हूँ जो टीवी पर मैच देखते हुए भी जप करते हैं ।

श्रील प्रभुपाद समझाते हैं कि इस तरह का जप लगभग निरर्थक ही है क्योंकि यह वांछित फल, यानि कृष्ण-प्रेम उत्पन्न नहीं कर सकता । यहाँ तक की इसे जप भी नहीं कहा जा सकता । यह मात्र एक औपचारिक अनुष्ठान जैसा ही है । परन्तु श्रील प्रभुपाद कहते हैं कि इसका मूल्य इतना ही है कि वह अपने जप करने के व्रत को पूरा कर रहा है ।

मात्र इसलिए जप करना क्योंकि मैंने अपने गुरु या अपने आप से प्रण लिया है कि मैं प्रतिदिन एक निश्चित संख्या में जप करूँगा - आप अपना प्रण रखते हो और ऊपर बताये गए तरीके से जप करते हो तो इस तरह के जप को मैं एक नाम देता हूँ - "औपचारिक जप"।

"औपचारिक जप" के कुछ उदहारण मैं इधर दे रहा हूँ : 
=> किसी से बातें करते हुए जप करना (पहले आप बोलो तो वह जप करे और जब वह बोले तो आप जप करो )
=> पढ़ते हुए जप करना (वास्तव में इसके लिए दो सर होने चाहिए)
=> कुछ (भजन, कीर्तन या प्रवचन) सुनते हुए जप करना (यह चुनौतीपूर्ण तब होता है जब समाचार या रॉक संगीत सुनते हुए जप किया जाये )
=> खरीदारी करते हुए जप करना । कभी कभी हम जप करते करते टहलने निकल जाते हैं और खरीदारी भी कर आते हैं । 
=> झपकी लेते हुए जप करना (यह किसी लड़ाकू विमान के नीचे आने के समान होता है)
=> कभी कभी दुनियाभर की लाखों चीज़ों को निहारते हुए जप करना । इसे राडार जप भी कहते हैं जिसमे नज़र में आई हर चीज़ का निरिक्षण किया जाता है) 
=> फ़िल्में देखते हुए जप करना (भक्तिमय फिल्मे देखना भी इसी के अंतर्गत आता है)
=> थोड़ा जप, थोड़ी बातें फिर थोड़ा जप, थोड़ी बातें (इसे झींगुर जप भी कहते हैं)
=> ___________________ (यहाँ अन्य तरह के जप आप स्वयं भर लीजिये)
नोट: यह आपके जप को विध्वंस करने के उत्कृष्ट तरीके हैं जो आपकी कृष्ण भक्ति में विकास को रोक सकते हैं ।

आप जप के दौरान अविश्वसनीय उन्नति कर सकते हैं। अच्छा जप खुले हाईवे पर ५वे गियर पर गाडी चलाने के समान है । अच्छा जप प्रेरणा, साक्षात्कार, वैराग्य, सेवा करने की इच्छा में वृद्धि, शास्त्रों का अध्ययन करने के लिए आकर्षण और अधिक स्पष्ट रूप से माया का कार्य देखने की क्षमता पैदा करता है। जप इस से भी कहीं अधिक उपहार प्रदान करता है । और जब हम "औपचारिक जप" करते हैं तो अपने आप को इन उपहारों से वंचित कर लेते हैं ।

हमारा नया प्रण होना चाहिए "औपचारिक जप बंद" । "औपचारिक जप " बन्दूक से नकली गोलियां दागने जैसा है । ट्रिगर खींचा और आवाज़ हुयी परन्तु गोली नहीं निकली । जाहिर है आप एक लड़ाई नकली कारतूस से नहीं जीत सकते। इसी तरह, "औपचारिक जप " हरे कृष्ण महा मंत्र की तरह लगता है, लेकिन यह मात्र एक ध्वनि है, वास्तविक मंत्र की छाया मात्र । निःसंदेह आप छाया मन्त्रों की गोलीबारी से माया के साथ लड़ाई नहीं जीत सकते।

समस्या यह है कि - दार्शनिक और व्यवहारिक दोनों - अगर हम गलत तरीके अपनाते रहेंगे तो परिणाम भी गलत ही पाते रहेंगे । इस से भी बुरा यह है कि "बुरा जप" और बदतर होता जायेगा । यह हमें समझना ही पड़ेगा इसलिए फिर से समझाता हूँ । बुरा जप अधिक समय तक करते रहने के कारण यह हमारे मष्तिष्क में बैठ जायेगा और हमारी आदत बन जायेगा । ऐसा होने पर इस से बाहर निकल पाना और भी कठिन हो जायेगा ।

इस से यह सिद्ध होता है कि अगर आप बहुत वर्षों से जप कर रहे हो तो इसका अर्थ यह नहीं कि आपने भक्ति में भी उन्नति कर ली होगी । अगर आप "औपचारिक जप" नामक इस रोग से पीड़ित हैं तो आपको यह पूछना होगा कि कैसे इस से छुटकारा मिले । यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है क्योंकि अच्छा जप हमारे आध्यात्मिक जीवन के स्तम्भों में से एक है ।

यह सब, हमारे जप करने के प्रति उदासीनता से, लड़ाई है । एक बद्ध जीव की भूमिका में श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि मैं कितना अभागा हूँ, मुझमे हरिनाम के प्रति आसक्ति नहीं है । तो जप करते समय हमारे पास दो विकल्प हैं, एक जैसा चल रहा है वैसा चलता रहे, मन को भटकने दिया जाये। दूसरा, साहस के साथ प्रवाह के विपरीत जाकर मन को हरिनाम पर एकाग्र करके, प्रार्थनामय एवं भक्ति से पूर्ण जप करें । यह आसान नहीं होगा । बहुत प्रयास करना पड़ेगा और "औपचारिक जप" के विपरीत सब करना होगा । आलसियों के लिए थोड़ा कठिन होगा । आखिरकार ध्यान लगाना एक कठिन कार्य तो है ही ।

जप के समय को रोचक बनाया जा सकता है । मैं जब जप करने बैठता हूँ तो दुनिया भर के विचार मन में आते हैं, दिन भर की कार्ययोजनाएं मन में चलती रहती हैं । उसके लिए या तो मन को झटक दो कि यह सब बाद में सोचूंगा नहीं तो जप रोककर एक कागज़ पर उसे लिख लो ताकि वह दोबारा मन में न आए । 
"औपचारिक जप" की आदत से छुटकारा तो पाना ही है । भगवान कृष्ण हमारे हृदय में हैं और वे उतनी सहायता करते हैं जितनी हम मांगते हैं । भगवान कहते हैं कि ज्ञान, स्मरण और विस्मरण मुझसे ही आते हैं । तो "अच्छे जप" या "औपचारिक जप" जैसा आप चाहते हैं वे वैसा ही मार्ग दिखा देंगे। यह सब हमपर निर्भर करता है कि हमें क्या चाहिए । अगर हम सुधार चाहते हैं तो वे हमें बताएँगे कि हम कब जप करें (सुबह ब्रह्मुहूर्त में), कहाँ जप करें (जहाँ हमारा ध्यान न भटके), कैसे जप करें (तुलसी या भगवान के विग्रह या चित्र के सामने, नाकि टीवी या समाचार पत्र-पत्रिका के आगे)।

तो यहाँ सभी के लिए एक अभ्यास है : 
एक कागज़ के ऊपर लिखिए : 
कैसे मुझे अपना जप सुधारना है ?
"औपचारिक जप का अंत"
और फिर एक एक करके अपनी सूची बनाइये ।

आइये इस "औपचारिक जप" का अंत करें जो हमारी कृष्ण भक्ति में प्रगति का महान शत्रु है । 
----साभार: महात्मा दास

प्रेषित: ISKCON Desire Tree - हिंदी 
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