केवल भक्ति से भगवान को यथारूप में जाना जा सकता है । कोई भी भक्त, भगवान से ५ रसों में सम्बन्ध स्थापित कर सकता है।
- निष्क्रिय अवस्था में (शांत रस)
- सक्रिय अवस्था में (दास्य रस)
- सखा (मित्र) के रूप में (साख्य रस)
- अभिभावक के रूप में (वात्सल्य रस)
- प्रेमी के रूप में (माधुर्य रस)
इनमें से किसी एक में स्थित हो कर भक्त भगवान की सेवा करता है|
शान्त रस (तटस्थ अवस्था) का अर्थ है- भगवान कृष्ण के चरणकमलों में पूरी तरह अनुरुक्ति | जब भक्त शान्त रस को प्राप्त होता है, तो वह न तो स्वर्ग जाने की इच्छा करता है न मोक्ष की | ये तो कर्म तथा ज्ञान के फल है और भक्त इन्हें नरक के समान समझता है | शान्त रस को प्राप्त व्यक्ति में दो दिव्य गुण प्रकट होते है – समस्त भोतिक इच्छाओ से विरक्ति तथा कृष्ण के प्रीति पूर्ण अनुरुक्ति | शान्त रस के ये दो गुण सभी भक्तो में पाए जाते है, चाहे वे दास्य रस ,संख्य रस, वात्सल्य रस या माधुर्य रस में क्यों न स्थित हो | शान्त भक्तो के उदाहरण: चार कुमार |
दास्य रस: शान्त रस का स्वभाव है कि उसमे रंच मात्र भी ममता नही रहती | वह भगवान कृष्ण के साथ व्यक्तिगत सम्बन्ध स्थापित नहीं कर पाता | किन्तु जब वह दास्य रस के पद पर उन्नति करता है तब वह कृष्ण के पूर्ण एश्वर्य को अच्छी तरह से समझ पता है | दास्य रस को प्राप्त भक्त भगवान कृष्ण की सेवा करके निरंतर सुख प्राप्त करता है| दास्य भक्तो के उदाहरण: हनुमानजी |
साख्य रस: सख्य रस पद में शान्त रस के गुण तथा दास्य रस की सेवा दोनों ही विधमान रहते है तथा साथ में आदरयुक्त भय के स्थान पर सखा का विश्वास मिला रहता है | सख्य रस के पद पर कभी भक्त भगवान की सेवा करता है तो कभी बदले में कृष्ण से अपनी सेवा करवाता है तथा अपने आप को उन्ही के समान समझते है| सख्य रस के पद पर भगवान अपने भक्तो के बस में रहते है | सख्य भक्तो के उदाहरण: अर्जुन |
वात्सल्य रस: वात्सल्य रस के पद पर शान्त रस, दास्य रस, तथा सख्य रस के गुण पालन नामक सेवा में परिणित होजाते है | वात्सल्य रस में भक्त अपने आपको भगवान का पालक समझता है और भगवान पालन के पात्र रहते हे जैसाकि पुत्र होता है | वात्सल्य रस में चार रसो के गुणों का मेल रहता है अतः यह अधिक दिव्य अमृत है | वात्सल्य भक्तो के उदाहरण: माता यशोदा व पिता नन्द |
माधुर्य रस: माधुर्य रस में कृष्ण के प्रीति निष्ठा, उनकी सेवा, सखा का असंकोच भाव तथा पालन की भावना – इन सबकी घनिष्ठता की वृद्धि हो जाती है | माधुर्य रस में भक्त भगवान को अपना शरीर अर्पित कर देता है | अतः इस रस में पांचो रसो के दिव्य गुण उपस्थित रहते है | इस तरह माधुर्य रस में भक्तो के सारे भाव घुलमिल जाते हे इसका गाढा स्वाद निश्चित रूप से अद्भुत होता है | माधुर्य रस ही सर्वश्रेष्ठ रस है (C.C.Madhya Leela 19.215-234) | माधुर्य भक्तो के उदाहरण: परकीय भाव में वृदावन की गोपियाँ, स्वकीय भाव में द्वारका की पटरानियाँ।

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