Hare Krsna,
Please accept my humble obeisances. All glories to Srila Prabhupada & Srila Gopal Krishna Maharaj.
श्रीमद् भागवतम (3.28.12-36) में भगवान कपिल ने अपनी माता देवहुति को भक्ति-योग का वर्णन करते समय भक्ति साधना के लिए भगवान के स्वरुप पर ध्यान लगाने की विधि का वर्णन इस प्रकार किया:
भगवान कपिल कहते हैं: मनुष्य को चाहिए कि अधखुली आँखों से नाक के अग्रभाग में ध्यान को केन्द्रित करके भगवान के स्वरुप को इस प्रकार देखे | भगवान का मुख उत्फुल्ल कमल के समान है और लाल लाल ऑंखें कमल के कोश के समान है | उनका श्यामल शरीर नील कमल की पंखड़ियों के समान है | वे अपने तीन हाथों में शंख,चक्र तथा गदा धारण किये हैं |
उनकी कटि रेशमी पीले केसरिया वस्त्र से आवरित है | उनके वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिन्ह है | उनके गले में चमचमाती कौस्तुभ मणि लटक रही है | वे अपने गले में वनपुष्पों की आकर्षक माला धारण करते हैं जिसकी सुगन्धि से मतवाले भौरों के झुण्ड चारों ओर गुंजार करते हैं | वे अमूल्य मोती के हार, कंकण, बाजूबंद, तथा नूपुर से सुसज्जित हैं | उनकी कमर तथा कूल्हे पर करधनी पड़ी है | वे देखने में अत्यन्त मोहक हैं | उनका शान्त स्वरुप देखने वाले भक्तों के नेत्रों तथा आत्मा को आनन्दित करने वाला है |
भगवान शाश्वत रूप से अत्यन्त सुन्दर चिर युवा रहते हैं तथा अपने भक्तों को आशीष देने के लिए उत्सुक रहते हैं | मनुष्य को भगवान के शाश्वत रूप का ध्यान करना चाहिए तथा भगवान के नित्य रूप में अपना मन स्थिर करते समय भक्त को चाहिए कि भगवान के एक-एक अंग पर मन को स्थिर करे |
भक्त को चाहिए कि सर्वप्रथम वह अपना मन भगवान के चरण-कमलों में केन्द्रित करे जो वज्र, अंकुश, ध्वजा तथा कमल चिन्हों से सुशोभित रहते हैं | उनके चमकीले नाखूनों की शोभा चन्द्रमंडल से मिलती-जुलती हैं जो हृदय के घने अँधेरे को दूर करती है | पूज्य शिवजी, भगवान के चरणकमलों के प्रक्षालित जल से उत्पन्न गंगा नदी को अपने शिर पर धारण करके और भी पूज्य हो जाते हैं | मनुष्य को दीर्घ काल तक भगवान के चरणकमलों का ध्यान करना चाहिए |
भक्तों को चाहिए कि वह सभी देवताओं द्वारा पूजित तथा सर्वोपरि जीव ब्रह्मा की माता ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी के कार्यकलापों में अपने हृदय को स्थिर कर दे जो सदैव भगवान के पाँवों तथा जंघाओं की सेवा करते हुए देखी जा सकती हैं | भगवान की जंघाएँ अलसी के फूलों की कान्ति के समान सफ़ेद-नीली हैं जो समस्त शक्ति की अगार हैं | भगवान के गोलाकार नितम्बों का ध्यान करें जो करघनी से घिरे हैं और यह करघनी एडी तक लटकते पीताम्बर पर टिकी हुए है |
तब भक्त को चाहिए कि वह भगवान के उदर के मध्य में स्थित चन्द्रमा जैसी नाभि का ध्यान करें | जहाँ से समस्त लोकों से युक्त कमलनाल प्रकट हुआ जो आदि जीव ब्रह्मा का वासस्थान है | इसी तरह मन को भगवान के स्तनाग्रों पर केन्द्रित करें जो श्रेष्ठ मरकत मणि की जोड़ी के सद्रश्य है | फिर भक्त को भगवान के वक्षस्थल का ध्यान करना चाहिए जो देवी महालक्ष्मी का आवास है | तब अपने मन में सम्पूर्ण विश्व द्वारा पूजित भगवान की गर्दन का ध्यान धारण करना चाहिए जो उनके वक्षस्थल पर लटकने वाली कौस्तुभ मणि की सुन्दरता को बढाने वाली है |
इसके बाद भगवान की चारों भुजाओं का ध्यान करना चाहिए जो देवताओं की समस्त शक्तियों के स्रोत हैं | उसे चाहिए की भगवान के चक्र का भी ठीक से चिन्तन करें जो एक हजार आरों से तथा असह्य तेज से युक्त हैं | साथ ही शंख का ध्यान करे जो उनकी कमल सद्रश्य हथेली में हँस सा प्रतीत होता है | वह प्रभु की कौमोदकी गदा का ध्यान करे जो उन्हें अत्यन्त प्रिय है | यह गदा असुरों के रक्त से सनी है| भगवान की मोती की माला का भी ध्यान करना चाहिए जो उन शुद्ध आत्माओं की सूचक है जो भगवान की सेवा में लगे रहतें हैं |
तब भक्तों के लिए अनुकम्पावश इस जगत में विभिन्न रूप धारण करने वाला भगवान के कमल सद्रश्य मुखमंडल का ध्यान करना चाहिए | उनकी नाक उन्नत है तथा उनके गाल उनके मकराकृत कुण्डलों के हिलने से प्रकाशमान हो रहे हैं | भगवान का सुन्दर मुखमंडल घुंघराले बालों, कमल जैसे नेत्रों तथा नाचती भौहों से सुशोभित है जिसकी छटा के आगे भौरों से घिरा कमल तथा तैरती मछलियों की जोड़ी मात खा जाती है |
भक्त को चाहिए कि भगवान के नेत्रों की कृपापूर्ण चितवन का ध्यान पूर्ण समर्पण से करे, क्योंकि उससे अत्यन्त भयावह तीन प्रकार के कष्टों का शमन होता है | प्रेमभरी मुस्कान से युक्त उनकी चितवन प्रचुर दया से पूर्ण है जो घोर शोक से उत्पन्न भक्तों के अश्रुओं के समुद्र को सुखाने वाली है | भक्त को चाहिए भक्तिपूर्वक अपने अन्तरतम में भगवान विष्णु के अट्टहास का ध्यान करे | भगवान के हँसते समय उनके छोटे छोटे दांत चमेली की कलियों जैसे दिखते हैं और उनके होठों की कान्ति के कारण गुलाबी प्रतीत होते हैं |
एक बार अपना मन भगवान के ऐसे स्वरुप में स्थिर करके भक्त को कुछ और देखने की कामना नही करनी चाहिए | इस मार्ग का अनुसरण करते हुए धीरे धीरे भगवान हरि के प्रति प्रेम उत्पन्न हो जाता है | इस प्रकार भक्ति करते हुए, भक्त का मन भौतिक कर्म से विमुख तथा भौतिक कल्मष से रहित हो जाता है | उस समय उसका मन दीपक की लौं के सामान उच्चतम दिव्य अवस्था में स्थित अपनी महिमा में वस्तुतः परमेश्वर जैसा हो जाता है |
हरे कृष्णा
दण्डवत
आपका विनीत सेवक
Comments