Hare Krsna,
Please accept my humble obeisances. All glories to Srila Prabhupada & Srila Gopal Krishna Maharaj.
भगवान ने सर्वप्रथम ब्रह्मा जी को श्रीमद् भागवतम का सार; भगवान से हमारा सम्बन्ध, उस सम्बन्ध में हमारे कार्य तथा जीवन का लक्ष्य, इन 4 श्लोक में (चतु:श्लोकी) प्रदान किया |
भगवान कहते हैं: हे ब्रह्मा! वह मैं ही हूँ जो श्रृष्टि के पूर्व विद्धमान था, जब मेरे अतिरिक्त कुछ भी नहीं था तब इस श्रृष्टि की कारण स्वरूपा भौतिक प्रकृति भी नहीं थी | जिसे तुम अब देख रहे हो वह भी मैं ही हूँ, और प्रलय के बाद भी जो शेष रहेगा वह भी मैं ही हूँ (SB.2.9.33) |
हे ब्रह्मा! जो भी सारयुक्त प्रतीत होता है, यदि वह मुझसे सम्बंधित नहीं है तो उसमें कोई वास्तविकता नहीं है | इसे मेरी माया जानो, इसे ऐसा प्रतिबिम्ब मानो जो अंधकार में प्रकट होता है (SB. 2.9.34) |
हे ब्रह्मा! तुम यह जान लो कि ब्रह्माण्ड के सारे तत्व विश्व में प्रवेश करते हुए भी प्रवेश नहीं करते हैं | उसी प्रकार मैं उत्पन्न की गयी प्रत्येक वस्तु में स्थित रहते हुए भी साथ ही साथ प्रत्येक वस्तु से पृथक रहता हूँ (SB.2.9.35) |
हे ब्रह्मा! जो व्यक्ति परम सत्य रूप श्री भगवान की खोज में लगा हो, उसे चाहिये कि वह समस्त परिस्थतियों में सर्वत्र और सर्वदा प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष दोनों ही प्रकार से इसकी खोज करे (SB.2.9.36) |
श्रीमद् भगवद् गीता में ईश्वर, जीव, प्रकृति, काल तथा कर्म की व्याख्या हुई है | श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया गीता का सार इन 4 श्लोक में है (चतु:श्लोकी गीता):
कृष्ण कहते हैं: मै समस्त आध्यात्मिक तथा भौतिक जगतो का उदगम हूँ, मुझ से ही प्रत्येक वस्तु उत्पन्न होती है | जो बुद्धिमान यह भलीभांति जानते हैं, वे मेरी प्रेमाभक्ति में अत्यन्त मनोयोग से लग जाते हैं (BG.10.8)|
मेरे शुद्ध भक्तों के विचार मुझमें वास करते हैं | उनके जीवन मेरी सेवा में अर्पित रहते हैं और वे एक दूसरे को ज्ञान प्रदान करते तथा मेरे विषय में बात करते हुए परम संतोष तथा आनंद का अनुभव करते हैं (BG.10.9)|
जो लोग प्रेमपूर्वक मेरी सेवा (भक्ति) करने में निरंतर लगे रहते हैं, उन्हें मै ज्ञान प्रदान करता हूँ जिससे द्वारा वे अंत में मेरे पास आ सकते हैं (BG.10.10)|
मै उनपर विशेष कृपा करने के हेतु उनके हृदयों में वास करते हुए ज्ञान के प्रकाशमान दीपक के द्वारा अज्ञानजन्य अंधकार को दूर करता हूँ (BG.10.11)|
हरे कृष्णा
दण्डवत
आपका विनीत सेवक
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