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आ अब लौट चलें

Hare Krsna,

Please accept my humble obeisances. All glories to Srila Prabhupada & Srila Gopal Krishna Maharaj.

पुराने समय में, आपमें से कुछ लोगों ने महान अभिनेता राजकपूर की एक मूवी “जिस देश में गंगा बहती है” देखी होगी | यह मूवी चम्बल के बीहड़ों में डाकुओं के जीवन पर आधारित थी | इस मूवी का नायक जो एक सीधा सादा ईमानदार व्यक्ति होता है, इन डाकुओं को समाज की मुख्य धारा में लौटाने की कोशिश करता रहता है और अन्त में सफल भी हो जाता है | उस मूवी का एक गीत “आ अब लौट चलें” भी शायद सुना होगा | यह कहानी और इस लेख का शीर्षक “आ अब लौट चलें” भी इसी दिशा में एक कोशिश है | यह बताती है कि हम सब बद्धजीव भी इस भौतिक जगत में भटक गए है तथा अपनी लालसाओं (तृष्णाओं) को पूरा करने के चक्कर में अपने घर का रास्ता भूल गए है | हम यह भूल गए है कि यह हमारा घर नहीं है | हमारा वास्तविक घर तो भगवत-धाम है तथा भगवान ही हमारे वास्तविक पिता, मित्र तथा सभी सम्बन्धों के केंद्र हैं तथा इस मूवी के नायक की तरह हमें, हमारी वास्तविक स्थिति को समझाने में हमारी मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं |

पुराने समय की बात है, इस पृथ्वी पर एक दयालु राजा का शासन था | कोई भी उस राजा के पास अपनी समस्या ले कर समाधान के लिए जा सकता था | एक निर्धन लेकिन लालची व्यक्ति ने राजा के दरबार में जा कर गुहार की | राजा ने पूँछा कि उसे क्या चाहिए? उस व्यक्ति ने कुछ जमीन देने की प्रार्थना की ताकि उसके सहारे वह अपना और अपने परिवार का गुजर बसर कर सके | राजा ने उसे अगले दिन सुबह, एक निश्चित स्थान पर बुलाया | अगले दिन सूरज निकलने पर निश्चित स्थान पर राजा ने उसे एक झंडा दिया और कहा कि वह जहाँ तक भी जा सकता है जाए और इस झंडे को गाड़ दे, वहाँ तक की सारी जमीन का मालिक वह हो जाएगा | यह सुन कर उसे विश्वास ही नहीं हुआ लेकिन राजा ने उसे विश्वास दिलाया और कहा यह सच है, लेकिन एक शर्त है कि इस सारी जमीन का मालिक बनने के लिए उसे सूरज अस्त होने से पहले यहीं पर अर्थात जहाँ से उसने शुरू किया है, वापस आना होगा |

उस व्यक्ति को यह सुन कर बड़ी खुशी हुई | राजा का धन्यवाद कर उसने पूरे उत्साह के साथ झंडे को लेकर दौड़ना शुरू किया | अब वह दौड़ रहा था और बस दौड़ रहा था | वह अधिक से अधिक जमीन का मालिक बनना चाहता था इसलिए उसने प्यास, भूख, थकान की कोई परवाह नहीं की | आखिर सूरज सिर के ऊपर आ गया लेकिन लालच ने उसकी बुद्धि को ढक लिया | थोडा और, थोडा और करते हुए वह दौड़ता चला गया, फिर शाम होनी लगी | उसे कुछ चिंता हुई, उसने झंडे को वहाँ गाड़ दिया और यू टर्न ले कर वापस दौड़ने लगा | अब वह अपनी पूरी ताक़त से दौड़ने लगा लेकिन भूख, प्यास की वजह से धीरे धीरे उसकी हिम्मत जबाब देने लगी | उधर सूरज तेजी से अस्ताचल की तरफ़ बढ रहा था | उस व्यक्ति ने अपनी पूरी ताकत झौंक दी | उसका स्वांस जबाब देने लगा, मुख से झाग आने लगा लेकिन मंजिल अभी दूर थी | आखिर उसकी बची खुची ताक़त भी जबाब दे गई और वह जमीन पर गिर पड़ा और उसने वहीँ दम तोड़ दिया | राजा अपने घोड़े पर वहाँ आया और अपने आदमियों को कहा कि 6’x3’ जमीन ही इस व्यक्ति के लिए काफी है | इतनी जमीन का एक गड्ढा खोद कर इस व्यक्ति को यहीं दफना दो |

तो पढा आपने इस कहानी को, जो आज के व्यक्ति पर पूरी तरह से लागू होती है | राजा रूपी भगवान ने हमें अर्थात अपने बच्चों को हमारी खुशी के लिए इस खूबसूरत प्रकृति का उपभोग करने के लिए दिया | लेकिन हम इसे अपनी जागीर समझना चाहते हैं और जिन्दगी भर थोडा और थोडा और कर अपनी मिलकियत को बढ़ाने में लगे रहते हैं | भगवान जो हमारे हृदय में हमारे मित्र के रूप में विराजमान है, इन्तजार करते रहते हैं कि कब यह व्यक्ति मुड़ेगा, मुझे पहचानेगा और अपने मूल घर(भगवत-धाम) की तरफ जाने की वापस यात्रा शुरू करेगा | मृत्यु दूर नहीं है, इस बात के उसे इशारे भी भेजते हैं | उसके शरीर पर झुर्रियाँ पड़ने लगती हैं, दांत गिरने लगते है और बाल सफ़ेद होने लगते हैं | उसके सामने ही उसके रिश्तेदारों की मृत्यु होती रहती है, लेकिन प्रकृति पर स्वामित्व ज़माने की उसकी इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता और बुद्धि होते हुए भी अन्तहीन इच्छाओं के साथ ही, वह भी दम तोड़ देता है | यह सब जो भी धन, संपत्ति आदि उसने इकट्ठी की थी, यहीं रह जाती है | व्यक्ति का सूक्ष्म शरीर अपनी अतृप्त इच्छाओं को साथ ले कर एक नयी जीवन यात्रा शुरू कर देता है | भगवान जो उसके चिर सखा है उस नए शरीर के हृदय में भी विराजमान रह कर उसके वापस अपने घर आने में उसकी मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं |

हम सब के लिए भी, अभी भी देर नही हुई है | कृपया अपनी स्वाभाविक स्थिति को पहचानिए व भगवान से अपने सम्बन्ध को जानिये | इसे समझने के लिए भगवान ने हमें श्रीमद् भागवतम, श्रीमद् भगवद् गीता जैसे दिव्य ग्रन्थ दिए हैं | वह समय समय पर हम पर विशेष कृपा बरसाने, स्वयं भी इस धरा पर अवतरित होते हैं तथा विशेष शक्ति प्राप्त अपने विशेष पार्षद (जैसे भक्तिवेदांत प्रभुपाद स्वामी) इस प्रथ्वी पर भेजते हैं | भक्तिवेदांत प्रभुपाद स्वामी हमें जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य भगवत-प्रेम प्राप्त करने तथा भगवद्-धाम वापस जाने के लिए रास्ता दिखाते हैं | इस बारे में हमारे मार्ग निर्देशन के लिए उन्होंने श्रीमद् भागवतम व श्रीमद् भगवद् गीता के दिव्य ज्ञान पर आधारित आसानी से समझ आने वाली भाषा में बहुत सी किताबों की भी रचना की है | यह मानव शरीर जो अतिदुर्लभ व अमूल्य है, का अविलम्ब लाभ उठाइये तथा श्री गुरु महाराज के चरण-कमलों में समर्पण कर, भक्ति के माध्यम से भगवद्-धाम की अपनी वापसी यात्रा शुरू कर दीजिये |

हरे कृष्णा

दण्डवत

आपका विनीत सेवक

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Comments

  • Hare Krishna Giriraj Prabhuji, dandavat

    PAMHO, AGTSP

    I am obliged for your kind attention & nice comments. It is however fact that it is not original. I simply reproduced and rearranged information already available.

    Your servant

  • Hare Krishna Prabuji,

    PAMHO, AGTSP.

    This is a very good analogy and you have connected the moral of the story with the title of the blog very creatively. Thank you for writing so well and that too consistently.

    Your insignificant servant,

    Giriraj Das

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