षड-भक्ति

Hare Krsna,

Please accept my humble obeisance. All glories to Srila Prabhupada & Srila Gopal Krishna Maharaj.

षड-भक्ति:

प्रहलाद महाराज ने अपने पिता दैत्य-राज हिरन्यकशिपू के पूछने पर सर्वश्रेष्ठ  शिक्षा के रूप में नवधा भक्ति का वर्णन किया था | प्रह्लाद महाराज अपने पिता के भगवान द्वारा मारे जाने पर भगवान नरसिंह की प्रार्थना करते हुए भक्ति की श्रेष्ठता का वर्णन करते हुए कहते हैं: “न तो भौतिक प्रकृति के तीन गुण, न इन तीन गुणों के नियामक अधिष्ठाता देव, न पांच स्थूल तत्व, न देवता, न मनुष्य ही आपको समझ सकते हैं क्योंकि ये सभी जन्म- मृत्यु के वशीभूत रहते हैं ऐसा विचार करके बुद्धिमान व्यक्ति वैदिक अध्ययन की परवाह नही करते, अपितु वे आपकी भक्ति में अपने आप को लगाते हैं” | इसलिए प्रह्लाद महाराज प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि परमहँस पद या जीवन का आनन्द धन प्राप्त करने के लिए जिसमे भगवत-प्रेम ही एकमात्र मंजिल है, हमें षड-भक्ति का आश्रय लेना चाहिए (SB.7.9.49 & 50) अर्थात :

1. प्रार्थना करना- भगवान से अहैतुकी भक्ति के लिए सुन्दर-सुन्दर प्रार्थनाएँ करना,  

2. समस्त कर्म फलों को भगवान को समर्पित करना,

3. भगवान (साकार रूप) की पूजा करना,

4. भगवान के निमित्त सारे कर्म करना,  

5. भगवान के यश व लीलाओं का हमेशा कीर्तन करना तथा  

6. भगवान की शरणागति या उनके चरण-कमलों का सदा स्मरण करना जो मनुष्य के लिए इस भव-सागर को पार करने के लिए नाव समान है |

चैतन्य चरितामृत मध्य लीला (22.100) के अनुसार शरणागति के 6 विभाग है :

1. भगवान की सेवा के अनुकूल हर बात को स्वीकार करना,

2. भगवान की सेवा के प्रतिकूल बातों का बहिष्कार करना,

3. कृष्ण द्वारा संरक्षण पर पूर्ण विश्वास होना,

4. भगवान को संरक्षक या स्वामी के रूप में स्वीकार करना,

5. पूर्ण आत्मसमर्पण तथा

6. दीनता  |

हरे कृष्णा

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