Hare Krsna,
Please accept my humble obeisances. All glories to Srila Prabhupada & Srila Gopal Krishna Maharaj.
क्या हम खाली हाथ आये थे ? क्या हम खाली हाथ जायेंगे?
मैंने और शायद आपने भी प्रचलित गीता सार में पढ होगा कि हम खाली हाथ आये थे और खाली हाथ चले जाएगें | ऐसा बताते हैं कि अलेक्सेन्दर द ग्रेट ने मरने से पहले अपनी इच्छा बताई थी, कि जब उसका जनाजा निकले तो उसके दोनों हाथ बाहर निकले रहे ताकि जनता देख सके की वह खाली हाथ जा रहा है | लेकिन क्या हम खाली हाथ आते हैं और खाली हाथ जाते हैं?
जब बीज बोया जाता है तो तुरंत वृक्ष तैयार नहीं हो जाता, उसमें समय लगता है | पहले एक छोटा सा अंकुर रहता है, फिर यह धीरे धीरे वृक्ष का रूप धारण करता है | तब उसमें फूल लगते हैं फिर फल लगते हैं और तब बीज बोने वाला व्यक्ति फल तथा फूल का उपभोग कर सकता है | इसी प्रकार जब कोई मनुष्य इन्द्रियतृप्ति के लिए पाप कर्म करता है तो बीज की भांति इसके भी फल मिलने में समय लगता है | भले ही व्यक्ति में पाप-कर्मों का उदय होना बंद हो चुका हो, किन्तु किये गए कर्मों का फल तब भी मिलता रहता है | कुछ पाप बीज रूप में बचे रहते हैं | चाहे इस जीवन में या अगले जीवन में, हम अपने कर्मो के फल से बच नहीं सकते | उदाहरण के लिए, अनाज स्टोरेज के लिए एक लोहे की टंकी प्रयोग की जाती है, जिसमे उपर से इस वर्ष की फसल से प्राप्त अनाज डाला जाता है तथा धरातल के लेवल पर एक छोटा सा दरवाजा लगाया जाता है जिसमे से अभी इस्तेमाल करने के लिए अनाज निकाला जाता है जो पिछली फसलों से प्राप्त किया गया था | इस जीवन में अपने धार्मिक या अधार्मिक कार्यों की मात्रा के अनुपात में मनुष्य अपने अगले जीवन(योनी) में फलों का भोग करता है या कष्ट उठाता है (SB.6.1.45) |
श्रीमद् भागवतम (3.31.44) के अनुसार “सकाम कर्मो के अनुसार जीवात्मा को मन तथा इन्द्रियों से युक्त उपयुक्त शरीर मिलता है | जब किसी कर्म का फल भोग लिया जाता है तो इस अंत को मृत्यु कहते हैं और जब कोई फल प्रारंभ होता है तो इस शुभारम्भ को जन्म कहते हैं” | जीव स्थूल शरीर में कर्म करता है | इस शरीर की मृत्यु होने पर केवल हमारे स्थूल शरीर का अंत होता है | सूक्ष्म शरीर का नहीं, जो हमारी आत्मा को एक ऐसे स्थूल शरीर में ले जाता है जो हमारी अतृप्त इच्छाओ तथा पूर्व-कर्मो के अनुरूप होता है | जब कोई मनुष्य इन्द्रिय तृप्ति के लिए कर्म करता है तो बीज की भांति इसके भी फल मिलने में समय लगता है | कुछ कर्मफल बीज रूप में बचे रहते हैं | प्रारब्ध उन फलों का ध्योतक है जिन्हें हम अपने जन्म के समय अपने साथ लाते है तथा वर्तमान जीवन में भोगते रहते हैं | बचे हए बीज अतृप्त इच्छाओं के रूप में एक नए शरीर के निर्माण का कारण बनते हैं |
चाहे इस जीवन में या अगले जीवन में, हम अपने कर्मो के फल से बच नहीं सकते | श्रीमद् भागवतम (4.29.58 & 60) में नारदजी राजा बहिर्ष्मान को समझाते हुए कहते हैं: “इस जीवन में जीव जो कुछ भी करता है, उसका फल वह अगले जीवन में भोगता है | यह स्थूल शरीर मन, बुद्धि तथा अहंकार से निर्मित सूक्ष्म शरीर द्वारा कार्य करने के लिए बाध्य किया जाता है | इस स्थूल शरीर के विनिष्ट होने पर भी सूक्ष्म शरीर फल भोगने या कष्ट उठाने के लिए बना रहता है | सूक्ष्म शरीर की किर्याओं से जीव स्थूल शरीरों को विकसित करता और त्यागता रहता है, यह आत्मा का देहान्तरण कहलाता है” (SB.4.29.75) | जिस तरह रास्ते पर चलते हुए मनुष्य अपना एक पांव जमीन पर टेकता है और फिर दूसरे पांव को उठाता है या जिस तरह तिनके पर बैठा कीड़ा पहले दूसरी पत्ती पर जा कर फिर पिछली पत्ती को छोड़ता है उसी तरह जीव जब दूसरे शरीर का आश्रय ग्रहण करता है तब पिछले शरीर को त्याग देता है (SB.10.1.40) | हम नए कर्म करते समय कर्म-फल के नए बीज बोते रहते हैं, जिन्हें हमारा मन अपने साथ ले कर अन्तहीन यात्रा करता रहता हैं | इस प्रकार हम अपने कर्म-फलों के साथ इस भौतिक जगत में अन्तहीन जीवन यात्रा करते रहतें हैं | न तो हम कोरी स्लेट के समान खाली हाथ आते हैं और न ही खाली हाथ जाते हैं |
हरे कृष्णा
दण्डवत
आपका विनीत सेवक
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