Hare Krsna,

Please accept my humble obeisance. All glories to Srila Prabhupada & Srila Gopal Krishna Maharaj.

शुद्ध भक्त की संगति की महानता- मृगारि शिकारी की कथा

श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्रील सनातन गोस्वामी को (CC.मध्य लीला भाग 5 अध्याय 24) आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ सुनाते समय एक शिकारी जिसका नाम मृगारि था, की कथा सुनाई कि किस तरह वह नारद मुनि जैसे महापुरुष की संगति से महान भक्त बना |   यही कथा हमारे गुरु महाराज परम पूज्य श्री गोपाल कृष्ण गोस्वामी ने 31 दिसम्बर,2013 की संध्या को नव वर्ष के स्वागत के आयोजन में, इस्कान पंजाबीबाग मंदिर के प्रांगन में सुनाई थी| इस कथा से शुद्ध भक्त की संगति की महानता को समझा जा सकता है |

एक बार महान सन्त नारद मुनि भगवान नारायण से वैकुण्ठ में भेंट करने के बाद संगम स्नान करने प्रयाग गये | जंगल से जाते हुए नारद मुनि ने रास्ते में एक हिरन पड़ा देखा, जो एक तीर से बिंधा हुआ था, उसके पांव टूट चुके थे तथा वह तीव्र पीड़ा के कारण तड़प रहा था | कुछ ही दूरी पर नारद मुनि ने इसी हालत में एक तीर से बिंधा एक सुअर देखा | जब वे आगे बढें तो उन्होंने एक खरगोश को इसी तरह तड़पते देखा | नारद मुनि इन जीवों को इस तरह कष्ट भोगते देख कर हृदय में अत्याधिक दुखी हुए |  

जब नारद मुनि और आगे बढें, तो उन्होंने एक वृक्ष के पीछे अपने हाथों में धनुष-बाण लिए एक काले शरीर वाले शिकारी को देखा जो अन्य पशुओं को मारने के लिए तैयार था | जब नारद मुनि जंगल का मार्ग छोड़ कर उस शिकारी के पास गए, तो अन्य पशु तुरंत वहाँ से भाग गए | शिकारी बोला “आपने मेरे पास आने के लिए जंगल से होकर जाने वाले सामान्य मार्ग को क्यों छोड़ा? आपको देखते ही मेरे शिकार के सारे पशु भाग गए | नारद मुनि ने उत्तर दिया “मार्ग छोड़ कर मैं तुम्हारे पास अपने एक सन्देह दूर करने आया हूँ | तुमने इन पशुओं को पूरी तरह से क्यों कही मारा, उन्हें अधमरा क्यों रखा है”?  शिकारी बोला, “हे साधू, मेरा नाम मृगारि अर्थात पशुओं का शत्रु है,मेरे पिता ने इन्हें इसी प्रकार मारे जाने की शिक्षा मुझे दी है | जब मैं अधमरे पशुओं को तड़पते देखता हूँ तो मुझे बड़ा आनन्द होता है”|

तब नारद मुनि ने शिकारी से कहा, “मुझे तुमसे एक वस्तु माँगनी हैं” | शिकारी ने उत्तर दिया “आप जो भी पशु या मृगछाला चाहिए , उसे ले सकते हैं” | नारद मुनि ने कहा “मैं कोई छाल नहीं चाहता | मैं तुमसे दान में केवल एक वस्तु मांगना चाहता हूँ, आज से तुम पशुओं को पूरी तरह मारोगे, अधमरा नही छोड़ोगे” | शिकारी ने उत्तर दिया “आप मुझ से यह क्या माँग रहें हैं?  इन अधमरे पशुओं में क्या बुराई हैं? क्या आप मुझे बतला सकेंगे?  नारद मुनि ने उत्तर दिया  “हे शिकारी, तुम्हारा कार्य पशुओं का वध करना है | यह तो अल्प अपराध हैं किन्तु जब तुम जानबूझ कर उन्हें अधमरा छोड़ कर व्यर्थ तड़पाते हो, तो तुम बहुत भारी पाप करते हों”| नारद मुनि ने कहा “ये सब पशु एक एक करके अगले जन्मों में तुम्हें मारते रहेंगे” | इस तरह नारद मुनि की संगति से वह शिकारी अपने पापकृत्यों को थोडा-बहुत स्वीकार कर कुछ भयभीत हो उठा | शिकारी ने कहा, “मुझे बचपन से ही इस पेशे की शिक्षा दी गई है | हे मुनि, कृपया मुझे बताये कि मै अपने पापी जीवन के कर्मफलों से किस प्रकार छुटकारा पा सकता हूँ | अब मैं पूरी तरह से आपकी शरण में हूँ, कृपया मेरे पापकर्मों के फलों से मेरा उद्धार करें | आप जो भी कहेंगे, वही मैं करूँगा |

नारद मुनि ने उसे तुरंत आदेश दिया, पहले तुम अपना धनुष तोड़ डालो | शिकारी ने पूछा, तो फिर मैं अपना भरण-पोषण  कैसे करूँगा? नारद मुनि ने उसे प्रतिदिन भोजन मिलने का आश्वासन दिया | इस प्रकार आश्वस्त होने पर उसने अपना धनुष तोड़ दिया और नारद मुनि के चरणों पर गिर कर पूर्ण समर्पण कर दिया | नारद मुनि ने शिकारी को आध्यात्मिक उन्नति का उपदेश दिया और कहा कि तुम घर लौट जाओ, और जितना धन है उसे शुद्ध ब्राह्मणों में बाँट दो | ऐसा करने के बाद तुम तथा तुम्हारी पत्नी दोनों ही पहनने के लिए एक एक वस्त्र लेकर घर छोड़ कर नदी किनारे जाओ | वहाँ तुम एक छोटी सी कुटिया बनाओ और कुटिया के सामने एक चबूतरे में तुलसी का एक पौधा लगाओ | नित्य प्रति तुलसी को जल दे कर उसकी सेवा करना, उसकी परिक्रमा करना और निरन्तर हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करना | तत्पश्चात, वे तीनो अधमरे पशु नारद जी द्वारा जीवत कर दिए गए तथा उठ कर तेजी से जंगल में भाग गए | शिकारी यह देख कर आश्चर्य चकित रह गया तब वह नारद मुनि को नमस्कार कर अपने घर लौट गया और नारदजी के उपदेशों का अक्षरशः पालन करने लगा | यह समाचार सारे गाँव में फ़ैल गया कि शिकारी वैष्णव बन गया है, और सब कुछ छोड़ कर नदी किनारे रहने लगा है | सारे  ग्रामवासी भिक्षा लाकर उसे देने लगें | एक दिन में 10-20 लोगों के लिए पर्याप्त भोजन आता, लेकिन शिकारी तथा उसकी पत्नी एक दिन का खाना ही स्वीकार करते |

एक दिन नारद मुनि अपने मित्र पर्वत मुनि के साथ अपने शिकारी शिष्य को देखने आये | शिकारी ने दूर से ही उन्हें आते देखा | वह शिकारी बड़ी तेजी से अपने गुरु की और दौड़ पड़ा लेकिन प्रथ्वी पर गिर कर उन्हें प्रणाम नही कर सका, क्योंकि वहाँ चीटियाँ इधर-उधर दौड़ रहीं थी | शिकारी ने एक वस्त्र से चीटियों को हटाया और फिर वह नमस्कार करने के किये दंडवत गिर पड़ा | नारद मुनि बोले, हे शिकारी ऐसा आचरण तनिक भी आश्चर्यजनक नहीं है | भक्ति में मनुष्य स्वतः अहिंसक बन जाता है, भगवद्भक्ति में लगे व्यक्ति कभी भी अन्यों को ईर्ष्यावश पीड़ा नही पहुँचाते | तब उस शिकारी ने दोनों ऋषियों का अपने आंगन में स्वागत किया | जल ला कर उसने बड़ी भक्ति से ऋषियों का पाद-प्रक्षालन किया | तब पति-पत्नी दोनों ने ही उस जल को पिया और अपने सिरों पर छिड़का | जब शिकारी ने अपने गुरु के समक्ष हरे कृष्ण महामन्त्र का भावमय प्रेम के साथ कीर्तन किया, तब उसके भावमय प्रेम के लक्षणों को देख कर पर्वत मुनि नारद से बोले कि आप निश्चय ही स्पर्शमणि हो | आपकी कृपा से ही शिकारी जैसा निम्न-जन्मा व्यक्ति भी तुरंत कृष्ण के प्रति अनुरुक्त हो सकता है | तब नारद मुनि ने उससे जीवन निर्वाह के बारे में पूंछा तो पूर्व शिकारी ने कहा, हे मुनि कृपया इतना अन्न मत भेजें | केवल उतना ही भेजें जितना एक दिन के लिए हम दोनों के लिए पर्याप्त हो | नारद मुनि ने इस के प्रति सहमती व्यक्त की और उसे आशीर्वाद देते हुए पर्वत मुनि के साथ वहाँ से अंतर्ध्यान हो गए |

हरे कृष्णा

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