Hare Krsna,

Please accept my humble obeisance. All glories to Srila Prabhupada & Srila Gopal Krishna Maharaj.

मेरी पहली आध्यात्मिक यात्रा:

मई,14 में मैने श्री जगन्नाथ धाम की अपनी छठी यात्रा संपन्न की | हालाँकि, इसे मैं अपनी पहली आध्यात्मिक यात्रा मानता हूँ | इस यात्रा में मैने पहली बार श्री चैतन्य महाप्रभु से सम्बंधित स्थान देख कर वहाँ की मिटटी से अपने आप को पवित्र किया | इस यात्रा में, मैं श्री चैतन्य गौडीय मठ में तीन दिन ठहरा | इस मठ में श्री जगन्नाथ,बलदेव सुभद्रा जी के साथ श्री राधा नयन मणि के विग्रह की पूजा की जाती हैं | उसी मठ में, श्री वसंत प्रभुजी मिले और उन्होंने ही हमें सभी सम्बंधित पवित्र स्थानों के दर्शन कराये तथा इन स्थानों के बारे में विस्तार से बताया |

पहले दिन सुबह श्री जगन्नाथजी, बलदेवजी व सुभद्राजी तथा मंदिर में नरसिंह भगवान व अन्य विग्रहों के दर्शन किये (द्वारिका धाम) तथा प्रसाद प्राप्त किया | शाम को आलाल् नाथ  (ब्रह्मगिरी) जो पुरी से लगभग 22 km पश्चिम में है, जाकर श्री नारायण के विग्रह के दर्शन किये जिन्हें खीर का भोग अर्पित किया जाता है | यह वही मंदिर है जहाँ चैतन्य महाप्रभु जब जगन्नाथजी के दर्शन, रथ यात्रा से पहले एक पखवारे के लिए बंद हो जाते थे, तब दर्शन के लिए जाते थे | मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक पत्थर की बड़ी शिला पर वे अपनी बाह्य चेतना खो कर गिर गए थे | उस पत्थर की शिला पर उनके शरीर के निशान बन गए तथा उसी शिला को पास में ही एक अलग मंदिर में स्थापित कर दिया गया है | उसी दिन वापसी में शाम को चन्दन तालाब में श्री मदनमोहन जी का पंच शिव व अन्य विग्रहों के साथ नौका विहार के दर्शन किये | फिर श्री रामानन्द राय जी का घर व उद्यान  देखा जहाँ श्री नारायण का विग्रह है तथा उसी स्थान पर उन्होंने 7 दिन/रात लगातार श्री चैतन्य महाप्रभु की उपस्थिति में एक नाटक जग्गंनाथ वल्लभ का मंचन किया था |

दूसरे दिन सुबह ही एक ऑटो बुक करके जगन्नाथ धाम में चैतन्य महाप्रभु से सम्बंधित अन्य पवित्र स्थानों के दर्शन किये | पहले गुण्डीचा का मंदिर (वृन्दावन धाम) देखा, जहाँ श्री जगन्नाथजी रथ यात्रा के समय बलदेवजी व सुभद्राजी के साथ नों दिन विश्राम करते हैं | फिर श्री नरसिंह भगवान का मंदिर देखा जहाँ वे श्री लक्ष्मीजी के साथ विराजमान है | इस मंदिर की स्थापना श्री इन्द्र्दुमन राजा ने की थी | इसी जगह पहले ब्रह्माजी ने उग्र नरसिंह देव का विग्रह स्थापित किया था | पास में ही इन्द्र्दुमन तालाब है, यह जगन्नाथ धाम के पंच तीर्थों में शामिल है | दूसरा तीर्थ है श्वेतगंगा, जो पहले श्वेत माधव के नाम से जाना जाता था | यह तालाब श्री सार्वभौम भट्टाचार्य के घर के पास ही है तथा वहाँ रसिकराज विग्रह की पूजा की जाती है | इसी विग्रह को पाटिया राजा की पुत्री श्वेत गंगा (पहले शची माता) ने प्राप्त किया था तथा उसी के नाम पर इस तालाब का नाम श्वेतगंगा पड़ा | जब प्रथम बार महाप्रभु ने जगन्नाथ जी के दर्शन किये तो वे मंदिर में बेहोश हो गए थे | तब सार्वभौम भट्टाचार्य उन्हें अपने घर ले गए थे | शुरू में महाप्रभु ने यहीं निवास किया था | उसके बाद हम गंभीरा गए जिसका नाम राधाकांत मठ भी है तथा यही श्री काशी मिश्र का घर है, जो उड़ीसा के राजा के राज-पुरोहित थे | इसी घर में उन्होंने 18 वर्ष बिताए तथा यहीं पर महाप्रभु श्री रामानंद राय व स्वरुप दामोदर के साथ कृष्ण प्रेम व राधा विरह भाव में चर्चा किया करते थे |

अगला पवित्र स्थान जो हमने देखा वह था सिद्ध बाकुल, जहाँ हरिदास ठाकुर (नाम-आचार्य) रहते थे | वे रोज तीन लाख हरि नाम जप किया करते थे | श्री चैतन्य रोज सुबह श्री जगन्नाथ जी के दर्शन करने के बाद हरिदास ठाकुर से मिलने जाते थे | श्रील रूप गोस्वामी और श्रील सनातन गोस्वामी जब श्री चैतन्य से मिलने जगन्नाथ धाम आये थे, तो हरिदास ठाकुर के साथ इसी  स्थान पर ठहरे थे | बाकुल वृक्ष की दातून जगन्नाथ जी को अर्पित की जाती थी, जिस का एक अवशेष महाप्रभु ने वहाँ रोपित कर दिया जिससे वह पूरा वृक्ष बन गया | जब एक बार मंदिर के सेवकों को जगन्नाथ जी के लिए दातुन की कमी पड़ी तो उन्होंने अगले दिन हरिदास ठाकुर जी के निवास स्थान पर स्थित बाकुल पेड़ को काटने का निश्चय किया | लेकिन हरिदास जी की प्रार्थना को स्वीकार करते हुए भगवान ने इस वृक्ष का सारा रस निचोड़ लिया और वह खोकला हो गया और काटने से बच गया | उसी बाकुल पेड़ के अवशेष (खोकले तने) अभी भी वहाँ है | फिर हमने तोता गोपीनाथ जी का मंदिर देखा | इस गोपीनाथ जी के विग्रह की सेवा श्री गदाधर पंडित करते थे तथा इसी गोपीनाथ जी विग्रह में श्री चैतन्य महाप्रभु इस भौतिक जगत में अपनी लीलाओं को समेट कर विलीन हो गए थे | उसके बाद हम श्री हरिदास ठाकुर के समाधी स्थल को देखने गए जो समुद्र के पास ही स्थित है | पंच तीर्थ में तीसरा तीर्थ समुद्र है, जहाँ महाप्रभु अपने भक्तों के साथ स्नान किया करते थे | चौथा तीर्थ है रोहिणी कुंड जो श्री जगन्नाथ धाम के प्रागण में बिमला माता के मंदिर के सामने स्थित है | तथा पंच तीर्थों में पांचवा तीर्थ है मार्कंडेय तीर्थ जो शायद अब लुप्त हो गया है |

उसी दिन शाम को हमने श्री साक्षी गोपाल के विग्रह के दर्शन किये, जो पुरी से लगभग 17 km उत्तर में है | यह वही गोपाल विग्रह है जो अपने एक ब्राह्मण भक्त के वचन को सत्य सिद्ध करने के लिए साक्षी के रूप में वृन्दावन से भक्त के पीछे पैदल चल कर विद्यानगर पहुचे थे तथा बाद में इसे उडिशा के राजा, विद्यानगर के राजा को हरा कर कटक ले गए थे |

श्री चैतन्य महाप्रभु, गरूड स्तंभ के पीछे एक स्थान से श्री जगन्नाथ जी के दर्शन किया करते थे, जो ब्रह्माजी की आदमकद मूर्ती के पास है | उस पत्थर के स्तम्भ पर उनकी दोनों हाथ की अँगुलियों के निशान अभी भी मौजूद हैं | इसी स्थान पर शिवजी की मूर्ती के साथ ही, एक सफेद घोड़े पर सवार भगवान जगन्नाथ तथा एक काले घोड़े पर सवार बलदेव जी की मूर्तियाँ हैं | यह उस घटना के प्रतीक के रूप में है, जब श्री जगन्नाथ तथा बलदेव, राजा इन्द्र्दुमन के साथ विद्धयानगर युद्ध करने गए थे |

श्री जगन्नाथ धाम के प्रागण में उत्तरी द्वार के निकट श्री शीतला माता के मंदिर के पास एक कुआँ है, इसके जल से ही श्री जगन्नाथजी को बलदेवजी व सुभद्राजी के साथ स्नान कराया जाता है | इस बार यह स्नान उत्सव 13 जून को पड़ा था | स्नान के बाद भगवान के दर्शन जनता के लिए बंद कर दिए जाते है | इस एक पखवारे में उनका साज श्रृंगार किया जाता है तथा फिर रथ यात्रा वाले दिन वो मंदिर से बाहर आ कर भक्तों को दर्शन देते है | रथ यात्रा इस बार 29 जून को होगी | श्री जगन्नाथ धाम के प्रागण में उत्तरी द्वार के ही निकट एक बड़े उद्द्यान में एक पवित्र जगह है, जहाँ श्री जगन्नाथजी, बलदेवजी व सुभद्राजी के पुराने विग्रह को समाधी दी जाती है, और तब नए विग्रह स्थापित किये जाते है | यह उत्सव (नव कलेवर) 2015 में होगा, पिछली बार यह 1996 में हुआ था |

यह मेरा पहला यात्रा विवरण है,यदि उपरोक्त विवरण में मैंने कुछ भी गलत जानकारी दी हो उसके लिए मुझे क्षमा करने की कृपा करेंगे |

हरे कृष्णा

हरे कृष्णा

E-mail me when people leave their comments –

You need to be a member of ISKCON Desire Tree | IDT to add comments!

Join ISKCON Desire Tree | IDT