Hare Krsna,

Please accept my humble obeisance. All glories to Srila Prabhupada & Srila Gopal Krishna Maharaj.

                भक्ति रस की सर्वोच्च उत्कृष्ट पराकाष्ठा - श्री राधा कृष्ण प्रेम

श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपनी दक्षिण भारत की यात्रा के समय गोदावरी नदी के तट पर एकांत स्थान में श्री रामानन्द राय से कृष्ण प्रेम के विषय में चर्चा की, जिसका पूर्ण विवरण C.C मध्य लीला अध्याय 8 में प्राप्त है | उसी चर्चा के महत्व पूर्ण अंश इस प्रकार हैं :

श्री चैतन्य: जीवन के चरम लक्ष्य से सम्बन्धित शास्त्रों से एक श्लोक सुनायें | श्री राय: “यदि कोई अपने सामाजिक पद सम्बन्धी नियत कर्मों को संपन्न करता है, तो वह भगवान बिष्णु की भक्ति प्राप्त कर सकता है | पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान को तुष्ट करने की अन्य कोई विधि नहीं है” | श्री चैतन्य: यह तो बाह्य है, आप मुझे कोई दूसरा साधन बतलाये | श्री राय: “सारी पूर्णता का सार यह है कि अपने सभी कर्मों के फल कृष्ण को अर्पित किये जाएँ” | इसके समर्थन में B.G.9.27 का यह श्लोक पढ़ा: “हे कुंती-पुत्र, तुम जो कुछ करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ अर्पित करते हो, या दान देते हो और जो भी तपस्या करते हो, उसे मुझे अर्पित करते हुए करो”| श्री चैतन्य: यह भी बाह्य है, इस विषय पर आगे कहो | श्री राय: “वर्णाश्रम में अपने नियत कर्मों को त्यागना ही पूर्णता का सार है” | इसके समर्थन में B.G.18.66 का यह श्लोक पढ़ा: “समस्त प्रकार के धर्मों का परित्याग करो और मेरी शरण में आओ | मैं समस्त पापों से तुम्हारा उद्धार कर दूंगा” |

श्री चैतन्य ने उनके कथन को अस्वीकार करते हुए कहा कि आगे कुछ और कहो | श्री राय: “ज्ञानमिश्रित भक्ति ही पूर्णता का सार है” | B.G.18.54 के अनुसार: “इस प्रकार जो दिव्य पद पर स्थित है, उसे परम ब्रह्म की अनुभूति तुरंत हो जाति है | वह न तो कभी शोक करता है, न किसी वस्तु की कामना करता है | वह प्रत्येक जीव पर समभाव रखता है | उस अवस्था में वह मेरी शुद्ध भक्ति प्राप्त करता है” | श्री चैतन्य ने पहले की तरह इसे भी बाह्य भक्ति मानते हुए अस्वीकार कर दिया और पुनः आगे बोलने के लिए कहा | श्री राय: “ज्ञान से रहित भक्ति ही पूर्णता का सार है” | S.B.10.14.3 के अनुसार: “जिन भक्तों ने परम सत्य के बारे में निर्विशेष विचार-विमर्श को त्याग दिया है, उन्हें स्वरूपसिद्ध भक्तों से अपने पद पर स्थित रहते हुए भगवान के नाम,रूप, लीलाओं तथा गुणों के बारे में श्रवण करना चाहिए | निसन्देह, आप सदैव अजेय होते हुये भी ऐसे भक्तों द्वारा जीते जाते हैं ” |

श्री चैतन्य: हाँ यह ठीक है, फिर भी कुछ आगे कहो | श्री राय: “समस्त पूर्णता का सार पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान की भावपूर्ण प्रेमाभक्ति है” | इसके समर्थन में उन्होंने श्रील रूप गोस्वामी कृत पद्धावली श्लोक 70 पढ़ा: “लाखों जन्मों के पुण्यकर्मों से भी शुद्ध भक्ति प्राप्त नहीं की जा सकती | इसे तो केवल एक मूल्य पर- भगवान के प्रति स्वतः स्फूर्त (रागानुराग) प्रेम से ही प्राप्त की जा सकती है”|   

स्वतः स्फूर्त प्रेम के बात सुनकर श्री चैतन्य ने कहा कि यह ठीक है, किन्तु यदि  आप और अधिक जानते है तो मुझे बतलाये | श्री राय: “स्वतः स्फूर्त दास्य प्रेम- स्वामी तथा सेवक में आदान-प्रदान होने वाला प्रेम- ही सर्वोच्च पूर्णता है” | S.B.9.5.16 के अनुसार: “जिन भगवान के चरण-कमलों में सभी तीर्थ स्थान स्थित है, उनके पवित्र नाम सुनने मात्र से मनुष्य निर्मल हो जाता है | अतैव उनके दासों के लिए आगे पाने के लिए क्या बचा रह जाता है” | यह सुन कर महाप्रभु ने पुनः प्रार्थना कि वे और आगे बढ़ें | श्री राय: “सख्य भाव से की गई कृष्ण की प्रेमाभक्ति सर्वोच्च पूर्णता है | S.B.10.12.11 के अनुसार: “जो लोग भगवान के ब्रह्म-तेज की सराहना करते हुए आत्म-साक्षात्कार में लगे है, जो लोग भगवान की स्वामी के रूप में भक्ति में लगे है तथा वे जो भगवान को सामान्य पुरुष मान कर माया के पाश में बंधे रहते है, कभी भी यह नहीं समझ सकते कि कुछ महापुरुष अनैक पुण्यकर्मों को संचित करने के बाद ग्वालबालों के रूप में भगवान के साथ मित्र बन कर खेल रहे है” | महाप्रभु:  यह कथन अति उत्तम है, किन्तु आगे कहो | श्री राय: “भगवान के प्रति वात्सल्य प्रेम सर्वोच्च पूर्णता की अवस्था है” | इसके समर्थन में S.B.10.9.20 का यह श्लोक पढ़ा : “मुक्ति दाता कृष्ण से माता यशोदा को जो कृपा-प्रसाद मिला, वह न तो कभी ब्रह्माजी को प्राप्त हो सका, न शिवजी को, न उन लक्ष्मीजी को जो सदैव भगवान बिष्णु के वक्षस्थल पर विराजमान रहती है” |

महाप्रभु: तुम्हारे कथन उतरोत्तर अच्छे होते जा रहे है किन्तु इन सबसे बढकर अन्य दिव्य रस है जिसे आप अच्छी तरह बतला सकते है | रामानन्द राय: ”भगवत्प्रेम में कृष्ण के प्रति माधुर्य आसक्ति सर्वोपरि है | इसके समर्थन में S.B.10.9.20 का यह श्लोक पढ़ा : “जब भगवान कृष्ण गोपियों के साथ रासनृत्य कर रहे थे, तब उनकी भुजाएँ गोपियों के गले के इर्द गिर्द उनका आलिंगन कर रही थीं | ऐसा दिव्य संयोग न तो कभी लक्ष्मीजी जो प्राप्त हुआ, न ही वैकुण्ठ की अन्य प्रेयसियों को, न ही स्वर्गलोक की उन सुन्दरियों को जिनकी सुगन्धि कमल के फूल जैसी है तो भला उन सांसारिक स्त्रियों की बात ही क्या,जो भौतिक दृष्टि से अत्यंत सुन्दर हों?” |

कृष्ण की कृपा प्राप्त करने के अनेक साधन तथा विधियाँ हैं | जब हम विभिन्न विधियों का अध्ययन तटस्थ हो कर करते हैं तो हम समझ सकते हैं कि प्रेम की उच्च तथा निम्न कोटियाँ होती हैं | एक के बाद एक रसों में अधिकाधिक प्रेम का अनुभव होता है किन्तु सर्वोच्च स्वाद वाला प्रेम तो माधुर्य रस में ही प्रकट होता है | गुणों में वृद्धि के साथ-साथ रस के स्वाद में भी वृद्धि होती जाती है | अतः शान्त रस, दास्य रस, सख्य रस तथा वात्सल्य रस के सारे गुण माधुर्य रस में प्रकट होते हैं | S.B.10.32.22 में कहा गया है कि “भगवान कृष्ण माधुर्य रस में भक्ति का आदान-प्रदान समान अनुपात में नहीं कर पाते, अतएव वे ऐसे भक्तों के सदैव ऋणी रहते हैं” | कृष्ण गोपियों से स्वीकार करते हैं कि वे उनके ऋण को अनेक जन्मों में भी नहीं चुका सकेगें, क्योंकि गोपियों ने उन्हें पाने के लिए समस्त बंधनों को तोड़ डाला | यद्यपि कृष्ण का अप्रितम सोंदर्य भगवत्प्रेम का सर्वोच्च माधुर्य है, किन्तु जब वे गोपियों के बीच में होते हैं तब उनका माधुर्य असीम रूप से बढ जाता है, फलस्वरूप गोपियों के साथ कृष्ण द्वारा प्रेम का आदान-प्रदान भगवत्प्रेम की चरम पूर्णता है |

श्री चैतन्य: यह निश्चय ही पूर्णता की सीमा है,किन्तु आप मुझ पर कृपा करें और यदि कुछ और हो तो उसे कहें | श्री रामानन्द: “ गोपियों में अपनी खुद की इन्द्रिय-तृप्ति की रंचमात्र भी इच्छा नहीं है | उनकी एकमात्र इच्छा कृष्ण को आनन्द देने की होती है और इसी कारण वे उनसे मिलती हैं | गोपियाँ कृष्ण के साथ कभी भी स्वयं भोग करना नहीं चाहती | जब गोपियाँ श्री राधा और श्री कृष्ण को उनकी दिव्य लीलाओं में प्रवृत करने का काम करती हैं तो उनका सुख करोड़ गुणा बढ जाता है | श्रीमती राधारानी तरह-तरह के बहानों से गोपियों को कृष्ण के पास प्रत्यक्ष संग के लिए भेजती हैं | इस अवसर पर उन्हें अपने मिलन की अपेक्षा करोड़ गुना अधिक सुख मिलता है | गोपियों के प्रेम व्यापार में कृष्ण के प्रति श्रीमती राधारानी का प्रेम सर्वोपरि है और कृष्ण को अत्यन्त प्रिय हैं | 

श्री चैतन्य: बोलते जाइए, क्योंकि आप के मुख से अद्वितीय अमृत की नदी बह रही है | श्री राय: श्री कृष्ण ने रास नृत्य के समय अन्य गोपियों की उपस्थिति के कारण श्रीमती राधारानी से प्रेम का आदान-प्रदान नहीं किया | श्रीमती राधारानी ने जब यह देखा कि उनके साथ अन्य गोपियों जैसा व्यवहार हो रहा है तो वे बुरा मान गई और क्रुद्ध हो कर रास नृत्य से चली गई | श्री कृष्ण अत्यन्त व्याकुल हो गये, अतएव उन्होंने भी रास नृत्य मंडल को छोड़ दिया | चूँकि कृष्ण की काम वासना लाखों गोपियों के बीच में भी पूरी नहीं हो सकी और वे श्रीमती राधारानी की खोज कर रहे थे, अतएव हम अनुमान लगा सकते हैं कि श्रीमती राधारानी में कितने दिव्य गुण हैं |

भगवत्प्रेम का सार अंश महाभाव अर्थात दिव्य आह्लाद कहलाता है और इस महाभाव का प्रतिनिधित्व करने वाली है श्रीमती राधारानी | श्रीमती राधारानी का वह महाभाव ही आध्यात्मिक जीवन का सार है | भगवान कृष्ण समस्त आनन्द के आगार है और श्रीमती राधारानी साक्षात्  महाभावमय भगवत्प्रेम का मूर्तिमंत स्वरुप है | वे कृष्ण की सर्वाधिक प्रिय संगिनी हैं | चूँकि श्रीमती राधारानी में सारे दिव्य गुण प्रकट हैं, अतएव अकेले वे ही कृष्ण की सारी इच्छाएं पूरी करने में समर्थ हैं- अन्य कोई नहीं | स्वयं भगवान कृष्ण भी श्रीमती राधारानी के दिव्य गुणों का पार नहीं पा सकते, तो भला तुच्छ जीव किस प्रकार उनकी गिनती कर सकता है |

यशोदा के पुत्र भगवान कृष्ण उन भक्तों को सुलभ है, जो रागानुराग भक्ति में लगे हुए हैं | अतएव मनुष्य को गोपियों के सेवाभाव को ग्रहण करना चाहिए | ऐसे दिव्य भाव में श्री राधा कृष्ण की लीलाओं का निरन्तर चिंतन करना चाहिए | जब तक मनुष्य गोपियों के चरणचिन्हों का अनुसरण नहीं करता, तब तक उसे नन्द महाराज के पुत्र कृष्ण के चरण-कमलों के सेवा प्राप्त नहीं हो सकती भले ही वह भक्तिमयी सेवा में न लगा हुआ हो |  राधा-कृष्ण तथा उनकी लीलाओं का दीर्घकाल तक चिंतन करने और भौतिक कल्मष से पूरी तरह मुक्त होने पर मनुष्य आध्यात्मिक जगत को चला जाता है | वहाँ भक्त को गोपी के रूप में राधा तथा कृष्ण की सेवा करने का सुअवसर प्राप्त होता है |

यह सुन कर श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा कि मैं जिसके लिए आपके पास आया हूँ, वह राधा तथा कृष्ण का प्रेम-तत्व अब मेरी समझ में आया है | मानव जीवन के लक्ष्य की यही सीमा है | अब जाकर मैं जीवन के दिव्य लक्ष्य को और उसे प्राप्त करने की विधि को समझ पाया हूँ |

इस रस की एक बूँद भी आप और मैं प्राप्त करने के योग्य बन पाये, इसी शुभकामनायें के साथ आपका सेवक |

हरे कृष्णा

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