Hare Krsna,

Please accept my humble obeisance. All glories to Srila Prabhupada & Srila Gopal Krishna Maharaj.

भगवान कृष्ण ने उद्धव से (श्रीमद् भागवतम के स्कन्द 11) भक्ति के उन सिद्धान्तों का वर्णन किया जिनको संपन्न करने से मनुष्य (मर्त्य प्राणी) दुर्जय मृत्यु पर विजय पा सकता है | इस मुक्तिप्रदायक ज्ञान के मुख्य अंश इस प्रकार है :

हे उद्धव! अनेक जन्मो के पश्चात् व्यक्ति को यह दुर्लभ मनुष्य शरीर प्राप्त होता है, जो अस्थायी होते हुए भी उसे जीवन की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करने का अवसर प्रदान करता है | इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह इस शरीर के द्वारा तब तक जीवन की सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त करने का प्रयास करता रहे, जब तक यह शरीर मर कर गिर नहीं जाता | क्योंकि इन्द्रिय भोग तो निम्न योनी के प्राणियों को भी उपलब्ध होता है जबकि कृष्ण-भक्ति केवल मनुष्य शरीर में ही संभव है (9.29)|

हे उद्धव! मनुष्य को सभी परिस्थितियों में अपने जीवन के असली स्वार्थ (उद्देश्य) को देखना चाहिए और इसीलिए पत्नी, संतान, घर, भूमि, रिश्तेदारों, मित्र, सम्पत्ति इत्यादि से विरक्त रहना चाहिए(10.7)| नित्य आत्मा के प्रति सचेष्ट मनुष्य को स्त्रियों तथा स्त्रियों से घनिष्ठता से जुड़े रहने वाले व्यक्तियों की संगति त्याग देनी चाहिए और उसे अपना मन को पूरी तरह से मुझमे लीन कर देना चाहिए  (14.29) | बच्चों, पत्नी, सम्बन्धियों तथा मित्रों की संगति यात्रियों के लघु मिलाप जैसी है | शरीर के परिवर्तन के साथ, मनुष्य ऐसे संगियों से उसी तरह विलग हो जाता है जिस तरह स्वप्न में मिली हुई सारी वस्तुएँ खो जाती हैं (17.53) | वास्तविक स्थिति पर गम्भीरतापूर्वक विचार करते हुए मुक्तात्मा को चाहिए कि घर में एक मेहमान की तरह किसी स्वामित्व की भावना या मिथ्या अहंकार के बिना रहे (17.54) | किन्तु जिस गृहस्थ का मन अपने घर में आसक्त है और जो धन तथा संतान सुख को भोगने की तीव्र इच्छाओं से विचलित है, जो स्त्रियों के किये काम वासना से पीड़ित है और जो मूर्खतावश सोचता है कि,”प्रत्येक वस्तु मेरी है और मैं ही सब कुछ हूँ” निसन्देह, वह व्यक्ति माया-जल में फँसा हुआ है (17.56) |  

हे उद्धव! जीव मेरा भिन्नांश है, किन्तु अज्ञान के कारण वह अनादि काल से भौतिक बंधन भोगता रहता है फिर भी ज्ञान के द्वारा वह मुक्त हो सकता है (11.4) | अपने सकाम कर्म के कारण बद्धजीव, सतोगुण के सम्पर्क से ऋषियों या देवताओं के बीच जन्म लेता है | रजोगुण के सम्पर्क से वह असुर या मनुष्य बनता है और तमोगुण की संगति से वह भूतप्रेत या पशु जगत में जन्म लेता है (22.52) | वह व्यक्ति स्थूल तथा सूक्ष्म शरीरों से पूर्णतया मुक्त माना जाता है, जब उसके प्राण, इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि के सारे कार्य किसी भौतिक इच्छा के बिना संपन्न किये जाते हैं (11.14) | यध्यपि वह अन्यों को अच्छा तथा बुरा कार्य करते और उचित व अनुचित बोलते देखता है किन्तु वह किसी की प्रशंसा या आलोचना नहीं करता (11.16) |

हे उद्धव!  वह व्यक्ति निश्चय ही अत्यन्त दुखी रहता है, जो दूध न देनी वाली गाय, कुलटा पत्नी, पूर्णतया पराश्रित शरीर, निक्कमें बच्चों या सही कार्य में न लगायी जाने वाली धन सम्पदा की देखरेख करता है | इसी तरह जो मेरी महिमा से रहित वैदिक ज्ञान का अध्ययन करता है वह भी सर्वाधिक दुखियारा है (11.19) | भौतिक जगत में हर व्यक्ति कुछ वस्तुओं को अत्यन्त प्रिय मानता है और इन वस्तुओं के प्रति लगाव के कारण अन्ततः वह दीन-हीन बन जाता है | जो व्यक्ति इसे समझता है, वह भौतिक संपत्ति के स्वामित्व तथा लगाव को त्याग देता है और इस तरह असीम आनन्द प्राप्त करता है (9.1) | यदि तुम अपने मन को आध्यात्मिक पद पर स्थिर करने में असमर्थ हो तो अपने सारे कार्यों को, उनका फल भोगने का प्रयास किये बिना मुझे अर्पित करो (11.22) | ऐसा मर्त्य व्यक्ति कौन होगा जो इस मनुष्य जीवन को जो कि स्वर्ग तथा मोक्ष का द्वार है, प्राप्त कर भौतिक सम्पत्ति रूपी व्यर्थ के धाम के प्रति अनुरुक्त होगा? (23.23) |

हे उद्धव! जिसने मेरे भक्तों की संगति से शुद्ध भक्ति प्राप्त कर ली है वह निरंतर मेरी पूजा में लगा रहता है, इस तरह वह आसानी से मेरे धाम को प्राप्त करता है (11.25) | भक्तों की संगति में सदा मेरी कथाओं की चर्चा चलती रहती है और जो लोग मेरी महिमा के इस कीर्तन तथा श्रवण में भाग लेते हैं वे निश्चित रूप से सारे पापों से शुद्ध हो जाते हैं (26.28) | यदि कोई व्यक्ति मरे भक्तों की संगति से सम्भव मेरी प्रेमा-भक्ति में प्रवृत नही होता,तो भौतिक जगत से बचने का कोई उपाय उसके पास नही रहता (11.48) | मेरे शुद्ध भक्तों की संगति करने से, इन्द्रियतृप्ति के प्रति आसक्ति को नष्ट किया जा सकता है | शुद्धि करने वाली ऐसी संगति मुझे मेरे भक्त के वश में कर देती है (12.1) | पूरे मन से केवल मेरी ही शरण ग्रहण करो, और भय से मुक्त हो जाओ क्योकि में ही समस्त बद्धात्माओं के हृदय के भीतर स्थित भगवान हूँ (12.15) |

हे उद्धव! जो लोग समस्त भौतिक इच्छायें त्याग कर, अपनी चेतना मुझमें स्थिर करते हैं, वे मेरे साथ उस सुख में हिस्सा बटातें हैं जिसे भौतिक इन्द्रिय तृप्ति में अनुरुक्त मनुष्यों द्वारा अनुभव नहीं किया जा सकता (14.12) | यदि मेरा भक्त पूरी तरह से अपने इन्द्रियों को जीत नहीं पाता, तो वह भौतिक इच्छाओं द्वारा उदगिन किया जा सकता है किन्तु मेरे प्रति अविचल भक्ति के कारण, वह इन्द्रियतृप्ति द्वारा परास्त नहीं किया जा सकता (14.18) |

हे उद्धव!  जिस प्रकार सोने को जब आग में पिघलाया जाता है तो उसकी सारी अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं तथा अपनी मूल दीप्तिमान अवस्था को प्राप्त कर  लेता है |  उसी प्रकार आत्मा जब भक्ति योग में डूब जाती है तो उसके पिछले जन्मो के सभी कर्म-फल नष्ट हो जाते हैं | तब आत्मा भी अपनी नित्य स्थिति जो भगवान के दास रूप में है, को पा जाती है (14.25) | हे उद्धव, जिस तरह धधकती अग्नि इंधन को जलाकर राख कर देती है, उसी तरह मेरी भक्ति मेरे भक्त द्वारा किये गए पापों को पूर्णतया भस्म कर देती है | हे उद्धव, भक्तों द्वारा की जाने वाली मेरी शुद्ध भक्ति मुझे उनके वश में करने वाली है | मुझ पर पूर्ण श्रद्धा से युक्त शुद्ध भक्ति का अभ्यास करके ही मुझे प्राप्त किया जा सकता है | मैं अपने उन भक्तों को प्रिय हूँ जो मुझे ही अपनी प्रेमाभक्ति का एकमात्र लक्ष्य मानते हैं (14.19-20-21) |

हे उद्धव!  वास्तविक धार्मिक सिद्धांत वे हैं जो मनुष्य को मेरी भक्ति तक ले जाते हैं | इन्द्रिय तृप्ति की वस्तुओं में पूर्ण अरुचि ही वैराग्य है (19.27) | स्वर्ग तथा नरक दोनों ही के निवासी, प्रथ्वीलोक पर मनुष्य का जन्म पाने की आकांक्षा रखते हैं क्योंकि मनुष्य जीवन दिव्य ज्ञान तथा भगवत्प्रेम की प्राप्ति को सुगम बनता है (20.12) | भौतिक शरीर निश्चय ही विधाता के वश में रहता है, अतः यह शरीर तब तक इन्द्रियों तथा प्राण के साथ जीवित रहता है जब तक उसका कर्म प्रभावशाली रहता है (13.37) | यह जानते हुए कि भौतिक शरीर मरणशील है, तो भी यह जीवन-सिद्धि प्रदान कर सकता है | इसलिए विद्वान् व्यक्ति को मृत्यु आने के पूर्व आलस्य त्याग कर जीवन-सिद्धि प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए (20.14) |

हे उद्धव!  इन सारी वस्तुओं को जो सकाम कर्म,तपस्या, ज्ञान,वैराग्य,योग,दान, धर्म तथा जीवन को पूर्ण बनाने वाले अन्य सारे साधनों से प्राप्त की जाती हैं, मेरा भक्त मेरे प्रति भक्ति से अनायास प्राप्त कर लेता है (20.32 | मेरे भक्त मेरे अतिरिक्त कुछ भी नहीं चाहते, सच तो यह है कि यदि मैं उन्हें जन्म-मृत्यु से मुक्ति भी प्रदान करता हूँ तो वे इसे स्वीकार नहीं करते (20.34) | इसलिए जिसकी कोई निजी इच्छा नहीं होती और जो निजी लाभ के पीछे नहीं भागता, वह मेरी प्रेमाभक्ति प्राप्त कर सकता है (20.35) | जो व्यक्ति कर्मफल का विचार किये बिना, भक्ति में लगा रहता है वह मुझे प्राप्त करता है (27.53) | पूर्ण भक्त के लिए मुझ परम सत्य की भक्ति प्राप्त कर लेने के बाद, करने के लिए बचता ही क्या है? (26.30) |

हे उद्धव! जीव भौतिक जगत से परे है किन्तु भौतिक प्रक्रति पर प्रभुत्व जताने की मनोवृति के कारण उसका अस्तित्व मिटता नहीं (28.13) | जब तक मनुष्य द्रढ़तापूर्वक मेरी भक्ति का अभ्यास करके अपने मन से भौतिक काम-वासना के कल्मष को पूरी तरह निकल नही फेंकता है, तब तक उसे भौतिक गुणों की संगति करने में सावधानी बरतनी चाहिए जो मेरी मायाशक्ति द्वारा उत्पन्न होते हैं (28.27) | जिस तरह सोने की वस्तुएँ तैयार होने के पूर्व, एकमात्र सोना रहता है और जब ये वस्तुएँ नष्ट हो जाती है तो भी एकमात्र सोना बचा रहता है | विविध नामों से व्यवहार में लाये जाने पर भी एकमात्र सोना ही अनिवार्य सत्य होता है | उसी तरह, इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि के पूर्व, इसके संहार के बाद और इसके अस्तित्व के समय केवल मैं ही विद्यमान रहता हूँ (28.19) |

हे उद्धव! जो व्यक्ति अनन्य भाव से मेरी पूजा करता है और जो सारे जीवों में मुझे उपस्थित समझता है, वह मेरी अविचल भक्ति प्राप्त करता है और वह मेरे पास आता है | मैं सारे लोकों का परमेश्वर हूँ और परम कारण होने से,मैं इस ब्रह्मांड का सृजन और विनाश करता हूँ (18.44-45) | जो व्यक्ति सारे जीवों को इस भाव से देखता है की मैं उन में से हर एक में उपस्थित हूँ, जो शुद्ध ह्रदय से सारे जीवों के भीतर और अपने भी भीतर मुझको परमात्मा रूप में देखता है वही वास्तव में बुद्धिमान माना जाता है | उसका मिथ्या अहंकार तुरंत नष्ट हो जाता है (29.14) | मन, वाणी तथा शरीर के कार्यों को प्रयोग करके सारे जीवों के भीतर मेरी अनुभूति अध्यात्मिक प्रकाश की सर्वश्रेष्ट  विधि है (29.19) |

हे उद्धव! यह मनुष्य जीवन जो मेरा साक्षात्कार करने का अवसर प्रदान करता है, पाकर और मेरी भक्ति में स्थित हो कर मनुष्य मुझे प्राप्त कर सकता है (26.1) | मनुष्य को चाहिए कि सदैव मेरा स्मरण करते हुए बिना किसी हड़बड़ी के मेरे प्रति अपने सारे कर्तव्य पूरा करे | उसे चाहिए कि वह मन तथ बुद्धि मुझे अर्पित करके मेरी भक्ति के आकर्षण में अपना मन स्थिर करे (29.9) | जो व्यक्ति सारे सकाम कर्म त्याग देता है और मेरी सेवा करने की तीव्र उत्कंठा से स्वयं को पूरी तरह मुझको सौंप देता है, वह जन्म-मृत्यु से मोक्ष पा लेता है और मेरे समान ऐश्वर्य के पद पर उन्नत हो जाता है (29.34) | जो लोग मेरे द्वारा सिखलाये गये मुझे प्राप्त करने के इन नियमों का गम्भीरता से पालन करते हैं, वे मोह से छुटकारा पा लेते हैं और मेरे धाम को प्राप्त करते हैं (20.37) |

हे उद्धव! जो व्यक्ति उदारतापूर्वक इस ज्ञान को मेरे भक्तों के बीच फैलाता है, वह परम सत्य का देना वाला है और मैं उसे अपने आपको दे देता हूँ (29.26) | जो कोई इस ज्ञान को श्रद्धा तथा ध्यान के साथ नियमित रूप से सुनता है और मेरी शुद्ध भक्ति में लगा रहता है, वह भौतिक कर्म के फलों के बन्धन से कभी नही बंधता (29.28) | तुमसे कहे गए मेरी भक्ति के सिद्धांतों को श्रद्धा के साथ संपन्न करने से मर्त्य प्राणी दुर्जय मृत्यु को जीत लेता है (29.8) |

हरे कृष्णा,

दण्डवत

आपका विनीत सेवक

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