Hare Krsna,
Please accept my humble obeisance. All glories to Srila Prabhupada & Srila Gopal Krishna Maharaj.
भगवान कपिल ने अपनी माता देवहूति के पूछने पर इन्द्रियतृप्ति के बन्धन से मुक्त होने तथा दिव्य साक्षात्कार के लिए भक्तियोग का ऐसा सरल वर्णन किया जिसे एक स्त्री भी भलीभांति समझ सके व भगवद्-धाम वापस जा सके (स्कन्द 3: अध्याय 25-33):
भगवान कपिल कहते हैं: जो योग पद्धति जीवात्मा को भगवान से जोडती है, जो भौतिक जगत में समस्त सुखों तथा दुखों से विरक्ति उत्पन्न करती है वही सर्वोच्च योग पद्धति है (25.13) | वास्तव में जीवात्मा इस संसार से परे है,किन्तु प्रकृति पर अधिकार जताने की अपनी मनोवृति के कारण उसके संसार-चक्र की स्थिति कभी रूकती नही तथा भौतिक गुणों के साथ अपनी संगति के कारण उच्चतर व निम्नतर योनियों में देहान्तर करता रहता है | जब आत्मा प्रकृति के जादू तथा अहंकार के वशीभूत होकर शरीर को स्व: मान लेता है, तो अहंकारवश सोचता है कि मै ही प्रत्येक वस्तु का कर्ता हूँ (27.2-4) |जब मनुष्य शरीर को “मै” तथा भौतिक पदार्थो को “मेरा” मानने के झूठे विकारो से मुक्त हो जाता है तो उसका मन शुद्ध हो जाता है तब वह तथाकथित सुख तथा दुख की अवस्था को लाँघ जाता है (25.16) | वह इस संसार के प्रीति अन्यमनस्क हो जाता है (25.18) | सांसारिक आसक्ति ही आत्मा का सबसे बड़ा बंधन है, किन्तु वही आसक्ति यदि सिद्ध भक्तों के प्रति हो जाये तो मोक्ष का द्वार खुल जाता है (25.20) | साधू पुरुष अविचलित भाव से भगवान की कट्टर भक्ति करता है तथा भगवान के लिए वह संसार के समस्त संबंधों व सभी पारिवारिक सम्बन्ध का त्याग कर देता है (25.22) | साधू पुरुषो की संगति भौतिक आसक्ति के समस्त कुप्रभावो को हरने वाली है (25.24) | भक्तों की संगति में सचेत होकर भक्ति करते हुए तथा भगवान की लीलाओ के विषय में निरंतर सोचते रहने से मनुष्य की इस लोक व परलोक में इन्द्रियतृप्ति के प्रति अरुचि उत्पन्न हो जाती है | कृष्णभावनामृत की यह सरलतम विधि है (25.26) |
मन भगवान का प्रतिनिधि है तथा मन का प्राकर्तिक कार्य सेवा करना है (25.32) | भक्ति जीवात्मा के सूक्ष्म शरीर को बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के उसी प्रकार विलय कर देती है, जिस प्रकार जठराग्नि खाये हुए भोजन को पचा देती है (25.33) | मेरा भक्त जो मेरी चरण-कमलो की सेवा में लगा रहता है, कभी भी मुझ से तदाकार नही होना चाहता (25.34), न ही वह ईश्वर के धाम पहुंचना चाहता है (25.37) | भक्तगण मुझे अपना मित्र, सम्बन्धी, पुत्र, शिक्षक, शुभचिंतक तथा परमदेव मानते हैं (25.38) | इस प्रकार जो भक्त मुझे सर्वव्यापी, जगत के स्वामी की अनन्य भाव से पूजा करता है, मै उसे जन्म और मृत्यु के सागर के उस पार ले जाता हूँ (25.40) | यदि कोई मुझे छोड़ कर अन्य की शरण ग्रहण करता है तो वह जन्म तथा मृत्यु के विकट भय से कभी छुटकारा नही पा सकता (25.41) | जिन व्यक्तियों के मन भगवान में स्थिर है,वे भक्ति का तीव्र अभ्यास करते हैं, जीवन की अंतिम सिद्धि प्राप्त करने का यही एकमात्र साधन है (25.44) |
भौतिक चेतना ही मनुष्य के बद्धजीवन का कारण है (26.7) | मनुष्य को व्यर्थ ही शरीर के रूप में अपनी पहचान नही करनी चाहिए, अन्यथा वह शारीरिक सम्बन्धों से खिंचा चला जायेगा (27.9) | प्रत्येक बद्धजीव का कर्तव्य है कि वह भौतिक सुखोपभोग के प्रति आसक्त अपनी दूषित चेतना को विरक्तिपूर्वक अत्यंत गंभीर भक्ति में लगाये, इस तरह उसका मन तथा चेतना पूरी तरह उसके वश में हो जाएंगे | वह श्रृद्धा सहित मेरे विषय की कथाएँ सुनने से अपने आप को शुद्ध भक्ति के पद तक उपर उठाये (27.5-6) |
भक्ति करने से प्रकृति के प्रभाव को उसी प्रकार दूर किया जा सकता है जिस प्रकार अग्नि उत्पन्न करने वाले काष्ठ-खंड स्वयं भी अग्नि द्वारा भस्म हो जाते हैं (27.23) | जो परम सत्य को जानता है तथा जिसका मन भगवान में ही स्थिर रहता है उसे प्रकृति का प्रभाव हानि नही पहुंचा सकता भले ही वह भौतिक कार्य-कलापों में व्यस्त रहता हो (27.26) | भक्ति का उच्च पद प्राप्त करके मनुष्य प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव को लाँघ सकता है और दिव्य पद पर स्थित हो सकता है (29.14) |
जो व्यक्ति मंदिर में भगवान के विग्रह का पूजन करता है किन्तु यह नहीं जानता कि परमात्मा रूप में भगवान प्रत्येक जीव के हृदय में आसीन है, वह अज्ञानी है तथा ऐसा व्यक्ति है जो राख में आहुति डालता है, मैं उससे कभी प्रसन्न नही होता (29.22 & 24) |
अपने कर्त्तव्य-निर्वाह विरक्त भाव से तथा स्वामित्व व अहंकार की भावना से रहित होकर काम करने से, मनुष्य शुद्ध चेतना के द्वारा अपनी स्वाभाविक स्थिति में आसीन होकर भौतिक कार्यों को करते हुए भी सरलता के साथ भगवान के धाम में प्रविष्ट हो सकता है (32.6) | समस्त योगियों के लिए सबसे बड़ी सूझबूझ तो पदार्थ से पूर्ण विरक्ति है (32.27) |
अतः हे माता,आप प्रत्यक्ष भक्ति द्वारा जन-जन के ह्रदय में स्थित पूर्ण-पुरुषोत्तम भगवान की शरण ग्रहण करे (32.11), जिनके चरणकमल पूजनीय हैं | इस तरह से आप दिव्य भक्ति को प्राप्त हो सकेंगी (32.22) | कृष्णचेतना में लगने और भक्ति को कृष्ण में लगाने से ज्ञान, विरक्ति तथा आत्म-साक्षात्कार में प्रगति करना संभव है (32.23) | मनुष्य को चाहे भक्ति से या ज्ञान-योग से, एक ही गन्तव्य की खोज करनी होती है और वह है भगवान (32.32) | जो कोई श्रद्धा तथा भक्ति-पूर्वक मेरा ध्यान करता है, मेरे विषय में सुनता तथा कीर्तन करता है वह निश्चय ही भगवान के धाम को वापस जाता है (32.43) |
मनुष्य जब इस तरह अनेकानेक वर्षो तथा अनेक जन्मो तक भक्ति में लगा रहता है तो उसे सर्वोच्च लोक ब्रह्म-लोक में भी भोग से पूर्ण विरक्ति हो जाती है और इस तरह समस्त संशयो से मुक्त हो कर वह गन्तव्य दिव्य धाम को जाता है जहाँ से वह फिर कभी नही लोटता | जीव का यही चरम सिद्धि-गन्तव्य है (27.27-29) |
अन्त में भगवान कपिल कहते हैं: हे माता! मैंने आपको जिस आत्म-साक्षात्कार का उपदेश दिया है,वह अत्यन्त सुगम है | आप बिना कठिनाई के इसका पालन कर सकती हैं और ऐसा करके आप इसी शरीर (जन्म) में मुक्त हो कर अन्त में मेरे पास पहुंचेगी | जो लोग भक्ति की इस विधि से अवगत नही हैं,वे जन्म-मरण के चक्र से बाहर नही निकल सकते (33.10-11) |
हरे कृष्णा
दण्डवत
आपका विनीत सेवक
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