Hare Krsna,
Please accept my humble obeisances. All glories to Srila Prabhupada & Srila Gopal Krishna Maharaj.
ज्ञान का अर्थ है श्री कृष्ण को जानना | गीता (15.15) में श्रीकृष्ण का वचन है- “वेदों का वास्तविक प्रयोजन मुझे जान लेना है” | ज्ञान का अर्थ आत्मा, भौतिक पदार्थ व इनके नियामक तथा उनके अंतर को जान लेना है | शरीर भौतिक पदार्थ है, यह स्थूल शरीर (जल, पृथ्वी, अग्नि, आकाश व वायु) तथा सूक्ष्म शरीर ( मन, बुद्धि व् अहंकार) से मिल कर बना हें | और शाश्वत आत्मा (आध्यात्मिक शरीर), श्रीकृष्ण का नित्य अंश है जो हृदय में परमात्मा के साथ रहता है | जिस तरह धूप या प्रकाश सूर्य की उपस्थति का प्रमाण है, उसी तरह शरीर में चेतना ही आत्मा का प्रमाण है | चेतना पदार्थ के संयोग से नहीं बनती, यह जीव का लक्षण है | आत्मा नित्य, नवीन, अविनाशी तथा शाश्वत है तथा सारे शरीर में चेतना के रूप में व्याप्त है | ज्योंही शरीर से आत्मा चला जाता है, चेतना लुप्त हो जाती है | जिस प्रकार सूर्य अकेले इस सारे ब्रहमांड को प्रकाशित करता हें, उसी प्रकार शरीर के भीतर स्थित एक आत्मा सारे शरीर को चेतना से प्रकाशित करता हें (BG.13.34) |
जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा व रोग इस भौतिक शरीर को सताते हैं | इस नश्वर शरीर के भीतर न तो आत्मा, न ही परमात्मा कभी भी विनष्ट होता है (BG.13.28) | आत्मा हृदय के भीतर स्थित है | इस आत्मा को बाल के अग्रभाग के दस हजारवें भाग के तुल्य बताया जाता है (श्वेताश्वतरउपनिषद (5.9)) | शरीर का जन्म होता है आत्मा का नहीं | शरीर जन्म लेता है, अतः उसकी मृत्यु भी निश्चित होती है और मृत्यु के पश्चात पुनुर्जन्म भी निश्चित है (BG.2.27) | लेकिन आत्मा न तो जन्म लेता है न शरीर के मारे जाने पर ही उसकी मृत्यु होती है | जो सारे शरीर में व्याप्त है उसे ही तुम अविनाशी समझो उस अव्यय आत्मा को नष्ट करने में कोई भी सक्षम नही है (BG.2.17) |
कृष्ण कहते हैं : ऐसा कभी नही हुआ, कि मैं न रहा होऊ या तुम न रहे हो और न ऐसा है कि भविष्य में हम नहीं रहेंगें | जिस प्रकार शरीर-धारी आत्मा इस शरीर में बाल्यावस्था से तरुणावस्था में और फिर वृद्धावस्था में निरंतर अग्रसर होता रहता है, उसी प्रकार मृत्यु होने पर आत्मा दूसरे शरीर में चला जाता है (BG.2.12 & 13) | जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रो को त्याग कर नए वस्त्र धारण करता है उसी प्रकार आत्मा पुराने तथा व्यर्थ के शरीरो को त्याग कर नवीन भौतिक शरीर धारण करता है (BG.2.22) |
कृष्ण गीता में कहते हैं कि सारे जीव (84 लाख योनियों मे) मेरे शाश्वत अंश रूप हैं तथा वे बीजदाता पिता हैं | अर्थात हम सब जीव कृष्ण के ही शाश्वत अंश हैं | जिस प्रकार सोने का एक कण गुण की दृष्टि से सोने की खान के ही समान है उसी प्रकार कृष्ण के सूक्ष्म अंश अर्थात हम (आत्मा) भी गुणात्मक रूप में कृष्ण के ही समान सत-चित-आनन्द हैं | जीव व परमेश्वर दोनों ही आत्मा हैं, अतैव गुणात्मक दृष्टि से समान हैं किन्तु परिमाणात्मक दृष्टि से ईश्वर महान है और जीव सूक्ष्म है जिस प्रकार समुंद्र व समुंद्र की एक बूंद, अग्नि व अग्नि का स्फुर्लिंग | भगवान हैं विभु और हम हैं अणु | यधपि अग्नि सदैव ही अग्नि है, तथापि लकड़ी के आकार के अनुसार बड़ी अथवा छोटी आकार में प्रदर्शित होती है उसी भांति गुणों में जीवात्मा परमेश्वर के ही समान है किन्तु अपने वर्तमान शरीर की सीमाओं के अनुसार अपना प्रदर्शन करती है | जीवात्मा एक शिशु के शरीर में एक व्यस्क का बल या शक्ति का प्रदर्शन नहीं कर सकती है | किन्तु अपनी माँ की गोद में भी, कृष्ण भगवान हैं तथा उन्होंने शिशु रूप में पूतना तथा अन्य असुरों का वध करके अपने बल व शक्ति का प्रदर्शन किया था |
जीव का नित्य स्वरुप दिव्य है | बारिश का जल शुद्ध होता है किन्तु भूमि का स्पर्श करते ही गन्दा हो जाता है | इसी प्रकार जीवात्मा भौतिक प्रकृति के संसर्ग में आ कर इन्द्रिय-तृप्ति में लग जाता है और ह्रदय में विराजमान परमात्मा को भूल जाता है तथा भोक्ता बन कर पाप-कर्मो का बोझ अपने ऊपर ले कर जीवन-मृत्यु के भव सागर में डूब जाता है |
शरीर नित्य परिवर्तनशील है | मनुष्य शरीर से अपनी मिथ्या पहचान करता है जो एक पिंजरे के समान है | पिंजरे की देखभाल में व्यस्त होकर अन्दर बेठे पंछी के प्रति लापरवाह हो जाता है | पिंजरे को चमकाता है लेकिन आत्मा को उसका भोजन नहीं देता | आत्मा तथा शरीर दोनों का भोजन उसी तरह अलग है, जिस प्रकार एक कार व उसके ड्राईवर का भोजन अलग है | आत्मा का भोजन है कृष्ण की भक्ति व शरीर का भोजन है भगवान को अर्पित किया गया प्रसाद | आत्मा का धर्म है श्री कृष्ण की प्रेममयी सेवा | जब शरीर से आत्मा चला जाता है तो उसे शव कहते हैं, उसे हम छोड़ दें तो चील, गीध, कव्वे, जंगली जानवर तथा कीड़े आदि उसे चट कर जाते हैं | उसी तरह हृदय में वास करने वाले परमात्मा (भगवान) को जब हम भूल जाते हैं, उनसे अपना सम्बन्ध तोड़ देते हैं तो काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ आदि हम पर कब्ज़ा कर लेते हैं | हमारा शाश्वत ज्ञान चट कर जाते हैं तथा विषय वासना में लिप्त कर के हमें अविद्या का शिकार बना देते हैं |
जो व्यक्ति मंदिर में भगवान के विग्रह का पूजन करता है किन्तु यह नहीं जानता कि परमात्मा रूप में भगवान प्रत्येक जीव के हृदय में आसीन है वह अज्ञानी है तथा ऐसा व्यक्ति है जो राख में आहुति डालता है (SB.3.29.22) | राजा सत्यव्रत मत्स्य रूप धारण करने वाले भगवान से प्रार्थना करते हुए कहते हैं: “हे प्रभु ! आप सबके परम हितेशी, प्रियतम मित्र, परम नियन्ता, परमात्मा, परम ज्ञान के दाता तथा समस्त इच्छाओं को पूरा करने वाले हैं | आप हृदय में रहते हैं किन्तु हृदय में बसी काम-इच्छाओं से मोहित होने के कारण मूर्ख जीव आपको समझ नहीं पाता” (SB.8.24.52) |
कृष्ण कहते हैं : पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा अहंकार ये आठ प्रकार से विभक्त मेरी भिन्न (अपरा, निकृष्ट या जड़) शक्ति है | इसके अतिरिक्त मेरी एक अन्य परा (उत्कृष्ट) शक्ति (जीवात्मा) अर्थात हम, जो अपने विभिन्न कार्यों के लिए अपरा शक्तियों का विदोहन करता है (BG.7.4-5) | आत्मा भगवान की तटस्था शक्ति है | भगवान द्वारा दी गई क्षुद्र स्वतन्त्रता का प्रयोग कर यह भगवान की बहिंरंगा शक्ति के प्रभाव में आकर भोगने की प्रवृति अपना लेता है और कर्म-फलों के बंधन में बंध जाता है या अंतरंगा शक्ति से जुड़ कर भगवान से अपने शाश्वत सम्बन्ध को पहचान कर उनकी प्रसन्नता के लिए काम करने लगता है |
जीवों को शरीर उस जीव की विभिन्न इच्छाओ की पूर्ति के लिए प्राप्त होता है | इच्छाओं के कारण ही जीव दुःख या सुख भोगता है | आत्मा भौतिक शरीर के संपर्क में होते हुए भी इन कार्यों से अलग रहता है, जो प्रकृति के तीनो गुणों के प्रभाव के आधीन हो कर हमारे द्वारा किये जाते हैं | आत्मा के लिए भौतिक दुखो का कोई वास्तविक अस्तित्व नही होता | भौतिक इच्छायें ही सर्वाधिक दुःख का कारण हैं और ऐसी इच्छाओ से मुक्ति सर्वाधिक सुख का कारण है | श्रीमद् भागवतम (9.19.20) में राजा ययाति अपनी पत्नी देवयानी से कहते हैं कि “भौतिक सुख चाहे अच्छा हो या बुरा, इस जीवन में हो या अगले जीवन में, इस लोक में हो या स्वर्गलोक में हो, छणिक तथा निरर्थक है | बुद्धिमान पुरुष को ऐसी वस्तुओं को भोगने या सोचने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए” |
श्रीमद् भागवतम (8.19.21) में भगवान वामन देव बलि महाराज से कहते हैं: “जिस मनुष्य की इन्द्रियाँ वश में नहीं है, उसे तीनों लोकों में इन्द्रियों को तृप्त करने के लिए जो कुछ भी है, संतुष्ट नहीं कर सकता” | तथा ब्रह्माजी कहते है: “हे प्रभु! आत्मा के लिए भौतिक दुखों का कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं होता | फिर भी जब तक जीवात्मा शरीर को इन्द्रिय तृप्ति के निमित्त देखता है तब तक वह भगवान की बहिरंगा शक्ति द्वारा प्रभावित होने से भौतिक कष्टों के पाश से बाहर नहीं निकल पाता” (SB.3.9.9) | भगवान कृष्ण उद्धव को समझाते हैं कि, यदि हम काल को सुख तथा दुख का कारण मान लें, तो भी यह अनुभव आत्मा पर लागू नही होता क्योंकि काल भगवान की आध्यात्मिक शक्ति की अभिव्यक्ति है और जीव भी उसी शक्ति का अंश है | यह निश्चित है की आग अपनी लौ या चिंगारियों को नही जलाती, न ही शीत अपने ही रूप ओलों को हानि पहुंचाती है | वस्तुतः आत्मा दिव्य है और भौतिक प्रकृति व भौतिक सुख-दुख के अनुभव से परे है (SB.11.23.55) |
श्री सूत गोस्वामी कहते हैं “जीवात्मा तीनो गुणों से अतीत होते हुए भी इस बहिरंगा शक्ति के कारण अपने आप को भौतिक पदार्थ की उपज मानता है और इस प्रकार भौतिक कष्टों के फलों को भोगता है (SB.1.7.5) | लेकिन जीव के भौतिक कष्ट,जिन्हें वह अनर्थ समझता है, भक्ति-योग द्वारा प्रत्यक्ष रूप से काम किये जा सकते हैं” (SB.1.7.6) | भौतिक जगत में जीवों के 3 शत्रु होते हैं | इच्छा, क्रोध तथा कामवासना | यह 3 शत्रु जीवों को भौतिक जगत में रहते रहने के लिए बाध्य करते हैं और जब कोई उनसे मुक्त हो जाता है वह भगवद्-धाम में प्रविष्ट होने का पात्र बन जाता है |
भगवान शक्तियों के अधीश्वर है और जीव उनका सनातन दास है, भगवान तथा जीव में यही अंतर है (CC.मध्य लीला 6.162) | हम यह शरीर नहीं हैं, बल्कि भगवान कृष्ण के हम शाश्वत अंश व नित्य दास हैं, इस भावना को जगाकर हमें अपनी मूल स्थिति को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करना चाहिए |
श्री शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित को श्रीमद् भागवतम (2.1.6) में अपना निर्णय सुनाते हैं: पदार्थ तथा आत्मा के पूर्ण ज्ञान से, योग के अभ्यास से या स्वधर्म का भलीभांति पालन करने से मानव जीवन में जो सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त की जा सकती है, वह है जीवन के अंत में भगवान का स्मरण करना |
हरे कृष्णा
दण्डवत
आपका विनीत सेवक
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