Hare Krsna,
Please accept my humble obeisance. All glories to Srila Prabhupada & Srila Gopal Krishna Maharaj.
श्रीमद् भागवतम में शुकदेव गोस्वामी कहते हैं: “सत्ययुग में बिष्णु का ध्यान करने से, त्रेता युग में यज्ञ करने से तथा द्वापर युग में भगवान के चरणकमलों की सेवा करने से जो फल प्राप्त होता है, वही कलियुग में हरे कृष्ण महामंत्र के कीर्तन द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है” (SB.12.3.52) | कलियुग में यज्ञ करना संभव नही है इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है “कलियुग में बुद्धिमान लोग भगवान के पवित्र नाम के कीर्तन का यज्ञ करेंगे” | शुक्राचार्य भगवान वामन देव की प्रार्थना करते हुए कहते हैं: “मन्त्रों के उच्चारण तथा कर्मकांड के पालन में त्रुटियाँ हो सकती हैं | देश, काल, व्यक्ति तथा सामग्री के विषय में भी कमियां रह सकती हैं | किन्तु भगवन! आपके पवित्र नाम का कीर्तन करने से हर वस्तु दोषरहित बन जाती हैं” (SB.8.23.16) | नारद मुनि श्रीमद् भागवतम में कहते हैं: “जो लोग सचमुच ज्ञानी हैं, वे इस कलियुग के असली महत्व को समझ सकते हैं | ऐसे प्रबुद्ध लोग कलियुग की पूजा करते हैं, क्योकिं इस पतित युग में जीवन की सम्पूर्ण सिद्धि संकीर्तन सम्पन्न करके आसानी से प्राप्त की जा सकती है” (SB.11.5.36) | ब्रह्माजी भगवान कृष्ण के इस धरा से अप्रकट होने से पहले स्तुति करते हुए कहते हैं: “हे प्रभु! कलियुग में पवित्र तथा संत-पुरुष जो आपके दिव्य कार्यों का श्रवण करते हैं और उसका यशोगान करते हैं, वे इस युग के अन्धकार को सरलता से लाँघ जायेंगे”(SB.11.6.24) |
कलियुग के लक्षण स्कन्द 12 अध्याय 2 व 3 में कुछ इस प्रकार बताये गए हैं:– कलियुग में धर्म, पवित्रता, दया, शाररिक बल तथा स्मरणशक्ति दिन प्रतिदिन क्षीण होते जायेंगे | एकमात्र संपत्ति को ही मनुष्य के उत्तम गुणों का लक्षण माना जायेगा | पुरुष तथा स्त्रियाँ केवल उपरी आकर्षण के कारण एकसाथ रहेंगे | जो चिकनी चुपड़ी बातें बनाने में चतुर होगा वह विद्वान् पंडित माना जायेगा | उदर-भरण जीवन का लक्ष्य बन जायेगा | धर्म का अनुसरण मात्र यश के लिए किया जायेगा | शहर में चोरों का दबदबा होगा | राजनैतिक नेता प्रजा का भक्षण करेंगे | व्यापारी लोग क्षुद्र व्यापार में लगे रहेंगे और धोखाधडी से धन कमायेंगे | मनुष्य कंजूस तथा स्त्रियों द्वारा नियंत्रित होंगे | वे अपने पिता, भाई, अन्य सम्बन्धियों तथा मित्रों को त्याग कर साले तथा सालियों की संगति करेंगे | धर्म न जानने वाले उच्च आसन पर बैठेंगे और धार्मिक सिद्धांतों पर प्रवचन करने का ढोंग रचेंगे |
श्रीमद् भागवतम (12.3.51) में शुकदेव गोस्वामी महाराज कलियुग के लक्षण बताने के बाद महाराज परीक्षित से कहते हैं: हे राजन! यधपि कलियुग दोषों का सागर है फिर भी इस युग में एक अच्छा गुण है | केवल हरे कृष्ण महामंत्र का कीर्तन करने से मनुष्य भवबंधन से मुक्त हो जाता है और दिव्य धाम को प्राप्त होता है | तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है: “कलियुग केवल नाम आधारा, जपत (सुमिर) जपत (सुमिर) नर उतरही पारा” | इसी प्रकार कलिसंतरण उपनिषद का कथन है: “हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम हरे हरे- ये सोलह नाम जो बत्तीस अक्षरों से बने हैं, कलियुग के दुष्प्रभावो को दूर करने के लिए एकमात्र साधन है |
श्रीमद् भागवतम (11.5.32) में भगवान चैतन्य महाप्रभु के कलियुग में प्रकट होने के विषय में घोषणा की गई है: कलियुग में बुद्धिमान पुरुष कृष्ण-नाम का निरन्तर गायन करने वाले ईश्वर के अवतार की पूजा करने के लिए सामूहिक कीर्तन करते हैं | यधपि उनका रंग श्याम नहीं है, किन्तु वे साक्षात् कृष्ण हैं | उनके साथ उनके पार्षद, सेवक, आयुध तथा विश्वस्त संगी रहते हैं |
भगवान चैतन्य महाप्रभु कहते हैं: कृष्ण के पवित्र नाम के कीर्तन मात्र से मनुष्य को भौतिक संसार से छुटकारा मिल सकता है | इस कलियुग में भगवन्नाम के कीर्तन से बढकर अन्य कोई धर्म नहीं है | कलियुग में अर्थात कलह तथा पाखंड के इस युग में उद्धार (मोक्ष ) के लिए, भगवान श्री कृष्ण के पवित्र नाम के जाप के अलावा कोई और उपाय नहीं है, नहीं है, नहीं है (CC.आदि लीला 7.73, 74 & 76) | कीर्तनीय: सदा हरि: अर्थात भगवान कृष्ण के नाम का सदा कीर्तन करो | जो अपने आप को घास से भी अधिक तुच्छ मानता है, जो वृक्ष से भी अधिक सहनशील है और जो किसी से सम्मान की अपेक्षा नहीं रखता फिर भी दूसरों को सम्मान देने के लिए सदा तत्पर रहता है, वह सदा भगवान के पवित्र नाम का कीर्तन सरलता से कर सकता है (CC.आदि लीला17.31) |
हरे कृष्ण महामंत्र का यह स्वभाव है कि जो कोई भी इसका जप करता है, वह श्री कृष्ण के प्रीति अपनी प्रेमभावना का अति शीघ्र विकास कर लेता है (CC.आदि लीला 7.83) | वास्तव में हरे कृष्ण महामंत्र एक प्रार्थना है जिसके द्वारा हम श्री भगवान तथा उनकी अंतरंग शक्ति से निवेदन करते हैं कि वे हमें अपनी सेवा में लगाये | यदि कोई गंभीरता तथा निष्ठा के साथ यह कहता है “हे कृष्ण! यधपि इस भौतिक संसार में मैने आपको भुला दिया था, किन्तु आज से मैं आपकी शरण ग्रहण कर रहा हूँ | कृपया मुझे अपनी सेवा में लगा ले” | तो वह तुरंत माया के पाश से मुक्त हो जाता है (CC.मध्य लीला 22.33) |
इस कलियुग में कृष्ण की आराधना की विधि यह है कि भगवान के पवित्र नाम के कीर्तन द्वारा यज्ञ किया जाए, जो बुद्धिमान ऐसा करता है वह निश्चय ही कृष्ण के चरणकमलों में शरण प्राप्त करता है (CC.अन्त्य लीला 20.9) | इस कलियुग में भगवान कृष्ण ने अपने नाम के रूप में अवतार लिया है, कलि-काले नाम-रुपे कृष्ण-अवतार (CC.आदि लीला 17.22) | इस संसार में काम, क्रोध, लोभ, मोह,घमण्ड और ईर्ष्या जैसे अनर्थ हमारे दुखों के मूल कारण है और हरे कृष्ण महामंत्र इतना शक्तिशाली है कि वह इन सब को समूल नष्ट कर सकता है | भक्ति प्रज्ज्वलित अग्नि की तरह विगत जीवन के सारे पापों के फलों को जला देती है | यदि हम निरन्तर कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन तथा भगवान कृष्ण के दासो (भक्तों) की सेवा करें, तो जल्दी ही हमें श्री कृष्ण के चरणकमलों में शरण प्राप्त हो सकेगी |
जिस प्रकार पूरी तरह साफ़ किये बिना बर्तन में रखा गया दूध फट जाता है, उसी प्रकार जब तक हम अपने चित्त को श्रीकृष्ण के पवित्र नाम के निरन्तर कीर्तन से स्वच्छ नहीं करेंगे तब तक कृष्ण का यह ज्ञान न तो हमारे हृदय में ठहरेगा, न ही भगवान वहाँ प्रकट होंगें | श्रीकृष्ण के पवित्र नाम के निरअपराध जाप से हृदय पर जन्म जन्मांतर से जमी धूल साफ़ हो जाती है, चित का दर्पण साफ़ हो जाता है (चेतो-दर्पण-मार्जनं) तथा हम अपने आप को शाश्वत आत्मा के रूप में देखने लगते हैं | पवित्र नाम के अक्षरों की इतनी आध्यात्मिक शक्ति है कि अनुचित ढंग से बोले जाने पर भी अपना प्रभाव दिखातें हैं (CC.अन्त्य लीला 3.59) | वास्तव में अपराधरहित नाम-जप से कृष्ण के चरण-कमलों के प्रति प्रेम जागृत होता है (CC.अन्त्य लीला 3.178) | जहाँ भक्तों के बीच भगवान के पवित्र नाम का श्रवण तथा कीर्तन चलता रहता है, वहाँ भगवान नारायण उपस्थित रहते हैं (SB.4.30.36) | श्रीमद् भागवतम में नारदजी युधिष्ठर को धर्म की विधि बतलाते हुए कहते हैं: “भगवान के पवित्र नाम का संकीर्तन इतना शक्तिशाली है कि इससे गृहस्थ भी उसी चरम फल को सरलता से प्राप्त कर लेते हैं, जो सन्यासियों को प्राप्त होता है” (SB.7.15.74) |
श्रीमद् भागवत (SB.5.5.1 & 3) में भगवान ऋषभदेव अपने पुत्रों को उपदेश देते हैं: “इस संसार के समस्त देहधारियो में जिसे मनुष्य देह प्राप्त हुई है, उसे इन्द्रिय-तृप्ति के लिए दिन-रात कठिन श्रम नहीं करना चाहिए क्योकि ऐसा तो मल खाने वाले सूकर-कूकर भी कर लेते हैं | जो व्यक्ति कृष्ण चेतना को पुनः जीवित करने तथा अपना ईश्वर प्रेम बढाने के इच्छुक है, वे ऐसा कुछ नहीं करते जो श्रीकृष्ण से सम्बंधित न हो | वे उन लोगों से मेलजोल नहीं बढ़ाते जो अपने शरीर पालन, भोजन, शयन तथा मैथुन आदि में व्यस्त रहते हैं | वे गृहस्थ होते हुए भी पत्नी, संतान, मित्र अथवा धन में आसक्त नहीं होते किन्तु साथ ही अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए अपने जीवन-निर्वाह के लिए जितना धन चाहिए, उतना ही संग्रह करते हैं” |
श्रीमद् भागवत (10.60.52-53) में कृष्ण रूक्मिणी से कहते हैं: विषयी लोग अपने संसारी गृहस्थ जीवन में तपस्या तथा व्रतों द्वारा मेरा आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मेरी पूजा करतें हैं | हे मानिनी, वे अभागे हैं, जो मोक्ष तथा भौतिक सम्पदा दोनों के ही स्वामी मुझ को पाकर के भी, केवल भौतिक सम्पदा के लिए ही लालायित रहते हैं | ये लाभ तो नरक में भी पाए जा सकते हैं | चूंकि ऐसे व्यक्ति इन्द्रिय-तृप्ति में ही लीन रहते हैं, इसलिए नरक ही उनके लिए उपयुक्त स्थान है |
श्रीमद् भागवतम में गोपियाँ उद्धव से कहती हैं: दरअसल सर्वोच्च सुख तो समस्त इच्छाओं का परित्याग करने में है जैसा कि पिंगला नामक वैश्या तक ने भी कहा है (SB.10.47.47) | जो व्यक्ति अपने मूल घर अर्थात भगवद्-धाम वापस जाना चाहता है, उसे निष-किंचन अर्थात समस्त भौतिक इच्छाओं से मुक्त होना चाहिए (शून्या-भिलासिता) | भौतिक वस्तुओं में आसक्ति ही हमारे दुखो की जड़ है | यदि हम उन्ही भौतिक वस्तुओ को भगवान कृष्ण की सेवा में लगा सके तो वही भगवद्-धाम पहुँचने में हमारी सहायता कर सकती हैं | हम अपने जीवन में घटने वाली प्रत्येक घटना को भगवान कृष्ण की व्यवस्था तथा अपने शुद्धिकरण करने के लिए उनकी कृपा के रूप में देखे |
शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित को अजामिल का व्याख्यान सुनाते हुए कहते हैं: “मृत्यु के समय अजामिल ने नारायण का नाम अपने पुत्र को बुलाने के उद्देश्य से किया भगवान का नाम समझकर नहीं, फिर भी उसे वैकुण्ठ प्राप्त हुआ तो फिर उनके विषय में क्या कहा जाए, जो श्रद्धा तथा आदरपूर्वक पवित्र नाम का उच्चारण करते हैं (SB.6.2.49) | यदि किसी दवा की प्रभावकारी शक्ति से अनजान व्यक्ति उस दवा को ग्रहण करता है या उसे बलपूर्वक खिलाई जाती है तो यह दवा उस व्यक्ति के जाने बिना ही अपना कार्य करेगी, क्योकि उसकी शक्ति रोगी की जानकारी पर निर्भर नहीं करती है (SB.6.2.19) | जिस प्रकार अग्नि सूखी घास को जलाकर राख कर देती है, उसी प्रकार भगवान के पवित्र नाम का जप चाहे जान कर या अनजाने में किया जाता है, यह व्यक्ति के पाप कर्मों के सभी फलों को निश्चित रूप से जलाकर राख कर देता है” (SB.6.2.18) |अजामिल के व्याख्यान में ही (SB.6.2.14) विष्णुदूत यमदूतों को समझाते हैं: “जो व्यक्ति भगवन्नाम का कीर्तन करता है उसे तुरन्त अनगिनत पापों के फलों से मुक्त कर दिया जाता है, भले ही उसने यह कीर्तन अप्रत्यक्ष रूप में, परिहास में, संगीतमय मनोरंजन के लिए अथवा उपेक्षा भाव से क्यों न किया हो” | तथा यमराज अपने दूतों को समझाते हैं: “हे मेरे प्यारे सेवकों! तुम लोग उन्हीं पापी पुरुषों को मेर पास लाना जिनकी जीभ कृष्ण के नाम तथा अलौकिक गुणों का कीर्तन नही करती, जिनके हृदय कृष्ण के चरण-कमलों का स्मरण नही करते तथा जिनके सिर एक बार भी कृष्ण के समक्ष नही झुकते” (SB.6.3.29) |
कृष्ण का पवित्र नाम, उनके दिव्य गुण, तथा उनकी दिव्य लीलाएं स्वयं भगवान कृष्ण के सामान हैं तथा सभी आध्यात्मिक व आनंदमय हैं (CC.मध्य लीला 17.135) | कृष्ण सूर्य के समान है और माया अंधकार के समान है | जैसे ही हम कृष्ण रूपी सूर्य को अपने हृदयों के भीतर उदय करने का प्रयास करते हैं अर्थात कृष्णभावनामृत अपनाते हैं,वैसे ही माया का अंधकार नष्ट हो जाता है (CC.मध्य लीला 22.31) | मनुष्य जितना अधिक हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करता है उतना ही अधिक कृष्ण के प्रीति प्रेम और सेवा भावना प्रगाढ़ होती है | कृपया अभी से ही श्री कृष्ण के चरण-कमलों की शरण ग्रहण कर लें तथा ह्रदय में कृष्ण के लिए भक्ति व प्रेम का दीपक जला कर हरे कृष्ण महामंत्र का जप करना शुरू कीजिये क्योंकि श्री कृष्ण से अपना सम्बन्ध जोड़ कर ही हम स्थायी आनन्द अर्थात भगवत्प्रेम प्राप्त कर सकते हैं तथा जीवन-मृत्यु का चक्र तोड़ कर भगवद्-धाम वापस जा सकते हैं |
श्रीमद् भागवतम (10.47.66-67) में नन्द महाराज व ग्वालें उद्धवजी से कहते हैं: “हमारे मानसिक कार्य सदैव कृष्ण के चरण-कमलों की शरण ग्रहण करें, हम सदैव उन्हीं के नाम का कीर्तन करें तथा भगवान की इच्छा से हमें अपने सकाम कर्मों के फलस्वरूप इस संसार में जहाँ भी घूमना पड़े हमारे सत्कर्म व दान हमें सदा भगवान कृष्ण का प्रेम प्रदान करें” | तथा उद्धव जी कहते हैं: “कोई भी व्यक्ति, चाहे वह अशुद्ध अवस्था में ही क्यों न हो, यदि मृत्यु के समय छण-भर के लिए भी अपने मन को भगवान में लीन कर देता है तो उसके सारे पापमय कर्मो के फल भस्म हो जाते हैं”(SB.10.46.32) |
श्रीमद् भागवतम (2.3.17) में निर्णय दिया गया है कि “उदय तथा अस्त होते हुए सूर्य सबों की आयु को क्षीण करता है, किन्तु जो व्यक्ति भगवान की कथाओं की चर्चा चलने में अपने समय का सदुपयोग करता है, उसकी आयु क्षीण नही होती” | तथा जो लोग भौतिक विश्व में भटक रहे हैं, उनके लिए भगवान कृष्ण की भक्ति से बढ़ कर मोक्ष का कोई अधिक कल्याणकारी साधन नहीं है (SB.2.2.33) |
श्रीमद् भागवतम में नारद मुनि वासुदेव को ज्ञान प्रदान करते हुए कहते हैं “भौतिक जगत में विचरण करने के लिए बाध्य किये गए देहधारी जीवों के लिए भगवान के संकीर्तन आंदोलन से बढ़ कर और कोई महान लाभ नहीं है, जिसके द्वारा वह परम शांति पा सके और अपने को बारम्बार जन्म-मृत्यु के चक्र से छुडा सके” (SB.11.5.37) | भगवन्नाम का कीर्तन बड़े से बड़े पापो के फलों को भी उन्मूलित करने में सक्षम है (SB.6.3.31) |
मैं भगवान श्री कृष्ण के चरण कमलों की शरण ग्रहण करता हूँ जिनके अवतार, गुण तथा कर्म रहस्मय अनुकरणीय हैं | जो व्यक्ति इस जीवन को छोड़ते समय अनजाने में भी उनके दिव्य नाम का आवाहन करता है, उसके जन्म-मृत्यु के पाप तुरंत धुल जाते हैं और वह भगवान को निश्चित रूप से प्राप्त करता है (SB.3.9.15) | मरणासन्न लोगों के द्वारा ध्यान किये जाने वें उन्हें अपना नित्य आध्यात्मिक स्वरुप प्रकट करते हैं (SB.12.3.50) | यदि हम भी अपने जीवन के अंतिम छण में भगवान कृष्ण या नारायण का येनकेन प्रकरैण स्मरण कर सके तो हमारा यह जीवन सफल हो जायेगा | हम इस भव-बन्धन से मुक्त हो जायेंगे और अगले जीवन में हमें कृष्ण के चरण-कमलों का आश्रय अवश्य ही प्राप्त होगा |
हरे कृष्णा
दण्डवत
आपका विनीत सेवक
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