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मार्कण्डेय द्वारा स्तुति (12.8)

35-38 ये दोनों मुनि नर तथा नारायण भगवान के साकार रूप थे। जब मार्कण्डेय ऋषि ने दोनों को देखा तो वे तुरन्त उठ खड़े हुए और तब पृथ्वी पर डंडे की तरह गिरकर अतीव आदर के साथ उन्हें नमस्कार किया। उन्हें देखने से उत्पन्न हुए आनन्द ने मार्कण्डेय के शरीर, मन तथा इन्द्रियों को पूरी तरह तुष्ट कर दिया और उनके शरीर में रोमांच ला दिया और उनके नेत्रों को आँसुओं से भर दिया। भावविह्वल होने से मार्कण्डेय उन्हें देख पाने में असमर्थ हो रहे थे। सम्मान में हाथ जोड़े खड़े होकर तथा दीनतावश अपना सिर झुकाये मार्कण्डेय को इतनी उत्सुकता हुई कि उन्हें लगा कि वे दोनों विभुओं का आलिंगन कर रहे हैं। आनन्द से रुद्ध हुई वाणी से उन्होंने बारम्बार कहा "मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।" उन्होंने उन दोनों को आसन प्रदान किये, उनके चरण पखारे और तब अर्ध्य, चन्दन-लेप, सुगन्धित तेल, धूप तथा फूल-मालाओं की भेंट चढ़ाकर पूजा की।

39-40 मार्कण्डेय ऋषि ने पुनः इन दो पूज्य मुनियों के चरणकमलों पर शीश झुकाया जो सुखपूर्वक बैठे थे और उन पर कृपा करने के लिए उद्यत थे। तब उन्होंने उनसे इस प्रकार कहा। श्री मार्कण्डेय ने कहा: हे सर्वशक्तिमान प्रभु, भला मैं आपका वर्णन कैसे कर सकता हूँ? आप प्राणवायु को जागृत करते हैं, जो मन, इन्द्रियों तथा वाकशक्ति को कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। यह सारे सामान्य बद्धजीवों पर, यहाँ तक कि ब्रह्मा तथा शिव जैसे महान देवताओं पर भी लागू होता है। अतएव यह निस्सन्देह, मेरे लिए भी सही है। तो भी, आप अपनी पूजा करनेवालों के घनिष्ठ मित्र बन जाते हैं।

41-45 हे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान, आपके ये दो साकार रूप तीनों जगतों को चरम लाभ प्रदान करने के लिए – भौतिक कष्ट की समाप्ति तथा मृत्यु पर विजय के लिए – प्रकट हुए हैं। हे प्रभु, यद्यपि आप इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि करते हैं और इसकी रक्षा करने के लिए नाना प्रकार के दिव्य रूप धारण करते हैं, किन्तु आप इसे निगल भी लेते हैं जिस तरह मकड़ी पहले जाल बुनती है और बाद में उसे निगल जाती है। चूँकि आप सारे चर तथा अचर प्राणियों के रक्षक तथा परम नियन्ता हैं, इसलिए जो भी आपके चरणकमलों की शरण ग्रहण करता है, उसे भौतिक कर्म, गुण या काल के दूषण छु तक नहीं सकते। जिन महर्षियों ने वेदों के अर्थ को आत्मसात कर रखा है, वे आपकी स्तुति करते हैं। आपका सान्निध्य प्राप्त करने के लिए वे हर अवसर पर आपको नमस्कार करते हैं, निरन्तर आपको पूजते हैं और आपका ध्यान करते हैं। हे प्रभु, ब्रह्मा भी, जोकि ब्रह्माण्ड की पूरी अवधि तक अपने उच्च पद का भोग करता है, काल की गति से भयभीत रहता है। तो उन बद्धजीवों के बारे में क्या कहा जाय जिन्हें ब्रह्मा उत्पन्न करते हैं। वे अपने जीवन के पग-पग पर भयावने संकटों का सामना करते हैं। मैं इस भय से छुटकारा पाने के लिए आपके चरणकमलों की जो साक्षात मोक्ष –स्वरूप हैं, शरण ग्रहण करने के सिवाय और कोई साधन नहीं जानता। इसलिए मैं भौतिक शरीर तथा उन सारी वस्तुओं से, जो मेरी असली आत्मा को प्रच्छन्न करती हैं, अपनी पहचान का परित्याग करके आपके चरणकमलों की पूजा करता हूँ। ये व्यर्थ, अयथार्थ तथा क्षणिक आवरण, आपसे जिनकी बुद्धि समस्त सत्य को समेटे हुये है, पृथक होने की मात्र कल्पनाएँ हैं। परमेश्वर तथा आत्मा के गुरु स्वरूप आपको प्राप्त करके मनुष्य प्रत्येक वांछित वस्तु प्राप्त कर लेता है। हे प्रभु, हे बद्धजीव के परम मित्र, यद्यपि इस जगत की उत्पत्ति, पालन और संहार के लिए आप सतो, रजो तथा तमोगुणों को जो आपकी मायाशक्ति हैं, स्वीकार करते हैं? किन्तु बद्धजीवों को मुक्त करने के लिए आप सतोगुण का प्रयोग करते हैं। अन्य दो गुण उनके लिए मात्र कष्ट, मोह तथा भय लाने वाले हैं।

46-48 हे प्रभु, चूँकि निर्भीकता, आध्यात्मिक सुख तथा भगवदधाम – ये सभी सतोगुण के द्वारा ही प्राप्त किये जाते हैं इसलिए आपके भक्त इसी गुण को आपकी प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति मानते हैं, रजो तथा तमोगुण को नहीं। इस तरह बुद्धिमान व्यक्ति आपके प्रिय दिव्य रूप को, जोकि शुद्ध सत्त्व से बना होता है, आपके शुद्ध भक्तों के आध्यात्मिक स्वरूपों के साथ पूजा करते हैं। मैं उन भगवान को सादर नमस्कार करता हूँ। वे ब्रह्माण्ड के सर्वव्यापक तथा सर्वस्व हैं और इसके गुरु भी हैं। मैं भगवान नारायण को नमस्कार करता हूँ जो ऋषि के रूप में प्रकट होनेवाले परम पूज्य देव हैं। मैं सन्त स्वभाव वाले नर को भी नमस्कार करता हूँ जो मनुष्यों में सर्वश्रेष्ठ हैं, जो पूर्ण सात्विक हैं, जिनकी वाणी संयमित है और जो वैदिक वाड्मय के प्रचारक हैं। भौतिकतावादी की बुद्धि उसकी धोखेबाज इन्द्रियों की क्रिया से विकृत रहती है, इसलिए वह आपको तनिक भी पहचान नहीं पाता यद्यपि आप उसकी इन्द्रियों तथा हृदय में और उसकी अनुभूति की वस्तुओं में सदैव विद्यमान रहते हैं। मनुष्य का ज्ञान आपकी माया से आवृत होते हुए भी, यदि वह, सबों के गुरु आपसे, वैदिक ज्ञान प्राप्त करता है, तो वह आपको प्रत्यक्ष रूप से समझ सकता है।

49 हे प्रभु, केवल वैदिक ग्रन्थ ही आपके परम स्वरूप का गुह्य ज्ञान प्रकट करने वाले हैं, अतएव भगवान ब्रह्मा जैसे महान विद्वान भी आगमन विधियों द्वारा आपको समझने के प्रयास में मोहित हो जाते हैं। दार्शनिक अपने विशेष चिन्तनपरक निष्कर्ष के अनुसार आपको समझता है। मैं उन परम पुरुष की पूजा करता हूँ जिनका ज्ञान बद्धात्माओं के आध्यात्मिक स्वरूप को आवृत करने वाली शारीरिक उपाधियों से छिपा हुआ है।

-- :: हरि ॐ तत सत :: --

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श्रीकृष्ण शरणम ममः श्रीकृष्ण शरणम ममः श्रीकृष्ण शरणम ममः श्रीकृष्ण शरणम ममः

जनम जनम के पाप कटे – भरम के बादल दूर हटे जो मुख से इक बार रटे – श्रीकृष्ण शरणम ममः

श्रीकृष्ण शरणम ममः श्रीकृष्ण शरणम ममः श्रीकृष्ण शरणम ममः श्रीकृष्ण शरणम ममः

तीन शब्द का ये संगीत – मुक्ति दिलाने वाला गीत इसको गाकर जग को जीत – श्रीकृष्ण शरणम ममः

श्रीकृष्ण शरणम ममः श्रीकृष्ण शरणम ममः श्रीकृष्ण शरणम ममः श्रीकृष्ण शरणम ममः

काम-क्रोध मद भस्म करे – लोभ मोह के प्राण हरे जो मुख में ये मंत्र धरे श्रीकृष्ण शरणम ममः

श्रीकृष्ण शरणम ममः श्रीकृष्ण शरणम ममः श्रीकृष्ण शरणम ममः श्रीकृष्ण शरणम ममः

गले में तुलसी की माला – अधर पे भक्ति का प्याला मन में प्रभु का उजियाला – श्रीकृष्ण शरणम ममः

श्रीकृष्ण शरणम ममः श्रीकृष्ण शरणम ममः श्रीकृष्ण शरणम ममः श्रीकृष्ण शरणम ममः

कलयुग में ये है वरदान – जन जन का करता कल्याण वैष्णव जन का मंत्र महान - श्रीकृष्ण शरणम ममः

श्रीकृष्ण शरणम ममः श्रीकृष्ण शरणम ममः श्रीकृष्ण शरणम ममः श्रीकृष्ण शरणम ममः

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श्री भागवत भगवान की है आरती – पापियों को पाप से है तारती

ये अमर ग्रन्थ, ये मुक्ति पन्थ, ये पंचम वेद निराला – नव ज्योति जगानेवाला

हरि नाम यही, हरि धाम यही, – यह जग मंगल की आरती, पापियों को पाप से है तारती

श्री भागवत भगवान की है आरती – पापियों को पाप से है तारती

ये शान्ति गीत, पावन पुनीत, पापों को मिटानेवाला – हरि दर्श दिखानेवाला

है सुख करणी, है दुख हरिणी – श्री मधुसूदन की आरती, पापियों को पाप से है तारती

श्री भागवत भगवान की है आरती – पापियों को पाप से है तारती

ये मधुर बोल, जग फन्द खोल, सन्मार्ग दिखानेवाला – बिगड़ी को बनानेवाला

श्री राम यही, घनश्याम यही – प्रभु की महिमा की आरती, पापियों को पाप से है तारती

श्री भागवत भगवान की है आरती – पापियों को पाप से है तारती

(समर्पित एवं सेवारत - जगदीश चन्द्र चौहान)

 

 

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