"शक्तिशाली को क्रोध की सत्यता को जानना चाहिये। अच्छाई को स्वीकार करें और यथार्थ को जानें। दुनिया का जो कुछ है – सब अमर, अनुपम और अनश्वर नहीं है, ऐसा समझें। जिसने अपने दिल पे काबू पा लिया है, उसकी आँखों में सारा संसार घास के बराबर तुच्छ है और बाल के बराबर अपवित्र है।
वह मालिक ख़ुद हीं हमारे अंदर अपना मौहब्बत, अपने से मिलने कि शौक पैदा करता है। यदि वह परमात्मा ख़ुद हमारे अंदर अपने इश्क़ (अनुराग) का बीज नहीं बोता, तो हमें कभी भी उसका ख़्याल (विचार) नहीं आ सकता।
आप भजन में बैठते हैं; परंतु आपको भजन में बैठाने वाला कोई और हीं है, आप ख़ुद नहीं?
मन को काबू में करना बहुत ही मुश्किल है। इसको रोकने और इसकी चंचलताई को दूर करने के लिए सब से उत्तम तरीका योग है, और योग में भी सुरत-शब्द-योग है। सुरत-शब्द-योग एक उत्तम अभ्यास है और इसी वास्ते इस अभ्यास को सभी ब्रह्मज्ञानियों ने रूहानी तरक्की का राजशाही मार्ग माना है और सुरत-शब्द-योग से मशहूर व प्रसिद्ध हुए हैं। "--------परम सन्त बाबा देबी साहब (मुरादाबाद वाले) भारत
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