प्रश्न : क्यों मंदिरों में अधिक दान करने वालों के लिए विशेष पंक्ति होती है? क्या भगवान के घर में सब एक समान नहीं हैं?
उत्तर : यह प्रश्न जन्माष्टमी के दिन किसी व्यक्ति ने मुझसे पूछा । उस समय तो मैंने उसको संछिप्त में समझा दिया परन्तु यह प्रश्न कई बार मैंने सुना है और लोगों को विचलित होते हुए भी देखा है । अगर हम शांत मन से निम्नलिखित बिन्दुओं पर विचार करें तो निश्चित ही अगली बार से हमारी दर्शन करने की प्रतीक्षा के समय भावना एवं मन विचलित नहीं होंगे ।
भगवद् गीता 4.11 के अनुसार भगवान् के समक्ष जो जैसा भाव लेकर आता है, भगवान उसके साथ वैसा ही आदान-प्रदान करते हैं । क्यों क्योंकी वे पत्थर की मूर्ति नहीं हैं अपितु व्यक्तिगत आदान प्रदान करने वाले परम पुरुष हैं।
इसलिए जो अधिक सेवा करते हैं भगवान् उनके ऊपर अधिक कृपा करते हैं। भगवान को वह वस्तु (धन) अर्पण करना जो हमें अति प्रिय है, भी एक महत्वपूर्ण सेवा है। धनराशि दान करना भी सेवा ही है और भगवान् उस सेवा के लिए स्वाभाविक रूप से आदान प्रदान भी करते हैं ।
हम यह कह सकते हैं कि मंदिरों में की गयी पक्षपाती व्यवस्था पंडो-पुजारियों द्वारा की जाती है ताकि धनवान लोग अधिक धनराशि दान करें । अगर इस बात को सही भी मान लें तो भी यह भगवान के पारस्परिक आदान-प्रदान वाले कथन के आधार पर उचित ही है ।
एक महत्वपूर्ण बात यह है कि भगवान किसी दानी के लिए अपने आशीर्वाद बचा कर नहीं रखते । और ऐसा भी नहीं है कि जो दान देकर तुरंत दर्शन कर लेते हैं उनको बड़े और अधिक आशीर्वाद देते हैं । अंततः भगवान हमारे हृदय की भावनाओं को देखते हैं । अगर कोई अधिक दान देने के अभिमान के साथ भगवान के समक्ष जाता है तो उसे उतनी कृपा नहीं मिलेगी जितनी उसको जोकि नम्रतापूर्वक कतार में खड़ा होकर भगवान के समक्ष जाता है । यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम भगवान को कितने समय तक अपने हृदय में बाँध कर रखते हैं । हम कतार में खड़े रहकर दर्शन के पहले आतुरता और दर्शन के बाद कृतज्ञता दिखाकर भगवान से अनुग्रह प्राप्त कर सकते हैं ।
जब हम विनम्रतापूर्वक कतार में खड़े होते हैं तो भले ही हम भगवान के दर्शन न कर पा रहे हों परन्तु वे हमको देख रहे होते हैं । अगर हम अधिक दान देने में सक्षम नहीं हैं तो भी हम भगवान को उतनी ही मूल्यवान वस्तु, अपना समय, दान कर रहे हैं । धैर्यपूर्वक कतार में खड़े रहकर हम भगवान को अपना मूलयवान समय दान कर रहे हैं । भगवान सर्वज्ञ हैं और वे पर्याप्त मात्र में हर प्रकार के दान का फल देते हैं । मात्र इसलिए कि कुछ लोगो को जल्दी दर्शन मिल गया तो उन्हें ही सारी कृपा भी मिल गयी, ये धारणा गलत है । भगवान की कृपा सबके लिए है ।
धन एवं समय, हमारे द्वारा भगवान को दिए गए भक्तिमय समर्पण हैं। कुछ लोग अधिक धन और कम समय अर्पण करते हैं और कुछ लोग अधिक समय और कम धन। परन्तु भगवान दोनों द्वारा अर्पित दान स्वीकार करते हैं । हम एक भक्तिमय स्वभाव उत्पन्न करके मन में उठ रहे इस प्रकार के विकार को दूर कर सकते हैं और भगवान की कृपा प्राप्त कर सकते हैं ।
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