--आत्मनिवेदन--
भजन-भक्तिविनोद ठाकुर
मानस, देह, गेह जो किछु मोर ।
अर्पिलु तुया पदे नंदकिशोर ॥
सम्पदे-विपदे, जीवने-मरणे ।
दाय मम गेला, तुया ओ-पद वरणे ॥
मारबि-राखबि, जो इच्छा तोहार ।
नित्यदास प्रति, तुया अधिकार ॥
जन्माओबी मोय यदि इच्छा तोर ।
भक्त-गृहे जनि जन्म हउ मोर ॥
कीट जन्म हउ यथा तुया दास ।
बहिर्मुख ब्रह्म-जन्मे नाही आस ॥
भुक्ति-मुक्ति-स्पृहा-विहीन ये भक्त ।
लभइते ताँ'क संग अनुरक्त ॥
जनक, जननी, दयित, तनय ।
प्रभु गुरु, पति तुँहु सर्वमय ॥
भक्तिविनोद कहे सुन कान ।
राधानाथ ! तुँहु आमार पराण ॥
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अनुवाद:
हे नंदकिशोर ! मैंने अपना मन, शरीर तथा घर जो कुछ भी है, सब आपके चरणकमलों में अर्पण कर दिया है ।
अब मेरे सुख-दुःख, जन्म-मरण का दायित्व समाप्त हो गया क्योंकि अब मैंने आपके चरणकमलों का वरण कर लिया है ।
हे प्रभो! अब तो इस दास पर आपका पूरा अधिकार है । आप चाहें तो इस दास को मार दीजिये या जीवित रखिये, जैसी आपकी इच्छा हो वैसे कीजिये ।
यदि मुझे दोबारा जन्म भी दें तो कृपा करके किसी भक्त के घर में दें ।
आपसे बहिर्मुख होकर मुझे ब्रह्मा जैसा जन्म भी नहीं चाहिए परन्तु जहाँ आपके प्रिय भक्त हों वहां एक कीड़े का जन्म भी स्वीकार है ।
प्रभु मुझ पर ऐसी कृपा करें कि भोग एवं मुक्ति रूपी कपटता से रहित शुद्ध भक्तों के चरणों में मेरा मन अनुरक्त रहे ।मेरे तो पिता-माता, प्रियतम, पुत्र, प्रभु, गुरु तथा पति सब कुछ आप ही हैं ।
भक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं, "हे राधानाथ ! आप मेरे प्राण स्वरुप हैं ।"
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राधा रसिकराज दास
आध्यात्मिक सुविज्ञ एवं सलाहकार
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