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बंगाल के कुलीना ग्राम से पुरी आये भक्तों में से एक ने गत वर्ष किये प्रश्न को दोहराया :
वास्तव में वैष्णव कौन है और उसके लक्षण क्या होते हैं ?

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, “उत्तम श्रेणी का वैष्णव वो है जिसकी मात्र उपस्थिति ही अन्य लोगों को हरिनाम उच्चारण करने के लिए प्रेरित कर दे ।” – चै. च. मध्य १६.७४

अपनी उपस्थिति के माध्यम से प्रचार करने वाले वैष्णवों को अपनी वेशभूषा को लेकर सदैव यह स्मरण रहना चाहिए :

१. हमें वैष्णव वेशभूषा को धारण करने करने में कोई समझौता नहीं करना चाहिए। हम श्रील प्रभुपाद के प्रतिनिधि हैं इसलिए हमें प्रथम श्रेणी का प्रतिनिधित्व करना चाहिए ।

२. हमें आदर्श वेशभूषा के वास्तविक प्रामाणिक मानदंड पता होने के साथ पालन एवं प्रचार करना चाहिए । कलियुग में हम आसानी से पथ से विचलित हो जाते हैं इसलिए सावधान रहना आवश्यक है ।

३. उचित वैष्णव वेशभूषा हमें अपनी पहचान और श्रील प्रभुपाद एवं अन्य वैषण्वों की सेवा के लिए उचित चेतना बनाये रखने में सहायता करती है ।

४. कई बार प्रथम दृष्टि में हमारी वेशभूषा का गहरा प्रभाव पड़ता है जो लोगों को आकर्षित करता है और प्रचार में लाभदायक भी है ।

५. वैष्णव के दर्शन मात्र से एक बद्ध जीव पवित्र हो जाता है ।

पूज्य सत्स्वरूप दास गोस्वामी बताते हैं :
श्रील प्रभुपाद एक वृन्दावनवासी की भांति वेशभूषा पहने हुए थे । उन्होंने कंठी-माला एवं एक साधारण सी सूती की धोती पहनी हुयी थी और अपने साथ जप-माला और शाल लेकर चले थे । उनका रंग सुनहरा, सर मुंड़ा हुआ जिसके पीछे एक शिखा थी, और माथे पर सफ़ेद वैष्णव तिलक सुसज्जित था । उन्होंने भारत में सामान्यतः साधुओं द्वारा पहनी जाने वाली सफ़ेद चप्पल पहनी हुयी थी । परन्तु न्यूयॉर्क में किसीने न प्रत्यक्ष न ही सपने में भी ऐसे वैष्णव को देखा होगा । वे संभवतः न्यूयॉर्क में आने वाले प्रथम वैष्णव सन्यासी होंगे जिन्होंने अपनी वेशभूषा से समझौता नहीं किया था । परन्तु न्यूयॉर्क निवासी किसी भी अनोखे भेष की ओर अधिक ध्यान नहीं देते थे । – प्रभुपाद लीलामृत द्वितीय खंड

मुस्लिम के कारखाने में तिलक लगाये हुए एक वैष्णव का प्रकरण-
एक समय भारत में एक कारखाना था जिसमे सारे कर्मचारी हिन्दू थे और उसमे भी अधिकतर वैष्णव। सभी वैष्णवों को तिलक लगाने एवं अन्य वैष्णव वेशभूषा पहनने की छूट थी। परंतु कुछ समय पश्चात् उस कारखाने का प्रबंधन बदल गया और कार्य संचालन एक मुस्लिम ने संभाल लिया। कारखाने का कार्यभार सँभालने के बाद उस मुस्लिम ने यह घोषणा कर दी कि कारखाने में वैष्णव तिलक लगा कर आना मना है। अधिकतर कर्मचारियों ने घोषणा का पालन किया और निर्धारित दिन बिना तिलक लगाये कारखाने में आये। परंतु एक कर्मचारी ने निश्चय किया कि वह भगवान कृष्ण पर निर्भर रहेगा और तिलक लगा कर आया। सारे कर्मचारियों को एकत्रित देखकर मुस्लिम मालिक ने कहा, “यह साहसी व्यक्ति है इसलिए केवल इसे वैष्णव तिलक लगाकर आने की अनुमति है, अन्यों को नहीं।
– श्रील प्रभुपाद लीलामृत

इस प्रकार श्रील प्रभुपाद भक्तों का उत्साहवर्धन करते थे ताकि वे बिना किसी ठोस कारण के वैष्णव तिलक (या वेशभूषा) का त्याग न करें। जहाँ परिस्थिति प्रतिकूल हो वहां पर तिलक न लगाकर कम से कम विष्णु मंत्रोच्चारण करके जल से तिलक कर लें। परंतु अनुकूल परिस्थितियों में भक्तो को कतई वैष्णव वेशभूषा, तिलक या जपमाला का त्याग नहीं करना चाहिए।

पूज्य सत्स्वरूप दास गोस्वामी द्वारा इस कथा पर टिपण्णी:
इस कहानी का आज के आधुनिक समय में स्पष्ट प्रयोग है। १९६६ में जब रूपानुग और सत्स्वरूप हठपूर्वक न्यूयॉर्क कल्याण विभाग के अपने कार्यालय में तिलक लगाकर गए तो श्रील प्रभुपाद इस से अति प्रसन्न हुए। भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर जी की भी इच्छा थी कि एक दिन जब उच्च न्यायलय के न्यायाधीश भी तिलक लगाकर आएंगे तो यह संसार मे कृष्ण भावनामृत के सफल प्रभाव का प्रतीक होगा। उन कार्यालयों में जहाँ पर तिलक लगाना वर्जित है भक्तों को चाहिए कि वे भगवान कृष्ण को स्मरण करने के अन्य उपाय खोजें।
भक्तों को हर समय तिलक लगाकर रखना चाहिए। श्रील प्रभुपाद द्वारा सुनाये गए इस प्रकरण से अभक्त कर्मियों द्वारा संचालित कार्यालयों में कार्यरत सभी भक्तों को प्रेरणा मिलती है। किसी न किसी तरह हमें वैष्णव भक्त बनकर ही सबके समक्ष अपने आप को प्रस्तुत करना है।

(गौड़ीय वैष्णव शिखा डेढ़ इंच चौड़ी होती है। इस से बड़ी शिखा यानि कोई अन्य संप्रदाय…और वह भी गांठ बंधी होनी चाहिए।
– प्रभुपाद लीलामृत पंचम खंड )

राधा रसिकराज दास

आध्यात्मिक सुविज्ञ एवं सलाहकार 

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