श्री लोकनाथ गोस्वामी का जन्म अद्वैत आचार्य के शिष्य श्री पद्मनाभ भट्टाचार्य एवं सीता देवी के पुत्र के रूप में बांग्लादेश के जेस्सोर प्रान्त के तालखरी गाँव में हुआ था ।
गौरांग महाप्रभु के निकटतम भक्त शुद्ध भक्ति में लीन थें। उनमे से लोकनाथ गोस्वामी सभी गोस्वामियों में वरिष्ठ थे।
लोकनाथ गोस्वामी नाम और प्रसिद्धि के विरुद्ध थे इसलिए उन्होंने कृष्ण दास कविराज गोस्वामी को चैतन्य चरितामृत में अपना नाम डालने से मना किया था ।
वे पूरी तरह से वृन्दावन धाम से आसक्त थे । दिव्य राधा विनोदजी उनके ह्रदय में लीला करते थे । उनके कान श्रीमद भागवत सुनने के लिए व्याकुल रहा करते और अगर कोई व्यक्ति श्रीमद भागवत पढता तो वे उसे अपना मित्र बताते थे ।
लोकनाथ गोस्वामी गृहस्थ आश्रम त्यागकर जब श्री चैतन्य महाप्रभु से मिले तो उन्होंने कहा कि मैं स्वयं भी संन्यास लेकर वृन्दावन जाने वाला हूँ । महाप्रभु से अनेक निर्देश लेकर लोकनाथ गोस्वामी भारी मन से वृन्दावन की ओर चले । उनकी यह अवस्था देखकर भूगर्भ गोस्वामी भी उनके साथ हो लिए । वृन्दावन पहुँच कर लोकनाथ गोस्वामी को महाप्रभु से विरह सताने लगा तो वे उनसे मिलने निकल पड़े । उन्हें पता चला कि महाप्रभु संन्यास लेकर पुरी से दक्षिण भारत की यात्रा पर निकले हैं तो वे भी पीछे पीछे चल पड़े । जब वे वहां पहुंचे तो उन्हें पता लगा कि....आगे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
राधा रसिकराज दास
आध्यात्मिक सुविज्ञ एवं सलाहकार
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