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श्री गुरु गौरांग जयतः

श्रीमद भगवद्गीता यथारूप

अध्याय सोलह दैवी तथा आसुरी स्वभाव

https://www.youtube.com/watch?v=rRbu5iyv2dc

1-3. भगवान ने कहा—हे भरतपुत्र ! निर्भयता, आत्मशुद्धि, आध्यात्मिक ज्ञान का अनुशीलन, दान, आत्म-संयम, यज्ञपरायणता, वेदाध्ययन, तपस्या, सरलता, अहिंसा, सत्यता, क्रोधविहीनता, त्याग, शांति, छिद्रान्वेषण में अरुचि, समस्त जीवों पर करुणा, लोभविहीनता, भद्रता, लज्जा, संकल्प, तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, ईर्ष्या तथा सम्मान की अभिलाषा से मुक्ति—ये सारे दिव्य गुण हैं, जो दैवी प्रकृति से सम्पन्न देवतुल्य पुरुषों में पाये जाते हैं।

4. हे पृथापुत्र ! दंभ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोरता तथा अज्ञान—ये आसुरी स्वभाव वालों के गुण हैं।

5. दिव्य गुण मोक्ष के लिए अनुकूल हैं और आसुरी गुण बंधन दिलाने के लिए हैं। हे पांडुपुत्र ! तुम चिंता मत करो, क्योंकि तुम दैवी गुणों से युक्त होकर जन्मे हो।

6. हे पृथापुत्र ! इस संसार में सृजित प्राणी दो प्रकार के हैं—दैवी तथा आसुरी। मैं पहले ही विस्तार से तुम्हें दैवी गुण बतला चुका हूँ। अब मुझसे आसुरी गुणों के विषय में सुनो।

7. जो आसुरी हैं, वे यह नहीं जानते कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। उनमें न तो पवित्रता, न उचित आचरण और न ही सत्य पाया जाता है।

8. वे कहते हैं कि यह जगत मिथ्या है, इसका कोई आधार नहीं है और इसका नियमन किसी ईश्र्वर द्वारा नहीं होता। उनका कहना है कि यह कामेच्छा से उत्पन्न होता है और काम के अतिरिक्त कोई अन्य कारण नहीं है।

9. ऐसे निष्कर्षों का अनुगमन करते हुए आसुरी लोग, जिन्होंने आत्म-ज्ञान खो दिया है और जो बुद्धिहीन हैं, ऐसे अनुपयोगी एवं भयावह कार्यों में प्रवृत्त होते हैं जो संसार का विनाश करने के लिए होता है।

10. कभी न संतुष्ट होने वाले काम का आश्रय लेकर तथा गर्व के मद एवं मिथ्या प्रतिष्ठा में डुबे हुए आसुरी लोग इस तरह मोहग्रस्त होकर सदैव क्षणभंगुर वस्तुओं के द्वारा अपवित्र कर्म का व्रत लिए रहते हैं।

11-12. उनका विश्वास है कि इंद्रियों की तुष्टि ही मानव सभ्यता की मूल आवश्यकता है। इस प्रकार मरणकाल तक उनको अपार चिंता होती रहती है। वे लाखों इच्छाओं के जाल में बंधकर तथा काम और क्रोध में लीन होकर इंद्रियतृप्ति के लिए अवैध ढंग से धनसंग्रह करते हैं। 13-15. आसुरी व्यक्ति सोचता है, आज मेरे पास इतना धन है और अपनी योजनाओं से मैं और अधिक धन कमाऊँगा। इस समय मेरे पास इतना है किन्तु भविष्य में यह बढ़कर और अधिक हो जायेगा। वह मेरा शत्रु है और मैंने उसे मार दिया है और मेरे अन्य शत्रु भी मार दिए जाएंगे। मैं सभी वस्तुओं का स्वामी हूँ। मैं भोक्ता हूँ। मैं सिद्ध, शक्तिमान तथा सुखी हूँ। मैं सबसे धनी व्यक्ति हूँ और मेरे आसपास मेरे कुलीन संबंधी हैं। कोई अन्य मेरे समान शक्तिमान तथा सुखी नहीं है। मैं यज्ञ करूंगा, दान दूंगा और इस तरह आनंद मनाऊँगा। इस प्रकार ऐसे व्यक्ति अज्ञानवश मोहग्रस्त होते रहते हैं।

16. इस प्रकार अनेक चिंताओं से उद्विग्न होकर तथा मोहजाल में बंधकर वे इंद्रियभोग में अत्यधिक आसक्त हो जाते हैं और नरक में गिरते हैं।

17. अपने को श्रेष्ठ मानने वाले तथा सदैव घमंड करने वाले, संपत्ति तथा मिथ्या प्रतिष्ठा से मोहग्रस्त लोग किसी विधि-विधान का पालन न करते हुए कभी-कभी नाममात्र के लिए बड़े ही गर्व के साथ यज्ञ करते हैं।

18. मिथ्या अहंकार, बल, दर्प, काम तथा क्रोध से मोहित होकर आसुरी व्यक्ति अपने शरीर में तथा अन्यों के शरीर में स्थित भगवान से ईर्ष्या और वास्तविक धर्म की निंदा करने लगते हैं। 19. जो लोग ईर्ष्यालु तथा क्रूर हैं और नराधम हैं, उन्हें मैं निरंतर विभिन्न आसुरी योनियों में, भवसागर में डालता रहता हूँ।

20.हे कुन्तीपुत्र !ऐसे व्यक्ति आसुरी योनि में बारंबार जन्म ग्रहण करते हुए कभी भी मुझ तक पहुँच नहीं पाते। वे धीरे-धीरे अत्यंत अधम गति को प्राप्त होते हैं।

21. इस नरक के तीन द्वार हैं—काम, क्रोध तथा लोभ। प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि इन्हें त्याग दे, क्योंकि इनसे आत्मा का पतन होता है।

22. हे कुन्तीपुत्र ! जो व्यक्ति इन तीनों नरक-द्वारों से बच पाता है, वह आत्म-साक्षात्कार के लिए कल्याणकारी कार्य करता है और इस प्रकार क्रमशः परम गति को प्राप्त होता है।

23. जो शास्त्रों के आदेशों की अवहेलना करता है और मनमाने ढंग से कार्य करता है, उसे न तो सिद्धि, न सुख न ही परमगति की प्राप्ति हो पाती है।

24. अतएव मनुष्य को यह जानना चाहिए कि शास्त्रों के विधान के अनुसार क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य है। उसे ऐसे विधि-विधानों को जानकर कर्म करना चाहिए जिससे वह क्रमशः ऊपर उठ सके।

(समर्पित एवं सेवारत --- जगदीश चन्द्र चौहान)

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