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परतत्त्व : ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान

जो लोग निराकार ब्रह्म तथा अंतर्यामी परमात्मा के प्रति आसक्त होते हैं, वे भी आंशिक रूप से कृष्णभावनाभावित हैं क्योंकि निराकार ब्रह्म का उद्गम श्री कृष्ण के दिव्य शरीर से निकलने वाली तेजस्वी किरणें ही हैं, और परमात्मा कृष्ण का सर्व्यापी आंशिक अवतार होता है । इस प्रकार निर्विशेषवादी तथा ध्यानयोगी भी अपरोक्ष रूप से कृष्णभावनाभावित होते हैं । प्रत्यक्ष कृष्णभावनाभावित व्यक्ति सर्वोच्च योगी होता है क्योंकि ऐसा भक्त जानता है कि ब्रह्म और परमात्मा क्या है । उसका परमसत्य विषयक ज्ञान पूर्ण होता है। जबकि निर्विशेषवादी और ध्यानयोगी अपूर्ण रूप से कृष्णभावनाभावित होते हैं । – श्रीमद भगवद्गीता ६.१० (तात्पर्य)

BrahmParamatmaBhagwan

ब्रह्म : भगवान श्री कृष्ण सत्, चित्त, आनंद के विग्रह स्वरुप, सर्व कारणों के कारण हैं । उनका परम सत्य ब्रम्ह स्वरुप सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है । जिस तरह हम जीवात्मा की चेतना सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त हो उसी तरह भगवान की चेतना सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है । कुछ योगी भगवान की अदृश्य एवं अवर निराकार ब्रह्मज्योति में विलय होना चाहते हैं । वैसे तो निराकार ब्रह्म की अवधारणा, आध्यात्मिक है परन्तु वे योगी परम पुरुषोत्तम भगवान के सर्वोच्च स्तर को नहीं पाते क्योंकि निराकार ब्रह्म, पूर्ण पुरुषोत्तम के आधीन है।
ब्रह्मसूत्र में ब्रह्म की उपमा सूर्य की किरणों से की गयी है । सूर्य के समान तेजस्वी परम पुरुषोत्तम भगवान से निकलता तेज ही निराकार ब्रह्म है, और निराकार ब्रह्म, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान की अपूर्ण अनुभूति है ।

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परमात्मा : परम सत्य भगवान अणु एवं परमाणु में भी परमात्मा स्वरुप में विद्यमान हैं । इस स्वरुप में वे पूर्ण सुसज्जित चतुर्भुज वेश में प्रकट “परमात्मा” कहलाते हैं । हर परमाणु एवं उसके बीच के रिक्त स्थानों में भी वे उपस्थित हैं । अपने परमाणु स्वरुप में भगवान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के कण कण में व्याप्त हो जाते हैं । इतने व्यापक होने के कारण वे कई भागों में बंट जाते हैं और सम्पूर्ण सृष्टि के कण और उनके बीच के रिक्त स्थान के भी एकमात्र उद्गम के रूप में सर्वज्ञ रहते हैं । परमात्मा के रूप में भी भगवान का साक्षात्कार अपूर्ण है परन्तु कृष्णभावनाभावित योगी सत्य दृष्टा होने के कारण सबके हृदय में भगवान कृष्ण का परमात्मा स्वरुप देखते हैं ।

As they surrender bhagwaan Krishna Vindavan

भगवान : परम सत्य, हर परिस्थिति में अपने पूर्ण पुरुषोत्तम स्वरुप में सदैव विद्यमान रहता है, जिन्हे हम भगवान कहते हैं । संस्कृत शब्त “भगवान’ के विषय में श्रीमद भगवद्गीता में स्पष्ट किया गया है कि, वे जो “सम्पूर्ण धन के स्वामी”, “सबसे बलवान”, “सबसे सुन्दर”, “सम्पूर्ण ज्ञानी”, “सबसे अधिक प्रसिद्ध” और “सबसे अधिक त्यागी” हो । कई ऐसे व्यक्ति हैं जो धनी, सुन्दर, बलवान, ज्ञानी या प्रसिद्ध हो सकते हैं परन्तु कोई भी पूरी तरह से यह दावा नहीं कर सकता की यह सब उसके पास पूर्ण रूप से हैं । यह दावा मात्र श्री कृष्ण ही कर सकते हैं क्योंकि वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान हैं । एकमात्र कृष्ण के अलावा कोई और, स्वयं ब्रह्मा, शिव, नारायण अन्य जीव सम्पूर्ण रूप से इन ऐश्वर्यों से युक्त होने का दावा नहीं कर सकते । ऐसा योगी जिसने भगवान के इस साकार स्वरुप का आत्मसाक्षात्कार कर लिया है वह दिव्य ज्ञान का सर्वोच्च स्तर प्राप्त कर चूका है।

प्रेषित:

राधा रसिकराज दास

आध्यात्मिक सुविज्ञ एवं सलाहकार 

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