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कल २९ अगस्त, श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को, भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई, हम सभी जीवों के आदि-गुरु, जिनकी कृपा के बिना भगवान की कृपा मिलना अत्यंत कठिन है, उन श्री बलराम जी का आविर्भाव दिवस है ।

परम पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण सभी अवतारों के उद्गम हैं । उनका प्रथम विस्तार श्री बलराम जी हैं । भगवान श्री कृष्ण और श्री बलराम जी में मात्र रूप का अंतर है । 
प्रथम विस्तार होने के कारण बलराम जी से ही सम्पूर्ण आध्यात्मिक संसार का उद्गम हुआ है । वे मूल गुरु-तत्त्व, सब जीवों के आदि-गुरु भी हैं ।

वे विविध तरीकों से भगवान के सृष्टि कार्य में सहयोग करते हैं और शेषनाग के रूप में श्री कृष्ण सेवा का परमानन्द का आस्वादन करते हैं । 
जब भी श्री कृष्ण इस भौतिक संसार में अवतरित होते हैं तो वे अपने सहचरों एवं निकटतम पार्षदों के साथ आते हैं । उसी तरह से जब ५००० वर्ष पूर्व भगवान कृष्ण इस भौतिक संसार में अवतरित हुए तो बलराम जी उनके पहले ही यहाँ आ चुके थे । 
जब देवकी को सातवां गर्भ ठहरा तो उन्हें यह अनुभूति हो गयी थी की यह कोई दिव्य संतान है और वो उसकी सुरक्षा को लेकर चिंतित हो गयीं । यहाँ तक कि कंस भी देवकी के तेज को देखकर सतर्क हो गया कि कहीं छल से आठवीं की जगह सातवीं संतान ही उसकी मृत्यु का कारण न बने । 
उस समय भगवान ने अपनी अंतरंग शक्ति, योगमाया को आदेश दिया कि देवकी के गर्भ को गोकुल में वसुदेव के मित्र नन्द के घर, रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दें । इस प्रकार बलराम जी गोकुल में नंदबाबा के घर जन्मे ।

गर्ग मुनि ने भविष्यवाणी की कि, अनन्त बल से पूर्ण यह बालक बलराम कहलायेगा । और क्योंकि देवकी के गर्भ से रोहिणी के गर्भ में आकर्षित हुआ है इसलिए संकर्षण भी कहलायेगा । और रोहिणी पुत्र होने के कारण रोहिणी-नंदन नाम भी पड़ा । कृष्ण के बड़े भाई के रूप में दाऊजी भी कहलाये ।

उनकी सुंदरता सैकड़ों उगते हुए चन्द्र किरणों के समान और अपार बल ऐसा था की थोड़े से प्रयोग से कई दैत्य-राक्षसों की सेनाएं तहस-नहस हो जाये । 
अपने छोटे भाई की अलौकिक शक्तियों को जानने के बावजूद भगवान कृष्ण कभी बलराम जी को जंगल में अकेला नहीं छोड़ते थे । बड़े भाई के रूप में बलराम जी , भगवान के प्रेम और सम्मान के प्रतीक थे । 
बलराम जी, भगवान को अति-प्रिय हैं और कई मधुर लीलाओं के अमृत-सागर हैं।

वनों में विचरण करते समय कई वृक्ष पथ पर झुक जाते थे मानो बलराम जी को प्रणाम कर रहे हों । इस पर भगवान कहते हैं कि सभी देवतागण भी बलराम जी के चरणकमलों की सेवा की इच्छा रखते हैं ।

बलराम जी भगवान के शास्वत सहचर हैं, राम के साथ लक्ष्मण के रूप में, चैतन्य महाप्रभु के साथ नित्यानंद प्रभु के रूप में वे सदैव भगवान के साथ हर लीला में सेवा करने के लिए उपस्थित रहते हैं ।

बलराम जी, भगवान कृष्ण के सेवक-स्वरुप हैं । उनका सदैव एक ही लक्ष्य रहता है कि भगवान को किस तरह प्रसन्न किया जाये । 
वे आदि-गुरु हैं और जो भी भक्ति में प्रगति करने की इच्छा रखता है उसे पहले बलराम जी से कृपा प्राप्त करनी होगी ।

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